Indian Polity
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भारतीय संविधान की अनुसूचियों, भागों और राजभाषा से संबंधित प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान की आठवीं अनुसूची में मूल रूप से 14 भाषाएँ थीं, जिन्हें बाद में विभिन्न संविधान संशोधनों (जैसे- 21वें, 71वें, 92वें और 96वें संशोधन) के माध्यम से जोड़कर वर्तमान में 22 भाषाएँ कर दिया गया है, किंतु अंग्रेजी और राजस्थानी भाषाओं को अभी तक इस अनुसूची में शामिल नहीं किया गया है।
- 2. संविधान का भाग XVII (भाग-17) अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा से संबंधित है, जिसके अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा देवनागरी लिपि में हिंदी होगी, किंतु संसद को विधि द्वारा वर्ष 1965 के बाद भी सरकारी कार्यों के लिए अंग्रेजी भाषा के निरंतर प्रयोग को प्राधिकृत करने की शक्ति दी गई है, जिसके तहत राजभाषा अधिनियम, 1963 पारित किया गया था।
- 3. संविधान के अनुच्छेद 350-A के अनुसार प्रत्येक राज्य और राज्य के भीतर प्रत्येक स्थानीय प्राधिकारी भाषाई अल्पसंख्यक वर्गों के बालकों को शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा के पर्याप्त सुविधाओं की व्यवस्था करने का प्रयास करेगा, जिसे सातवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 द्वारा अंतःस्थापित किया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि संविधान की आठवीं अनुसूची में अंग्रेजी भाषा को शामिल नहीं किया गया है, किंतु 'राजस्थानी' को लेकर अभी भी माँग जारी है और इसे शामिल नहीं किया गया है, जबकि असमिया, बंगाली, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, सिंधी, तमिल, तेलुगु, उर्दू, बोडो, संथाली, मैथिली और डोगरी कुल मिलाकर 22 भाषाएँ हैं। कथन 2 सत्य है; भाग XVII (अनुच्छेद 343-351) संघ की राजभाषा से संबंधित है और राजभाषा अधिनियम, 1963 के तहत अंग्रेजी के प्रयोग को अनिश्चितकाल के लिए बढ़ाया गया है। कथन 3 सत्य है; सातवें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा अनुच्छेद 350-A को जोड़ा गया था जो भाषाई अल्पसंख्यक समूहों के बच्चों को मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा देने का प्रावधान करता है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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भारतीय संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत…
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP - भाग IV, अनुच्छेद 36-51) के स्वरूप, न्यायोचितता और उनके क्रियान्वयन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 37 के अनुसार नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा, किंतु ये तत्व किसी भी न्यायालय द्वारा न्यायोचित (Justiciable) नहीं हैं, अर्थात इन्हें किसी न्यायालय द्वारा बाध्यकारी रूप से प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता है।
2. सर्वोच्च न्यायालय ने 'मिनर्वा मिल्स लिमिटेड बनाम भारत संघ' (1980) वाद में यह स्पष्ट किया था कि भारतीय संविधान की नींव मूल अधिकार (Fundamental Rights) और नीति निर्देशक तत्वों (DPSPs) के बीच संतुलन के संतुलन चक्र पर टिकी है, और इनमें से किसी एक को दूसरे पर अनन्य प्राथमिकता नहीं दी जा सकती।
3. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित समाजवादी सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद द्वारा बनाए गए कानूनों को यदि अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों का उल्लंघन करने वाला पाया जाता है, तो अनुच्छेद 31-C के अनुसार उन्हें इस आधार पर अमान्य घोषित नहीं किया जा सकता है कि वे उक्त मूल अधिकारों का अतिक्रमण करते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य विधानमंडल के सदनों (विधानसभा और विधान परिषद) की संरचना, गठन तथा उनकी विधायी शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 169 के अनुसार संसद किसी राज्य में विधान परिषद का सृजन या उसका उत्सादन (Abolition) कर सकती है, यदि संबंधित राज्य की विधानसभा कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से इस आशय का संकल्प पारित कर दे, और इसके लिए संविधान संशोधन की आवश्यकता नहीं होती है।
