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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की अधिकारिता, अवमानना की शक्ति तथा न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित संवैधानिक उपबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 129 के अनुसार उच्चतम न्यायालय एक 'अभिलेख न्यायालय' (Court of Record) है और उसे अपनी अवमानना के लिए, जिसमें न्यायपालिका की गरिमा और प्राधिकार को धूमिल करने वाले कृत्य शामिल हैं, दंड देने की शक्ति प्राप्त है, और इस शक्ति में अपनी किसी भी भूल या आदेश का स्वयं पुनरावलोकन करने की अंतर्निहित शक्ति भी सम्मिलित है।
- 2. संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की शक्ति प्राप्त है, और यदि विधि या तथ्य का कोई ऐसा सार्वजनिक महत्व का प्रश्न उत्पन्न होता है जिस पर राष्ट्रपति राय मांगता है, तो उच्चतम न्यायालय के लिए राष्ट्रपति को अपनी राय देना अनिवार्य होता है, तथा राष्ट्रपति उस राय को मानने के लिए भी पूर्णतः बाध्य होता है।
- 3. राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) अधिनियम, 2014 को उच्चतम न्यायालय ने 'सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ वाद (2015)' में संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) यानी न्यायपालिका की स्वतंत्रता का उल्लंघन करने के कारण असंवैधानिक और शून्य घोषित कर दिया था, जिसके फलस्वरूप कॉलेजियम प्रणाली पुनः प्रभावी हो गई।
- 4. संविधान के अनुच्छेद 145 के अनुसार उच्चतम न्यायालय को संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, राष्ट्रपति के अनुमोदन से न्यायालय की पद्धति और प्रक्रिया को विनियमित करने के लिए नियम बनाने की शक्ति प्राप्त है, किंतु संवैधानिक मामलों (Constitutional Matters) की सुनवाई के लिए बैठने वाले न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या पाँच होनी अनिवार्य है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 129 के तहत उच्चतम न्यायालय एक अभिलेख न्यायालय है और उसे अपनी अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति प्राप्त है। कथन 2 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 143 के तहत जब राष्ट्रपति लोक महत्व के प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय से परामर्श मांगता है, तो न्यायालय परामर्श देने के लिए (विशेषकर प्रथम खंड के तहत) बाध्य नहीं भी हो सकता है (द्वितीय खंड के मामलों में देना पड़ सकता है), किंतु किसी भी स्थिति में राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गई सलाह या राय को मानने के लिए बाध्य नहीं होता है। कथन 3 सही है, 2015 के चौथे न्यायाधीश मामले (Fourth Judges Case) में 99वें संविधान संशोधन और NJAC अधिनियम को असंवैधानिक घोषित किया गया था। कथन 4 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 145(3) के अनुसार संविधान के निर्वचन से संबंधित किसी मामले (जिन्हें संवैधानिक पीठ सुनाती है) में न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या पाँच होनी चाहिए, किंतु अन्य सामान्य मामलों के लिए यह संख्या पाँच अनिवार्य नहीं है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर विस्तृत अध्ययन करें।
Related Questions
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भारतीय संविधान के अंतर्गत महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों और आपातकालीन उपबंधों के परस्पर संबंधों तथा उनके प्रभावों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान के अनुच्छेद 352 में संशोधन करके यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रीय आपातकाल संपूर्ण देश में या उसके किसी विशिष्ट भाग पर एक साथ उद्घोषित किया जा सकता है, तथा आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार केवल तभी स्वतः निलंबित होंगे जब आपातकाल का आधार 'युद्ध या बाह्य आक्रमण' (External Aggression) हो, न कि 'सशस्त्र विद्रोह' (Armed Rebellion)।
2. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा आपातकाल के दुरुपयोग को रोकने के लिए अनुच्छेद 352 में 'आंतरिक अशांति' (Internal Disturbance) शब्द को हटाकर इसके स्थान पर 'सशस्त्र विद्रोह' शब्द को जोड़ा गया, और यह अनिवार्य किया गया कि राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा तभी की जा सकती है जब मंत्रिमंडल (Cabinet) द्वारा इसका निर्णय लिखित रूप में संसूचित किया गया हो।
