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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य की कार्यपालिका, विशेष रूप से राज्यपाल की शक्तियों, अध्यादेश निर्माण और मुख्यमंत्री तथा मंत्रिपरिषद के संवैधानिक दायित्वों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 163 के तहत राज्यपाल को अपने विवेकीय कृत्यों को छोड़कर अन्य सभी कार्यों के निर्वहन के लिए मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से कार्य करना होता है, किंतु यदि राज्यपाल और मंत्रिपरिषद के बीच कोई मतभेद उत्पन्न होता है, तो अनुच्छेद 163(2) के अंतर्गत यह निर्धारित करने का अंतिम प्राधिकार स्वयम् राज्यपाल का होता है कि कोई मामला उसके विवेकीय क्षेत्र के अंतर्गत आता है या नहीं, और उसके इस निर्णय की विधिमान्यता को किसी भी न्यायालय में इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि उसे अपने विवेक से कार्य करना चाहिए था या नहीं।
  2. 2. संविधान के अनुच्छेद 174 के अनुसार राज्यपाल को समय-समय पर राज्य विधानमंडल के सत्र या सत्रों को आहूत करने की शक्ति प्राप्त है, और राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की सलाह के बिना भी अपनी स्वतंत्र शक्ति का प्रयोग करते हुए विधानसभा का सत्र आहूत किया जा सकता है, यदि उसे ऐसा प्रतीत हो कि मंत्रिपरिषद सदन का सामना करने से बच रही है और बहुमत खो चुकी है।
  3. 3. राज्य की मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से राज्य की विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है (अनुच्छेद 164), जिसका विधिक निहितार्थ यह है कि यदि विधानसभा द्वारा मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली सरकार के विरुद्ध कोई अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दिया जाता है, तो मंत्रिपरिषद को सामूहिक रूप से त्यागपत्र देना पड़ता है, और मुख्यमंत्री के पदत्याग या निधन की स्थिति में संपूर्ण मंत्रिपरिषद स्वतः विघटित हो जाती है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 163(1) के अनुसार, जिन बातों को छोड़कर राज्यपाल को इस संविधान द्वारा या इसके अधीन अपने कृत्यों या उनमें से किसी को अपने विवेक से करने की अपेक्षा की गई है, वहाँ राज्यपाल को अपने कृत्यों का प्रयोग करने में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होगा। साथ ही, अनुच्छेद 163(2) के तहत यदि कोई प्रश्न उठता है कि कोई विषय राज्यपाल के विवेक का विषय है या नहीं, तो राज्यपाल का इस संबंध में किया गया निर्णय अंतिम होगा और उसकी विधिमान्यता को किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जा सकता। कथन 2 गलत है: सामान्य परिस्थितियों में राज्यपाल विधानमंडल का सत्र मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही आहूत या सत्रावसान करता है। सर्वोच्च न्यायालय (जैसे 'नवीन जिंदल बनाम उत्तराखंड राज्य' वाद) ने यह स्पष्ट किया है कि राज्यपाल अपनी मर्जी से या मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना विधानसभा का सत्र आहूत नहीं कर सकता, जब तक कि मंत्रिपरिषद ने स्पष्ट रूप से बहुमत खोने के संकेत न दिए हों या मुख्यमंत्री ने खुद सत्र बुलाने से मना न किया हो (हालाँकि फ्लोर टेस्ट के विशिष्ट मामलों में राज्यपाल के पास सीमित विवेकीय शक्ति होती है, किंतु सामान्यतः सत्र आहूत करने की शक्ति मंत्रिपरिषद की सलाह से ही संचालित होती है)। कथन 3 सही है: संविधान के अनुच्छेद 164(2) के अनुसार मंत्रिपरिषद विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है। संसदीय परंपराओं के अनुसार मुख्यमंत्री सरकार का धुरी होता है, अतः मुख्यमंत्री के पद त्यागने या निधन होने पर पूरी मंत्रिपरिषद स्वतः विघटित हो जाती है। इस विषय पर विस्तृत अध्ययन के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के अध्यायों का संदर्भ लें।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत केंद्र-राज्य विधायी संबंधों और अंतर-राज्यीय परिषद् के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 249 के अनुसार, यदि राज्य सभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत से यह संकल्प पारित कर देती है कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक या expedient है कि संसद राज्य सूची में शामिल किसी विषय पर विधि बनाए, तो संसद को पूरे भारत या उसके किसी भाग के लिए उस विषय पर कानून बनाने की शक्ति मिल जाती है, और ऐसा संकल्प अधिकतम दो वर्ष की अवधि के लिए प्रवृत्त रहता है। 2. अंतर-राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) का गठन संविधान के अनुच्छेद 263 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है, तथा सरकारिया आयोग (1983-88) की सिफारिश पर वर्ष 1990 में स्थापित इस स्थायी निकाय का मुख्य कार्य राज्यों के बीच उत्पन्न विवादों की जाँच करना, सलाह देना तथा उन विषयों पर चर्चा करना है जिनमें राज्यों या केंद्र और राज्यों के समान हित हैं। 