2. संविधान के अनुच्छेद 171 के अंतर्गत किसी राज्य की विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या उस राज्य की विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती है, किंतु किसी भी स्थिति में विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या 40 से कम नहीं होनी चाहिए, हालांकि अपवादस्वरूप जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम से पहले वहाँ इसके कम सदस्य भी रहे थे।
3. विधान परिषद के कुल सदस्यों में से एक-तिहाई सदस्यों का निर्वाचन स्थानीय निकायों (जैसे- नगरपालिका, जिला बोर्ड) के निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है, एक-तिहाई सदस्यों का निर्वाचन विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने से भिन्न व्यक्तियों में से किया जाता है, और एक-बारहवें सदस्यों का निर्वाचन ऐसे स्नातकों (Graduates) द्वारा किया जाता है जो कम से कम तीन वर्ष पूर्व उस राज्य के क्षेत्र के भीतर किसी विश्वविद्यालय से स्नातक हो चुके हों।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की संवैधानिक स्थिति, शक्तियों तथा उत्तरदायित्वों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 75(1) के अनुसार प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह पर की जाती है, तथा मंत्रिपरिषद में प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या लोकसभा के सदस्यों की कुल संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी, जिसे 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा जोड़ा गया था।
2. संविधान के अनुच्छेद 75(2) के तहत मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं, जिसका विधिक निहितार्थ यह है कि राष्ट्रपति किसी भी मंत्री को प्रधानमंत्री की लिखित सिफारिश के बिना अपनी व्यक्तिगत इच्छा से बर्खास्त कर सकता है, क्योंकि यह राष्ट्रपति की एक अनियंत्रित और स्वतंत्र विवेकीय शक्ति है।
3. संविधान के अनुच्छेद 78 के अंतर्गत प्रधानमंत्री का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह संघ के प्रशासन संबंधी और मंत्रिपरिषद के विनिश्चयों से संबंधित सभी संसूचियाँ राष्ट्रपति को संसूचित करे, और यदि राष्ट्रपति ऐसा अपेक्षा करे तो किसी ऐसे विषय को मंत्रिपरिषद के समक्ष विचार के लिए रखे जिस पर किसी मंत्री ने विनिश्चय कर लिया है किंतु मंत्रिपरिषद ने विचार नहीं किया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा मंत्रिपरिषद की कार्यप्रणाली, शक्तियों और संवैधानिक उत्तरदायित्वों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 67(b) के अनुसार उपराष्ट्रपति को राज्य सभा के ऐसे संकल्प द्वारा उसके पद से हटाया जा सकता है जिसे राज्य सभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत ने पारित किया हो और जिससे लोक सभा सहमत हो, किंतु इस प्रकार के संकल्प को प्रस्तावित करने के लिए कम से कम चौदह दिन पूर्व की लिखित सूचना देना अनिवार्य है।
2. संविधान के अनुच्छेद 75(2) के तहत मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं, जिसका विधिक निहितार्थ यह है कि राष्ट्रपति किसी भी मंत्री को बिना प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत सलाह के अपनी स्वतंत्र इच्छा से बर्खास्त कर सकता है, क्योंकि यह राष्ट्रपति की एक अनियंत्रित विवेकीय शक्ति है।
3. संविधान के अनुच्छेद 78 के अंतर्गत प्रधानमंत्री का यह कर्तव्य है कि वह संघ के प्रशासन संबंधी और मंत्रिपरिषद के विनिश्चयों (Decisions) से संबंधित सभी संसूचियाँ राष्ट्रपति को संसूचित करे, और यदि राष्ट्रपति ऐसा अपेक्षा करे तो मंत्रिपरिषद के समक्ष किसी ऐसे विषय को विचार के लिए रखे जिस पर किसी मंत्री ने विनिश्चय कर लिया है किंतु मंत्रिपरिषद ने विचार नहीं किया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था।
2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है।
3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है।
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भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है।
2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो।
3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
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