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Indian Polity
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भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 324' के अंतर्गत भारत के 'निर्वाचन आयोग' (Election Commission of India) के गठन, शक्तियों और सदस्यों के कार्यकाल के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. निर्वाचन आयोग एक स्थायी और अखिल भारतीय निकाय है, जिसकी स्थापना संविधान द्वारा सीधे देश में संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपतियों के पदों के लिए सभी निर्वाचनों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण के लिए की गई है।
- 2. मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन (और यदि ऐसी विधि नहीं बनाई गई है तो मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार) की जाती है, और संविधान ने इन सभी चुनाव आयुक्तों के कार्यकाल को निश्चित करते हुए 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) निर्धारित की है।
- 3. मुख्य चुनाव आयुक्त को उसके पद से केवल उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है, जबकि अन्य चुनाव आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त की लिखित सिफारिश के बिना राष्ट्रपति द्वारा उनके पद से नहीं हटाया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण के लिए एक अखिल भारतीय और स्थायी संवैधानिक निकाय है। कथन 2 गलत है: संविधान ने अन्य चुनाव आयुक्तों (Chief Election Commissioner के अतिरिक्त) के कार्यकाल को निश्चित नहीं किया है, बल्कि यह शक्ति राष्ट्रपति को दी गई है (हालाँकि 'मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023' के तहत अब इनका कार्यकाल भी 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तय किया गया है, लेकिन मूल संविधान या अनुच्छेद 324 में उनके कार्यकाल की कोई विशिष्ट आयु सीमा स्पष्ट रूप से नहीं दी गई थी, और कथन का यह हिस्सा कि 'संविधान ने इन सभी चुनाव आयुक्तों के कार्यकाल को...' तथ्यात्मक रूप से भ्रमक और गलत है क्योंकि संविधान में केवल मुख्य चुनाव आयुक्त की पदावधि का उल्लेख था, अन्य का नहीं)। कथन 3 सही है: मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह महाभियोग जैसी प्रक्रिया से हटाया जाता है, और अन्य आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर ही हटाया जा सकता है।
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संसद की 'लोक लेखा समिति' (Public Accounts Committee) में कुल कितने सदस्य होते हैं?
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और दोनों सदनों की संयुक्त बैठकों (Joint Sitting) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 108 के अनुसार, संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक का प्रावधान केवल साधारण विधेयकों (Ordinary Bills) और वित्तीय विधेयकों की श्रेणी-II (Financial Bills-II) के मामलों में ही लागू होता है, जबकि धन विधेयकों (Money Bills) और संविधान संशोधन विधेयकों (Constitutional Amendment Bills) के संबंध में संयुक्त बैठक बुलाने का कोई प्रावधान नहीं है।
2. यदि किसी साधारण विधेयक पर विचार करने और उसे पारित करने के संबंध में दोनों सदनों के बीच गतिरोध उत्पन्न हो जाता है और राष्ट्रपति संयुक्त बैठक आहूत करने के अपने आशय की सूचना दे देता है, तो ऐसी स्थिति में यदि लोकसभा का विघटन हो जाता है, तब भी वह संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है और लोकसभा के विघटन से वह गतिरोध समाप्त नहीं होता है।
3. संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोकसभा के अध्यक्ष द्वारा की जाती है, और यदि लोकसभा अध्यक्ष अनुपस्थित हैं, तो लोकसभा का उपाध्यक्ष उसकी अध्यक्षता करता है, तथा यदि उपाध्यक्ष भी अनुपस्थित है, तो राज्यसभा का सभापति (उपराष्ट्रपति) संयुक्त बैठक की अध्यक्षता करने के लिए संवैधानिक रूप से अधिकृत होता है।
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रस्तुत और संविधान सभा द्वारा 22 जनवरी 1947 को स्वीकार किया गया 'उद्देश्य प्रस्ताव' (Objectives Resolution) भारतीय संविधान की प्रस्तावना का मूल आधार बना, जिसमें प्रस्तावना को संविधान के एक विशिष्ट भाग के रूप में स्वीकार करते हुए इसकी न्यायोचित (Justiciable) प्रकृति को स्पष्ट किया गया था।
2. प्रस्तावना में अब तक केवल एक बार 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संशोधन किया गया है, जिसके माध्यम से इसमें 'समाजवादी' (Socialist), 'पंथनिरपेक्ष' (Secular) और 'अखंडता' (Integrity) शब्दों को जोड़ा गया था।
3. केशवानंद भारती वाद (1973) में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न हिस्सा है, और संसद अनुच्छेद 368 के तहत अपनी संविधान संशोधन शक्ति का प्रयोग करते हुए प्रस्तावना में संशोधन कर सकती है, बशर्ते कि इसके द्वारा संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) को क्षति न पहुँचे।
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ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में भारतीय संविधान के ऐतिहासिक विकास और नियंत्रण की दिशा में पारित विभिन्न अधिनियमों (Regulating Acts) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 के माध्यम से बंगाल के गवर्नर के पद को 'बंगाल के गवर्नर-जनरल' में परिवर्तित किया गया और उसकी सहायता के लिए चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया, तथा इसी अधिनियम के तहत कलकत्ता में एक उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की स्थापना की गई थी जिसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश सर एलिजा इम्पे थे।
2. पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 द्वारा कंपनी के राजनीतिक और वाणिज्यिक कार्यों को पृथक कर दिया गया, जिसके तहत व्यापारिक मामलों के प्रबंधन के लिए 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' (Board of Control) और राजनीतिक मामलों (बोर्ड के नियंत्रण) के लिए 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स' (Court of Directors) की स्थापना की गई।
3. चार्टर अधिनियम, 1813 के द्वारा भारत में कंपनी के चाय के व्यापार और चीन के साथ व्यापार को छोड़कर, उसके सभी एकाधिकार (Monopoly) को समाप्त कर दिया गया, तथा साथ ही भारत में ईसाई मिशनरियों को आकर धर्म प्रचार करने की अनुमति प्रदान की गई।
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भारतीय संविधान के महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों और आपातकालीन उपबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 38वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1975 द्वारा यह उपबंध किया गया था कि राष्ट्रपति द्वारा की गई राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है, जिसे बाद में 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा निरस्त कर दिया गया।
2. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 के पश्चात राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा के अनुमोदन से संबंधित प्रस्ताव को संसद के प्रत्येक सदन द्वारा अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत (विशेष बहुमत) द्वारा पारित किया जाना अनिवार्य कर दिया गया।
3. राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 359 के अंतर्गत राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि वह आदेश द्वारा भाग III के किसी भी मूल अधिकार के प्रवर्तन को निलंबित कर सकता है, किंतु अनुच्छेद 20 और 21 द्वारा प्रदत्त अधिकारों के प्रवर्तन को किसी भी स्थिति में निलंबित नहीं किया जा सकता है।
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