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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा मंत्रिपरिषद की संवैधानिक स्थिति, शक्तियों और उत्तरदायित्वों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 63 के अनुसार भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा, जो राज्य सभा का पदेन सभापति होगा और जब वह राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है या उसके कृत्यों का निर्वहन करता है, तब वह राज्य सभा के सभापति के रूप में किसी भी कर्तव्य का पालन नहीं करेगा और न ही उसे राज्य सभा के सभापति के वेतन या भत्ते प्राप्त होंगे।
  2. 2. संविधान के अनुच्छेद 75(1) के अंतर्गत प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह पर की जाती है, तथा मंत्रिपरिषद में प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या लोकसभा के सदस्यों की कुल संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी, जिसे 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा जोड़ा गया था।
  3. 3. मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है (अनुच्छेद 75क के अंतर्गत), जिसका अर्थ यह है कि यदि लोकसभा द्वारा मंत्रिपरिषद के विरुद्ध कोई अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दिया जाता है, तो संपूर्ण मंत्रिपरिषद को सामूहिक रूप से त्यागपत्र देना पड़ता है, भले ही नीतिगत मतभेद किसी एक विशेष विभाग या मंत्री से संबंधित क्यों न हो।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

दिए गए सभी कथन पूर्णतः सत्य हैं। कथन 1 के अनुसार, अनुच्छेद 63 के तहत भारत के उपराष्ट्रपति का पद है और वह राज्य सभा के पदेन सभापति होते हैं (अनुच्छेद 64)। जब वे राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हैं, तो उन्हें राज्य सभा के सभापति का वेतन नहीं मिलता बल्कि राष्ट्रपति का वेतन-भत्ता प्राप्त होता है (अनुच्छेद 97)। कथन 2 के अनुसार, अनुच्छेद 75(1) के तहत प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं और 91वें संविधान संशोधन (2003) द्वारा मंत्रिपरिषद का आकार लोकसभा के कुल सदस्यों का अधिकतम 15% निर्धारित किया गया है। कथन 3 के अनुसार, मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है (अनुच्छेद 75(3)), जिसका अर्थ है कि 'वे एक साथ तैरते हैं और एक साथ डूबते हैं'। परीक्षा के लिए और अधिक गहन अध्ययन हेतु भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के विस्तृत अध्यायों का अध्ययन करें।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य विधानमंडल के गठन, विधानसभा (Legislative Assembly) और विधान परिषद (Legislative Council) की शक्तियों तथा उनकी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 169 के अनुसार संसद किसी राज्य में विधान परिषद का सृजन या उत्सादन कर सकती है, यदि संबंधित राज्य की विधानसभा इस आशय का संकल्प अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पारित कर दे, और ऐसा विधि निर्माण अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए संविधान का संशोधन नहीं माना जाता है। 2. संविधान के अनुच्छेद 171 के तहत किसी राज्य की विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या उस राज्य की विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती है, किंतु विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या किसी भी स्थिति में 40 से कम नहीं होगी, सिवाय उस अपवाद के जहाँ संसद कानून द्वारा कोई विशेष उपबंध करे। 3. विधान परिषद के सदस्यों के निर्वाचन में, एक-तिहाई सदस्य स्थानीय निकायों के निर्वाचक मंडल द्वारा, एक-तिहाई सदस्य विधानसभा के सदस्यों द्वारा अपने से भिन्न व्यक्तियों में से, एक-बारहवें सदस्य तीन वर्ष से स्नातकों द्वारा, तथा एक-बारहवें सदस्य कम से कम तीन वर्ष से अध्यापन कर रहे माध्यमिक विद्यालयों से उच्च स्तर के शिक्षकों द्वारा चुने जाते हैं, और शेष एक-तिहाई सदस्यों को राज्यपाल द्वारा साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन और समाज सेवा के क्षेत्र से मनोनीत किया जाता है। 4. साधारण विधेयक के मामले में गतिरोध उत्पन्न होने पर, यदि विधान परिषद किसी विधेयक को अस्वीकृत कर देती है या विधानसभा द्वारा पारित संशोधन से असहमत होती है या विधेयक को तीन महीने तक रोक लेती है, तो विधानसभा द्वारा दोबारा पारित किए जाने पर विधान परिषद उस विधेयक को अधिकतम दो महीने की अवधि के लिए और रोक सकती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारत के महान्यायवादी (Attorney General) और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 76 के अंतर्गत महान्यायवादी को संसद के दोनों सदनों या उनकी संयुक्त बैठकों में बोलने और भाग लेने का अधिकार प्राप्त है, किंतु उसे संसद की किसी भी समिति का सदस्य बनाए जाने पर भी मतदान करने का कोई संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है। 2. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) संसद की 'लोक लेखा समिति' (Public Accounts Committee) के मार्गदर्शक, मित्र और दार्शनिक के रूप में कार्य करता है, तथा संघ के लेखा-परीक्षण प्रतिवेदनों को राष्ट्रपति को सौंपता है, जिसे राष्ट्रपति द्वारा संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखवाया जाता है। 3. भारत का महान्यायवादी पूर्णकालिक सरकारी कर्मचारी होता है और उसके निजी विधिक अभ्यास (Private Legal Practice) पर संविधान द्वारा पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है, जिससे वह सरकार के विरुद्ध किसी भी मामले में पैरवी नहीं कर सकता। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारत के महान्यायवादी (Attorney General for India) और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के संवैधानिक दायित्वों, वित्तीय नियंत्रण और संसदीय विशेषाधिकारों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 76 के अंतर्गत नियुक्त भारत के महान्यायवादी को देश के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है, तथा उसे संसद के दोनों सदनों या उनकी संयुक्त बैठकों और किसी भी संसदीय समिति (जिसका वह सदस्य है) की कार्यवाही में भाग लेने और बोलने का पूर्ण अधिकार है, किंतु उसे संसद के किसी भी सदन में विधिवत मतदान (Voting) करने का अधिकार प्राप्त नहीं है। 2. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) न केवल भारत की संचित निधि से किए जाने वाले सभी खर्चों की लेखापरीक्षा करता है, बल्कि वह केंद्र और राज्यों के उन सभी निकायों और निगमों की भी लेखापरीक्षा करता है जिन्हें सरकार द्वारा पर्याप्त वित्तीय अनुदान प्राप्त होता है, तथा CAG द्वारा तैयार की गई सभी लेखापरीक्षा रिपोर्टें सीधे संसद या राज्य विधानसभा में प्रस्तुत की जाती हैं, बिना किसी संवैधानिक प्राधिकारी के पूर्व अवलोकन के। 3. अनुच्छेद 148 के अनुसार नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को उसके पद से केवल उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है, तथा सीएजी अपनी पदावधि की समाप्ति के पश्चात भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी प्रकार के लाभ के पद (Office of Profit) या अन्य कार्यालय के पात्र नहीं होते हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? 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