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भारतीय राजव्यवस्था और भारतीय संविधान के अंतर्गत 'राष्ट्रपति की क्षमादान शक्तियाँ' (Pardoning Powers - Article 72) तथा राज्यपाल की शक्तियों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को सेना न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए किसी भी दंडादेश के मामले में क्षमा, विलंबन, विराम या परिहार करने की शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति राज्यपाल के पास अनुच्छेद 161 के तहत भी समान रूप से उपलब्ध होती है भले ही मामला सैन्य न्यायालय से जुड़ा हो।
  2. 2. 'मारु राम बनाम भारत संघ (1980)' और 'एकांथप्पा बनाम कर्नाटक राज्य' मामलों में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल की क्षमादान शक्तियों का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह और सहायता से किया जाना अनिवार्य है, तथा यह शक्ति केवल कार्यपालिका की कार्यकारी शक्ति का विस्तार नहीं है बल्कि संविधान प्रदत्त एक स्वतंत्र न्यायिक समीक्षा के अधीन समीक्षा योग्य संवैधानिक अधिकार है।
  3. 3. जब किसी अपराध के लिए मृत्युदंड (Death Sentence) दिया गया हो, तब केवल भारत के राष्ट्रपति को ही उस मृत्युदंड को पूरी तरह क्षमा करने (Pardon) की अनन्य संवैधानिक शक्ति प्राप्त है, और राज्य के राज्यपाल के पास मृत्युदंड के मामलों में क्षमादान देने की कोई शक्ति नहीं होती है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 गलत है: संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को सैन्य न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के मामलों में भी क्षमादान की शक्ति प्राप्त है। किंतु, अनुच्छेद 161 के तहत राज्य के राज्यपाल के पास सैन्य न्यायालयों (Court Martial) द्वारा दिए गए किसी भी दंडादेश के संबंध में क्षमादान देने की शक्ति **नहीं** होती है। कथन 2 सही है: उच्चतम न्यायालय ने 'मारु राम बनाम भारत संघ (1980)' और बाद के कई मामलों में यह निर्धारित किया है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल अपनी क्षमादान शक्तियों का प्रयोग स्वतंत्र रूप से नहीं करते, बल्कि संबंधित सरकारों (केंद्रीय और राज्य मंत्रिपरिषद) की सहायता और सलाह के अनुसार करते हैं। साथ ही, यह शक्ति मनमाने ढंग से प्रयोग किए जाने पर न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे में आती है। कथन 3 गलत है: हालांकि राज्यपाल मृत्युदंड (Death Sentence) को पूरी तरह से 'क्षमा' (Pardon) नहीं कर सकता है (क्योंकि मृत्युदंड के मामलों में केवल राष्ट्रपति के पास क्षमा करने की अनन्य शक्ति है), फिर भी राज्यपाल के पास अनुच्छेद 161 के तहत मृत्युदंड के मामले में सजा को निलंबित करने, कम करने (Commutation), परिहार या विराम देने की शक्ति होती है; राज्यपाल को मृत्युदंड के मामलों में पूरी तरह क्षमादान देने का अधिकार नहीं है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि राज्यपाल के पास मृत्युदंड पर कोई भी शक्ति नहीं है। कथन 3 में यह कहा गया है कि राज्यपाल के पास मृत्युदंड के मामलों में कोई शक्ति नहीं होती, जो आंशिक रूप से गलत है क्योंकि राज्यपाल सजा का निलंबन या लघुकरण कर सकता है, हालांकि 'पार्डन' नहीं कर सकता। अत: केवल कथन 2 सही है।
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