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भारतीय पर्यावरण कानून और 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal - NGT) अधिनियम, 2012' के प्रावधानों तथा उसकी कार्यप्रणाली के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना वर्ष 2010 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम के तहत पर्यावरण संरक्षण, वनों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित कानूनी अधिकारों के प्रवर्तन तथा मुकदमों के त्वरित निपटान के लिए की गई थी, और यह भारत का ऐसा पहला विशेष निकाय है जिसने पर्यावरण संबंधी मामलों में 'प्रदूषक भुगतान करेगा' (Polluter Pays Principle) और 'सतर्कता सिद्धांत' (Precautionary Principle) को सांविधिक मान्यता दी है।
- 2. अधिकरण के पास यह वैधानिक शक्ति प्राप्त है कि वह अपने समक्ष आने वाले मामलों की सुनवाई करते समय सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC), 1908 के सख्त न्यायिक नियमों और प्रक्रियाओं से पूरी तरह बंधा हुआ नहीं है, बल्कि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) द्वारा निर्देशित होता है।
- 3. राष्ट्रीय हरित अधिकरण के किसी भी आदेश, निर्णय या पुरस्कार के विरुद्ध सीधे उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) में अपील केवल 90 दिनों की अवधि के भीतर की जा सकती है, और अधिकरण के निर्णयों को उच्च न्यायालयों (High Courts) की रिट अधिकारक्षेत्र (Writ Jurisdiction) के अंतर्गत चुनौती नहीं दी जा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 (वर्ष 2010 में) के तहत पर्यावरण संरक्षण, वनों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जुड़े मामलों के प्रभावी और त्वरित निपटान के लिए की गई थी। यह दुनिया में अपनी तरह का पहला ऐसा विशेष पर्यावरणीय निकाय है जो 'प्रदूषक भुगतान करेगा सिद्धांत', 'सतर्कता सिद्धांत' और 'सतत विकास के सिद्धांत' को लागू करने के लिए विधिवत बाध्य है।
कथन 2 सही है: एनजीटी (NGT) अपनी कार्यवाही संचालित करते समय सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के कठोर नियमों और प्रक्रियाओं से बाध्य नहीं है, बल्कि यह 'प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों' (Principles of Natural Justice) के आधार पर कार्य करता है।
कथन 3 गलत है: राष्ट्रीय हरित अधिकरण के किसी भी आदेश या निर्णय के विरुद्ध सीधे उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) में अपील 90 दिनों के भीतर की जा सकती है, किंतु यह कहना गलत है कि इसके निर्णयों को उच्च न्यायालयों (High Courts) में चुनौती नहीं दी जा सकती। सर्वोच्च न्यायालय ने 'चंपा लाल साहू बनाम राष्ट्रीय हरित अधिकरण' तथा अन्य मामलों में स्पष्ट किया है कि NGT के आदेशों के विरुद्ध संबंधित उच्च न्यायालयों में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर की जा सकती है, क्योंकि उच्च न्यायालयों का न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का अधिकार क्षेत्र संविधान का एक 'मूल ढांचा' है।
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1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार चुनाव आयोग एक स्थायी और स्वतंत्र निकाय है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और उतने ही अन्य चुनाव आयुक्त होते हैं, यदि कोई हों, जितने राष्ट्रपति समय-समय पर निर्धारित करें, और मूल संविधान में इसे एक बहु-सदस्यीय (Multi-member) निकाय के रूप में स्थापित किया गया था।
2. मुख्य चुनाव आयुक्त को उसके पद से उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति से और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है, जबकि अन्य चुनाव आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त की लिखित सिफारिश के बिना राष्ट्रपति द्वारा किसी भी समय पद से हटाया जा सकता है।
3. संविधान में चुनाव आयोग के सदस्यों की अहर्ताओं (Qualifications) जैसे कि विधिक, प्रशासनिक या शैक्षणिक योग्यताओं का कोई भी विस्तृत उल्लेख नहीं किया गया है, और न ही संविधान से सेवानिवृत्त होने वाले चुनाव आयुक्तों को सरकार द्वारा किसी अन्य नियुक्ति (Further Appointment) के लिए पूर्णतः प्रतिबंधित किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XIV' (संघ और राज्यों के अधीन सेवाएं - अनुच्छेद 308 से 323) के अंतर्गत 'संघ लोक सेवा आयोग' (UPSC) और 'राज्य लोक सेवा आयोगों' (SPSC) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 316 के अनुसार संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या अन्य सदस्य की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, और किसी राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या सदस्य की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है, तथा आयोग के प्रत्येक सदस्य को अपने पद ग्रहण करने की तारीख से छह वर्ष की अवधि के लिए या 65 वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक (इनमें से जो भी पहले हो) अपने पद पर बने रहने का अधिकार होता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 317 के प्रावधानों के तहत संघ लोक सेवा आयोग या किसी राज्य लोक सेवा आयोग के किसी भी सदस्य को उसके पद से केवल राष्ट्रपति के आदेश द्वारा ही हटाया जा सकता है, भले ही वह सदस्य राज्य लोक सेवा आयोग का ही क्यों न हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा हटाया जाना उच्चतम न्यायालय के प्रतिवेदन के आधार पर किया जाता है।
3. संविधान के अनुच्छेद 319 के अनुसार संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के पद पर समाप्त होने वाले कार्यकाल के बाद वह व्यक्ति भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी अन्य रोजगार के लिए पात्र नहीं होता है, जबकि किसी राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष का कार्यकाल समाप्त होने पर वह संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या सदस्य के रूप में अथवा किसी अन्य राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति का पात्र होता है, किंतु भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी अन्य रोजगार के लिए पात्र नहीं होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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