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भारतीय पर्यावरण कानून और 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (National Green Tribunal - NGT) के विधिक क्षेत्राधिकार, अपीलीय प्रावधानों तथा शक्तियों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 14 के तहत NGT को पर्यावरण से जुड़े उन विशिष्ट सिविल मामलों में न्यायनिर्णयन की व्यापक शक्ति प्राप्त है जो अधिनियम की अनुसूची I में सूचीबद्ध सात पर्यावरण कानूनों के प्रवर्तन से संबंधित हैं, किंतु इसके पास 'वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972' और 'अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006' के अंतर्गत आने वाले मामलों पर विचार करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।
- 2. 'सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ' और NGT की कार्यप्रणाली से जुड़े अन्य न्यायिक निर्णयों के अनुसार, अधिकरण के पास अपने आदेशों या निर्देशों का पालन न किए जाने पर सिविल अवमानना (Civil Contempt) के साथ-साथ आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) के तहत भी दंडित करने की वही शक्तियाँ प्राप्त हैं जो देश के उच्च न्यायालयों को होती हैं।
- 3. 'मद्रास बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2021)' मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण के किसी भी आदेश, निर्णय या पुरस्कार के विरुद्ध अपील सीधे देश के सर्वोच्च न्यायालय यानी उच्चतम न्यायालय में ही की जा सकती है, और NGT के फैसलों के खिलाफ देश के किसी भी उच्च न्यायालय के समक्ष संविधान के अनुच्छेद 226 या 227 के तहत रिट अधिकारक्षेत्र का प्रयोग पूरी तरह से वर्जित है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 14 के अनुसार NGT का क्षेत्राधिकार अनुसूची I में उल्लिखित 7 विशिष्ट पर्यावरण कानूनों (जैसे पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, जल और वायु प्रदूषण निवारण अधिनियम आदि) तक सीमित है। इसमें 'वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972' और 'वन अधिकार अधिनियम, 2006' शामिल नहीं हैं।
कथन 2 गलत है: NGT के पास अपने आदेशों के अनुपालन के लिए सिविल अवमानना (Civil Contempt) के तहत दंडित करने की शक्ति तो है, किंतु इसके पास देश के उच्च न्यायालयों की तरह 'आपराधिक अवमानना' (Criminal Contempt) का संज्ञान लेने या दंडित करने की कोई वैधानिक शक्ति नहीं है।
कथन 3 गलत है: 'मद्रास बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2021)' मामले में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि न्यायाधिकरणों (Tribunals) के आदेशों के विरुद्ध उच्च न्यायालयों के अनुच्छेद 226/227 के तहत रिट क्षेत्राधिकार को पूरी तरह से वर्जित नहीं किया जा सकता, क्योंकि उच्च न्यायालयों की न्यायिक समीक्षा की शक्ति संविधान के बुनियादी ढाँचे का हिस्सा है। अपीलें अवश्य सीधे सुप्रीम कोर्ट में होती हैं, लेकिन उच्च न्यायालय का रिट अधिकारक्षेत्र समाप्त नहीं होता।
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भारतीय पर्यावरण कानून और 'राष्ट्रीय वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981' तथा 'जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974' के प्रावधानों तथा उनकी संस्थागत प्रणालियों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के तहत गठित 'केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड' (CPCB) और 'राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड' (SPCBs) को यह वैधानिक शक्ति प्राप्त है कि वे जल स्रोतों में प्रदूשक तत्वों के निर्वहन को विनियमित करें, तथा उल्लंघनकर्ताओं के परिसਰों का निरीक्षण करने और नमूने एकत्र करने का अधिकार रखते हैं।
2. वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 को मूल रूप से केवल औद्योगिक स्रोतों से होने वाले वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए अधिनियमित किया गया था, किंतु वर्ष 1987 में किए गए संशोधनों के माध्यम से इसके दायरे में 'शोर प्रदूषण' (Noise Pollution) को भी एक प्रदूषक के रूप में औपचारिक रूप से शामिल कर दिया गया था।
3. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) अधिनियम, 2010 की अनुसूची I के तहत जल अधिनियम और वायु अधिनियम दोनों को शामिल किया गया है, जिसका अर्थ है कि इन अधिनियमों के अंतर्गत राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों द्वारा दिए गए आदेशों या निर्णयों के विरुद्ध NGT में सीधे अपील दायर की जा सकती है, न कि उच्च न्यायालयों में।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XV' (निर्वाचन - अनुच्छेद 324 से 329-क) तथा निर्वाचन आयोग से संबंधित प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय निकाय के रूप में मूल रूप से वर्ष 1950 में ही स्थापित किया गया था, जिसमें एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो अन्य निर्वाचन आयुक्त शामिल थे।
2. मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति से और जिन आधारों पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है, जबकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश के बिना राष्ट्रपति द्वारा नहीं हटाया जा सकता है।
3. निर्वाचन आयोग को संसद और राज्य विधानमंडलों के चुनावों के संचालन के लिए राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा आवश्यक प्रशासनिक कर्मचारियों की उपलब्धता सुनिश्चित करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।
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भारतीय अर्थव्यवस्था एवं सतत विकास के संदर्भ में, 'सार्वजनिक वित्त' (Public Finance), 'राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम, 2003' (FRBM Act) तथा राजकोषीय समेकन (Fiscal Consolidation) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. FRBM अधिनियम, 2003 का मुख्य उद्देश्य देश में वित्तीय अनुशासन को सुनिश्चित करना, राजस्व घाटे को समाप्त करना तथा दीर्घकालिक व्यापक आर्थिक स्थिरता प्राप्त करना था, जिसके तहत केंद्र सरकार के लिए वर्ष 2008-09 तक राजकोषीय घाटे की सीमा सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 3 प्रतिशत लक्षित की गई थी।
2. वर्ष 2018 में एन.के. सिंह समिति की संस्तुतियों के आधार पर FRBM अधिनियम में संशोधन किया गया, जिसके तहत सरकार को यह कानूनी बाध्यता दी गई कि वह वर्ष 2020-21 तक राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 3 प्रतिशत और कुल ऋण (Debt-to-GDP Ratio) को केंद्र सरकार के लिए 40 प्रतिशत तथा संयुक्त रूप से केंद्र और राज्यों के लिए 60 प्रतिशत तक सीमित करे।
3. 'राजस्व घाटा' (Revenue Deficit) उस स्थिति को दर्शाता है जहाँ सरकार का कुल राजस्व व्यय कुल राजस्व प्राप्तियों से अधिक होता है, और यदि सरकार द्वारा राजस्व घाटे को पूरा करने के लिए उधार (Borrowing) का उपयोग किया जाता है, तो इसे अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक और पूंजी-सृजक राजकोषीय उपाय माना जाता है।
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