3. अनुच्छेद 262 के अंतर्गत संसद को अंतर-राज्यीय नदियों या नदी घाटियों के जल के प्रयोग, वितरण या नियंत्रण से संबंधित किसी विवाद या परिवाद के न्यायनिर्णयन के लिए विधि द्वारा उपबंध करने की शक्ति प्राप्त है, तथा इस अनुच्छेद के तहत बनाई गई संसद की विधि के अंतर्गत यदि कोई कानून बनाया जाता है, तो उसमें सर्वोच्च न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय की अधिकारिता को पूर्णतः वर्जित (Barred) किया जा सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान के ऐतिहासिक विकास के संदर्भ में, 'पिट्स इंडिया एक्ट, 1784' (Pitt's India Act, 1784) द्वारा निम्नलिखित में से कौन से प्रमुख प्रावधान या संस्थागत परिवर्तन किए गए थे? 1. इस अधिनियम ने कंपनी के व्यापारिक और राजनीतिक कार्यों को पहली बार पृथक कर दिया, जिसके तहत व्यापारिक मामलों के प्रबंधन के लिए 'कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स' (Court of Directors) और राजनीतिक मामलों के प्रबंधन के लिए 'बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल' (Board of Control) नामक एक नए निकाय की स्थापना की गई। 2. बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल को भारत में ब्रिटिश सिविल और सैन्य सरकार तथा राजस्व संबंधी सभी गतिविधियों के अधीक्षण और नियंत्रण की पूर्ण शक्ति प्रदान की गई, जिससे भारत में 'द्वैध शासन' (Double Government) प्रणाली की शुरुआत हुई। 3. इस अधिनियम के माध्यम से गवर्नर-जनरल की परिषद की सदस्य संख्या चार से घटाकर तीन कर दी गई, जिसमें मुख्य सेनापति (Commander-in-Chief) को विशेष रूप से परिषद का स्थायी सदस्य बनाया गया ताकि बंबई और मद्रास प्रेसीडेंसी के साथ नीतिगत मामलों में समन्वय स्थापित किया जा सके। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संसद की विधायी प्रक्रिया और सदनों की शक्तियों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 107 के अंतर्गत धन विधेयकों को छोड़कर किसी साधारण विधेयक को संसद के किसी भी सदन में पुनः स्थापित किया जा सकता है, और यदि कोई साधारण विधेयक दोनों सदनों के बीच गतिरोध के कारण संयुक्त बैठक (Joint Sitting) में पारित किया जाता है, तो इसके लिए राज्यसभा की अंतिम सहमति अनिवार्य होती है, भले ही लोकसभा में उसका बहुमत न हो। 2. संविधान के अनुच्छेद 109 के अनुसार धन विधेयक (Money Bill) राज्यसभा में पुनः स्थापित नहीं किया जा सकता है, और लोकसभा द्वारा पारित धन विधेयक जब राज्यसभा को भेजा जाता है, तो राज्यसभा को उसे अपनी सिफारिशों के साथ या बिना सिफारिशों के चौदह दिन के भीतर लोकसभा को वापस लौटाना अनिवार्य होता है, और यदि राज्यसभा निर्धारित अवधि में विधेयक वापस नहीं करती है, तो वह दोनों सदनों द्वारा उसी रूप में पारित मान लिया जाता है जिस रूप में वह लोकसभा द्वारा पारित किया गया था। 3. संविधान के अनुच्छेद 108 के तहत बुलाई जाने वाली संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है, और यदि लोकसभा अध्यक्ष अनुपस्थित हैं, तो लोकसभा का उपाध्यक्ष या यदि वह भी अनुपस्थित है, तो राज्यसभा का उपसभापति उसकी अध्यक्षता करता है, किंतु किसी भी परिस्थिति में राज्यसभा का सभापति (उपराष्ट्रपति) संयुक्त बैठक की अध्यक्षता नहीं कर सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? राष्ट्रपति किस अनुच्छेद के तहत क्षमादान देते हैं? भारतीय संविधान के भाग IV में वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) और उनसे संबंधित संवैधानिक प्रावधानों तथा न्यायिक निर्णयों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 48A के अनुसार राज्य, देश के पर्यावरण के संरक्षण तथा संवर्धन का और वन तथा वन्यजीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा, जिसे 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया था, जबकि इसी संशोधन के माध्यम से अनुच्छेद 43A जोड़कर उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रावधान किया गया। 2. सर्वोच्च न्यायालय ने अपने विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे 'केशवानंद भारती वाद' और 'मिनर्वा मिल्स वाद') में यह स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है कि नीति निर्देशक तत्व और मौलिक अधिकार एक-दूसरे के पूरक हैं, और यदि संसद अनुच्छेद 39(b) और 39(c) में उल्लिखित सामाजिक-आर्थिक न्याय के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कोई कानून बनाती है जो अनुच्छेद 14 या 19 का उल्लंघन करता है, तो ऐसे कानून को अनुच्छेद 31C के तहत मौलिक अधिकारों पर प्राथमिकता दी जा सकती है। 3. यद्यपि नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि निर्माण में इन्हें लागू करना राज्य का कर्तव्य है, तथापि संविधान के अनुच्छेद 37 के अनुसार इन्हें किसी भी न्यायालय द्वारा न्यायोचित (Justiciable) बनाया गया है, जिसका अर्थ है कि नागरिक इनके प्रवर्तन के लिए सीधे उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय की शरण ले सकते हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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