त्वरित लिंक्स
Indian Polity
11 views
अटॉर्नी जनरल को संसद के किस सदन में बोलने का अधिकार है?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
महान्यायवादी दोनों सदनों में बोल सकते हैं, पर वोट नहीं दे सकते।
Related Questions
→
भारतीय संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति की निर्वाचन प्रक्रिया, प्रधानमंत्री के उत्तरदायित्व और मंत्रिपरिषद से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 66(1) के अनुसार उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के सभी सदस्यों से मिलकर बनने वाले निर्वाचकगण द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है, जिसमें संसद के मनोनीत सदस्य भी भाग लेते हैं, किंतु राज्य विधानमंडलों के सदस्य इसमें कोई भाग नहीं लेते हैं।
2. अनुच्छेद 75(3) के उपबंध के अनुसार मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है, जिसका संवैधानिक तात्पर्य यह है कि यदि लोकसभा में किसी एक कैबिनेट मंत्री के विरुद्ध भी अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाता है या प्रधानमंत्री त्यागपत्र दे देता है, तो पूरी मंत्रिपरिषद का विघटन हो जाता है, क्योंकि सभी मंत्री एक साथ तैरते और एक साथ डूबते हैं।
3. अनुच्छेद 78 के अंतर्गत प्रधानमंत्री का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह संघ के प्रशासन और विधान संबंधी प्रस्तावों से संबंधित मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राष्ट्रपति को संसूचित करे, और यदि राष्ट्रपति ऐसी कोई सूचना माँगता है, तो उसे उपलब्ध कराए, भले ही वह निर्णय प्रधानमंत्री के व्यक्तिगत अधिकार क्षेत्र का हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय संविधान के भाग III (मूल अधिकार) के अंतर्गत 'समानता के अधिकार' (अनुच्छेद 14-18) और उससे संबंधित न्यायिक निर्णयों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 14 में प्रयुक्त 'विधि के समक्ष समता' (Equality before Law) के विचार को ब्रिटिश संविधान से लिया गया है जो एक नकारात्मक अवधारणा है, जिसका तात्पर्य किसी भी व्यक्ति के पक्ष में विशिष्ट विशेषाधिकारों के अभाव से है, जबकि 'विधियों का समान संरक्षण' (Equal protection of the laws) के अमेरिकी अवधारणा को सकारात्मक माना जाता है जिसके अंतर्गत समान परिस्थितियों वाले व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए।
2. सर्वोच्च न्यायालय ने 'इंदिरा साहनी वाद' (1992) में यह स्पष्ट किया था कि पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था केवल प्रारंभिक नियुक्तियों (Initial Appointments) तक ही सीमित है और इसे संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत पदोन्नति (Promotion) में लागू नहीं किया जा सकता है, जिसे बाद में संसद ने संविधान संशोधन के माध्यम से अप्रभावी कर दिया।
3. अनुच्छेद 18 के अंतर्गत उपाधि (Titles) के अंत का प्रावधान किया गया है, जिसके तहत राज्य सेना या विद्या संबंधी सम्मान के अलावा अन्य कोई उपाधि प्रदान नहीं कर सकता है, और भारत का कोई भी नागरिक किसी विदेशी राज्य से राष्ट्रपति की पूर्व सहमति के बिना कोई भी उपाधि या भेंट स्वीकार नहीं कर सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति की कार्यकारी, विधायी, न्यायिक और क्षдан (Pardoning) शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति को किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए किसी भी व्यक्ति के दंड को क्षमा करने, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने अथवा दंडादेश का लघुकरण करने की शक्ति प्राप्त है, और राष्ट्रपति की यह क्षमादान शक्ति एक कार्यपालिका शक्ति है, जिसमें मृत्युदंड के मामलों में राज्यपाल के पास भी समानांतर रूप से क्षमादान देने की पूर्ण संवैधानिक शक्ति होती है।
2. राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत प्रख्यापित अध्यादेश की शक्ति संसद की विधि बनाने की शक्ति के समान ही व्यापक होती है, किंतु यह अध्यादेश संसद के पुनरारंभ होने के छह सप्ताह के भीतर संसद द्वारा अनुमोदित किया जाना अनिवार्य होता है, और राष्ट्रपति अपनी इस अध्यादेश निर्माण की शक्ति का प्रयोग तब भी कर सकता है जब संसद के दोनों सत्र में न हों।
3. राष्ट्रपति की संघ की कार्यपालिका शक्ति अनुच्छेद 53 के अनुसार उसमें निहित होती है, जिसके अंतर्गत वह संघ के सभी महत्वपूर्ण अधिकारियों जैसे प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्यों, महान्यायवादी, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG), और मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति करता है, तथा संघ के रक्षा बलों का सर्वोच्च समादेश (Supreme Command) भी राष्ट्रपति में ही निहित होता है, जिसका प्रयोग विधि द्वारा विनियमित होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय संविधान के भाग-III (मूल अधिकार) के अंतर्गत प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों तथा उनसे संबंधित संवैधानिक सीमाओं और अपवादों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार प्राप्त है, किंतु यह अधिकार लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन है तथा राज्य को यह शक्ति प्राप्त है कि वह आर्थिक, वित्तीय, राजनैतिक या अन्य किसी भी लौकिक क्रियाकलाप का विनियमन या निर्बंधन कर सके।
2. अनुच्छेद 25 के तहत 'सिख धर्म' के धारकों द्वारा कृपाण धारण करने और लेकर चलने का अधिकार इस अनुच्छेद के स्पष्टीकरण I में शामिल किया गया है, तथा इसी अनुच्छेद के अंतर्गत जैन और बौद्ध धर्म के अनुयायियों को भी कृपाण या किसी अन्य धार्मिक प्रतीक को सार्वजनिक रूप से धारण करने का विशेष संवैधानिक अधिकार प्रदान किया गया है।
3. संविधान के अनुच्छेद 26 के अनुसार प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग को धार्मिक और दान प्रयोजनों के लिए संस्थाओं की स्थापना और पोषण करने, अपने धर्म के विषयों में कार्यों का प्रबंधन करने, तथा ऐसी संपत्ति के स्वामित्व और अर्जन करने का अधिकार प्राप्त है, और इस प्रकार की संपत्ति के प्रशासन का अधिकार राज्य द्वारा कभी भी किसी विधि के माध्यम से पूर्णतः अधिकृत किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति की कार्यकारी, विधायी और विशेषकर 'क्षमादान की शक्तियों' (Pardoning Powers - अनुच्छेद 72) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को सैन्य न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के मामलों में भी क्षमादान, प्रविलंबन, विराम या परिहार करने की शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति राज्य के राज्यपाल की अनुच्छेद 161 के तहत प्रदत्त क्षमादान शक्ति से इस मायने में व्यापक है कि राज्यपाल को मृत्युदंड के मामलों में क्षमा करने की शक्ति प्राप्त नहीं होती है और न ही उसे सैन्य न्यायालय के निर्णयों पर कोई अधिकार होता है।
2. राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति न्यायपालिका की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से पूरी तरह बाहर है, अर्थात् राष्ट्रपति द्वारा किसी दया याचिका को अस्वीकार करने या निर्णय लेने के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में किसी भी आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती है।
3. अनुच्छेद 72 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा अपनी शक्तियों का प्रयोग केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार ही किया जाता है, किंतु यदि राष्ट्रपति किसी दया याचिका पर निर्णय लेने में अत्यधिक और अस्पष्टीकृत विलम्ब करता है, तो विलम्ब के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदला जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.