3. 44वें संशोधन के माध्यम से ही यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रीय आपातकाल के प्रवर्तन के दौरान भी संविधान के अनुच्छेद 20 और 21 द्वारा प्रदत्त प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार को किसी भी परिस्थिति में निलंबित नहीं किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राष्ट्रपति की अध्यादेश निर्माण की शक्ति (Ordinance-making power) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 123 के अनुसार राष्ट्रपति को अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति तब प्राप्त होती है जब संसद के दोनों सदन सत्र में न हों, और राष्ट्रपति का यह समाधान हो जाता है कि ऐसी परिस्थितियाँ विद्यमान हैं जिनके कारण तुरंत कार्रवाई करना आवश्यक हो गया है।
2. राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित अध्यादेश की संप्रभुता और प्रभाव वही होता है जो संसद द्वारा बनाए गए किसी अधिनियम का होता है, किंतु यह संसद के पुनर्समेकित होने के छह सप्ताह के भीतर या संसद के दोनों सदनों द्वारा अस्वीकृत किए जाने पर स्वतः प्रभावहीन हो जाता है, तथा इसकी अधिकतम संभावित अवधि संसद की पुनः बैठक होने के छह सप्ताह बाद तक ही हो सकती है।
3. सर्वोच्च न्यायालय ने 'कुप्पुस्वामी वाद' और 'डी.सी. वाधवा वाद' जैसे ऐतिहासिक निर्णयों में यह स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है कि अध्यादेश निर्माण की शक्ति राष्ट्रपति की एक विवेककारी (Discretionary) शक्ति है, जिसकी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) किसी भी परिस्थिति में न्यायालय द्वारा नहीं की जा सकती है, भले ही इसे दुर्भावनापूर्ण तरीके से प्रख्यापित किया गया हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और सदनों की शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 109 के अनुसार, धन विधेयक (Money Bill) केवल लोकसभा में ही पुनः स्थापित किया जा सकता है और राज्यसभा इस पर किसी प्रकार का संशोधन नहीं कर सकती है, किंतु यदि राज्यसभा धन विधेयक को 14 दिनों के भीतर अपनी सिफारिशों के साथ वापस नहीं करती है, तो उसे दोनों सदनों द्वारा पारित नहीं माना जाएगा और वह विधेयक लैप्स हो जाएगा।
2. लोकसभा और राज्यसभा के बीच गतिरोध की स्थिति में संविधान के अनुच्छेद 108 के तहत राष्ट्रपति दोनों सदनों की संयुक्त बैठक आहूत कर सकता है, जिसकी अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करता है, और इस संयुक्त बैठक में यदि विधेयक उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के साधारण बहुमत से पारित हो जाता है, तो उसे दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है।
3. संविधान संशोधन विधेयक (Constitution Amendment Bill) के मामले में दोनों सदनों के बीच असहमति होने पर अनुच्छेद 108 के अंतर्गत संयुक्त बैठक बुलाए जाने का प्रावधान नहीं है, तथा ऐसे प्रत्येक संविधान संशोधन विधेयक को संसद के दोनों सदनों द्वारा अलग-अलग विशेष बहुमत से पारित होना अनिवार्य होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान सभा के गठन और इसकी कार्यप्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान सभा के सदस्यों का निर्वाचन प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के माध्यम से एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से किया गया था, जिसमें ब्रिटिश प्रांतों की सीटों का आंटन उनकी जनसंख्या के अनुपात में किया गया था।
2. रियासतों के प्रतिनिधियों का चयन रियासतों के प्रमुखों द्वारा किया जाना था, जिसके कारण संविधान सभा एक आंशिक रूप से निर्वाचित और आंशिक रूप से मनोनीत निकाय थी।
3. संविधान सभा की कुल सदस्य संख्या 389 निर्धारित की गई थी, जिसमें से 296 सीटें ब्रिटिश भारत को और 93 सीटें देशी रियाਸतों को आवंटित की गई थीं, तथा ब्रिटिश भारत की 296 सीटों में से 4 सीटें मुख्य आयुक्तों के प्रांतों (Chief Commissioners' Provinces) से भरी जानी थीं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत केंद्र-राज्य विधायी संबंधों और अंतर-राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 263 के तहत राष्ट्रपति को यह शक्ति प्रदान की गई है कि यदि वह किसी समय यह प्रतीत करे कि अंतर-राज्यीय परिषद् की स्थापना से लोकहित होगा, तो वह ऐसी परिषद् की स्थापना कर सकता है और उसके द्वारा किए जाने वाले कृत्यों, उसकी पद्धति तथा संगठन को परिभाषित कर सकता है।
2. अंतर-राज्यीय परिषद् एक स्थायी संवैधानिक निकाय (Permanent Constitutional Body) है जिसकी बैठक वर्ष में अनिवार्य रूप से तीन बार आयोजित की जानी चाहिए, और इसकी अध्यक्षता केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा की जाती है, जबकि प्रधानमंत्री इसके उपाध्यक्ष होते हैं।
3. सरकारीिया आयोग (Sarkaria Commission) की संस्तुतियों के आधार पर वर्ष 1990 में राष्ट्रपति के आदेश द्वारा पहली बार अंतर-राज्यीय परिषद् की स्थापना की गई थी, और इसके निर्णयों या सिफारिशों की प्रकृति विधिक रूप से केंद्र और राज्य सरकारों पर पूर्णतः बाध्यकारी होती है।
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