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Indian Polity
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भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) और चुनाव सुधारों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग को संसद, राज्य legislatures, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के निर्वाचनों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति प्रदान की गई है, और मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया तथा उसके सेवा शर्तें उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान होती हैं।
- 2. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951) की धारा 126 के अनुसार चुनाव प्रचार समाप्त होने के समय (अर्थात मतदान समाप्त होने के लिए नियत समय से ठीक पहले के 48 घंटों की अवधि) के दौरान किसी भी सार्वजनिक सभा, जुलूस या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से चुनावी प्रचार पर पूर्ण प्रतिबंध होता है।
- 3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'लोक जनहित फाउंडेशन बनाम भारत संघ' मामले में दिए गए निर्देशों के तहत चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों के लिए यह अनिवार्य कर दिया है कि वे अपने उम्मीदवारों के चयन के समय उनके आपराधिक पृष्ठभूमि (Criminal Antecedents) का विवरण स्थानीय समाचार पत्रों और टीवी चैनलों में प्रकाशित करवाएं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण करता है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया (महाभियोग जैसी प्रक्रिया) के समान ही हटाया जा सकता है। कथन 2 सही है क्योंकि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126 के तहत मतदान समाप्त होने के निर्धारित समय से 48 घंटे पहले की अवधि (Silence Period) में चुनाव प्रचार पर रोक होती है। कथन 3 भी सही है; सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों के अनुपालन में निर्वाचन आयोग ने राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए आपराधिक रिकॉर्ड का व्यापक प्रचार करना अनिवार्य किया है। अधिक विस्तृत जानकारी के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर जा सकते हैं।
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ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में भारतीय संविधान के ऐतिहासिक विकास के अंतर्गत पारित 'पिट्स इंडिया एक्ट, 1784' (Pitt's India Act, 1784) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस अधिनियम के माध्यम से ब्रिटिश संसद ने कंपनी के राजनीतिक और वाणिज्यिक कार्यों को पृथक् कर दिया, जिसके तहत वाणिज्यिक मामलों के प्रबंधन के लिए 'बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स' (Board of Directors) तथा राजनीतिक मामलों के नियंत्रण के लिए एक नए निकाय 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' (Board of Control) का गठन किया गया।
2. इस अधिनियम द्वारा बंगाल के गवर्नर-जनरल की परिषद के सदस्यों की संख्या चार से घटाकर तीन कर दी गई, और गवर्नर-जनरल को परिषद के निर्णयों को अस्वीकार करने का वीटो अधिकार (Veto Power) प्रदान किया गया।
3. इस अधिनियम के द्वारा पहली बार भारत में कंपनी के अधीन क्षेत्र को 'ब्रिटिश अधिकार क्षेत्र' (British Possessions in India) कहा गया, जिससे स्पष्ट हुआ कि ब्रिटिश सरकार का भारत के भू-भाग पर प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित होने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग I (अनुच्छेद 1-4) के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' के प्रावधानों और उनकी संवैधानिक प्रक्रियाओं के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह विधि द्वारा ऐसे निबंधनों और शर्तों को जो वह ठीक समझे, संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना कर सकती है, और यह शक्ति विशेष रूप से उन भू-भागों या राज्यों पर लागू होती है जो पहले से भारतीय संघ का आंतरिक हिस्सा नहीं हैं।
2. अनुच्छेद 3 के अनुसार किसी भी राज्य का क्षेत्र बढ़ाने, घटाने, उसके नाम या सीमा में परिवर्तन करने से संबंधित कोई भी विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के बिना संसद के किसी भी सदन में पुनः स्थापित नहीं किया जा सकता है, तथा राष्ट्रपति के लिए यह अनिवार्य है कि वह ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजे और राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई कोई भी अस्वीकृत करने वाली सिफारिश या राय राष्ट्रपति तथा संसद दोनों के लिए पूर्ण रूप से बाध्यकारी होती है।
