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भारतीय कला, संस्कृति और प्राचीन इतिहास के संदर्भ में, बौद्ध धर्म की महायान (Mahayana) और वज्रयान (Vajrayana) शाखाओं के विकास तथा दार्शनिक मान्यताओं के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. महायान बौद्ध धर्म में बुद्ध को एक अलौकिक शक्ति और भगवान के रूप में पूजे जाने की परंपरा शुरू हुई, तथा इसमें 'बोधिसत्व' की अवधारणा का उदय हुआ, जिसमें वे व्यक्ति जो स्वयं निर्वाण प्राप्त करने के योग्य हैं, अन्य जीवों के उद्धार के लिए अपनी मुक्ति को स्थगित कर देते हैं।
  2. 2. वज्रयान शाखा, जो मुख्य रूप से गुप्त काल के उत्तरार्ध और पाल काल के दौरान पूर्वी भारत (विशेषकर बंगाल और बिहार) में विकसित हुई, ने तांत्रिक अनुष्ठानों, मंत्रों, मुद्राओं और मंडल (Mandala) के प्रयोग को मुक्ति प्राप्ति के प्राथमिक साधन के रूप में मान्यता दी।
  3. 3. बौद्ध धर्म की शून्यवाद (Madhyamaka) विचारधारा के संस्थापक नागार्जुन थे, जिन्होंने यह प्रतिपादित किया कि समस्त वस्तुएं और धर्म 'प्रतीत्यसमुत्पाद' (Dependent Origination) के कारण स्वभावतः शून्य (स्वयं के स्वतंत्र अस्तित्व से रहित) हैं, और इस दार्शनिक दृष्टिकोण को महायान बौद्ध मत का वैचारिक आधार माना जाता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: महायान बौद्ध धर्म (जो ईसा की पहली शताब्दी के आसपास कुषाण काल में प्रमुखता से उभरा) ने बुद्ध की मूर्ति पूजा और उन्हें अलौकिक स्वरूप प्रदान किया। इसमें बोधिसत्व की संकल्पना केंद्रीय है, जहाँ बोधिसत्व करुणावश अन्य सभी प्राणियों के मोक्ष प्राप्ति तक बुद्धत्व प्राप्त करने से विरत रहते हैं। कथन 2 सही है: वज्रयान (जिसे तांत्रिक बौद्ध धर्म भी कहा जाता है) का विकास मुख्य रूप से प्रारंभिक मध्यकाल (विशेषकर पाल राजवंश के दौरान) में हुआ। इसमें साधना के लिए मंत्र, मुद्रा, तंत्र और मंडल जैसी esoteric पद्धतियों को जोड़ा गया। कथन 3 सही है: नागार्जुन (जो कुषाण शासक कनिष्क के समकालीन माने जाते हैं) ने माध्यमिक दर्शन या शून्यवाद की नींव रखी। उनके अनुसार सभी धर्म 'शून्य' हैं क्योंकि उनका कोई स्वतंत्र या आंतरिक सार (Swabhava) नहीं है, बल्कि वे परस्पर निर्भरता (प्रतीत्यसमुत्पाद) पर आधारित हैं। यह महायान दर्शन का मुख्य दार्शनिक स्तंभ है। अतः तीनों कथन सही हैं।
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