3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधानों के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के अधीन नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित बनाई गई कोई भी विधि अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों के लिए संविधान संशोधन नहीं समझी जाएगी, जिसका तात्पर्य यह है कि ऐसी विधियों को संसद द्वारा साधारण बहुमत (Simple Majority) और विधाई प्रक्रिया के सामान्य नियमों के तहत पारित किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और वित्तीय विधेयकों (Financial Bills) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 117(1) के अंतर्गत श्रेणी-I का वित्त विधेयक, जो अनुच्छेद 110 के उपबंधों (क) से (च) में विनिर्दिष्ट सभी या किन्हीं विषयों से संबंधित होता है, केवल लोकसभा में ही पुनः स्थापित किया जा सकता है और इसे प्रस्तुत करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व संस्तुति अनिवार्य होती है, किंतु राज्यसभा इस विधेयक को अस्वीकार करने या इसमें संशोधन करने की पूर्ण विधाई शक्ति रखती है।
2. संविधान के अनुच्छेद 117(3) के अंतर्गत श्रेणी-II का वित्त विधेयक, जिसमें ऐसे उपबंध अंतर्विष्ट हैं जो संसद के किसी सदन द्वारा पारित किए जाने पर भारत की संचित निधि से व्यय उपबंध करने से संबंधित होते हैं, संसद के किसी भी सदन में पुनः स्थापित किया जा सकता है, बशर्ते इसे संसद द्वारा तब तक पारित नहीं किया जा सकता जब तक राष्ट्रपति ने उस सदन को ऐसे विधेयक पर विचार करने के लिए अपनी सिफारिश न दे दी हो।
3. अनुच्छेद 109 के स्पष्ट प्रावधानों के अनुसार, धन विधेयक (Money Bill) को केवल लोकसभा में ही पुनः स्थापित किया जा सकता है, और यदि राज्यसभा धन विधेयक को पारित किए बिना या अपनी सिफारिशों के साथ लोकसभा को वापस भेजती है, तो लोकसभा के लिए राज्यसभा द्वारा सुझाई गई किसी भी सिफारिश को स्वीकार करना संवैधानिक रूप से अनिवार्य होता है।
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भारत के महान्यायवादी (Attorney General for India) और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (Comptroller and Auditor General of India - CAG) के संवैधानिक प्रावधानों, अधिकारों तथा उनकी कार्यप्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 76 के अनुसार महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (During the pleasure of the President) पद धारण करता है, तथा उसे भारत के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है और वह संसद के दोनों सदनों की बैठकों में बोल सकता है तथा मतदान भी कर सकता है।
2. भारत का नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) भारतीय लेखा परीक्षा और लेखा विभाग का प्रमुख होता है, और संविधान के अनुच्छेद 148 के अनुसार उसे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान प्रक्रिया और आधार पर ही राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है, तथा अपने पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी अन्य कार्यालय (Employment) का पात्र नहीं होता है।
3. अनुच्छेद 151 के अनुसार CAG संघ के खातों से संबंधित अपनी लेखा परीक्षा रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपता है, जिसे राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखवाते हैं, और इसके उपरांत इस रिपोर्ट की विस्तृत जाँच संसद की लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee) द्वारा की जाती है।
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भारतीय संविधान के भाग III के अंतर्गत वर्णित मूल अधिकारों (Fundamental Rights) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अनुच्छेद 15(5) के तहत राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए नागरिकों के वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए शिक्षण संस्थानों (निजी शिक्षण संस्थानों सहित, चाहे वे सहायता प्राप्त हों या अशासकीय) में प्रवेश के लिए विशेष उपबंध करने की शक्ति प्रदान की गई है, सिवाय अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के।
2. अनुच्छेद 20(2) के अंतर्गत प्रदान किया गया 'दोहरे खतरे' (Double Jeopardy) का संरक्षण केवल किसी न्यायालय या न्यायिक अधिकरण (Judicial Tribunal) के समक्ष अभियोजन और दंड पर लागू होता है, और यह विभागीय या प्रशासनिक प्राधिकारियों द्वारा दी गई कार्यवाहियों और दंडों पर विस्तारित नहीं होता है।
3. अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार में 'त्वरित विचारण' (Speedy Trial) का अधिकार भी शामिल है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने 'हुस्नारा खातून बनाम बिहार राज्य' वाद में एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी थी।
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