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Indian Polity
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP - Article 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 39A के तहत जोड़ी गई 'समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता' की व्यवस्था और अनुच्छेद 43A के तहत 'उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी' का उपबंध मूल संविधान में निहित थे, जिन्हें बाद में 44वें संविधान संशोधन द्वारा संशोधित किया गया।
  2. 2. सर्वोच्च न्यायालय ने 'चाम्पाकम दोरैराजन बनाम मद्रास राज्य (1951)' मामले में यह निर्धारित किया था कि नीति निर्देशक तत्व मूल अधिकारों के अधीनस्थ हैं और किसी भी संघर्ष की स्थिति में मूल अधिकार ही प्रभावी होंगे, किंतु बाद के न्यायिक निर्णयों (विशेषकर केशवानंद भारती और मिनर्वा मिल्स वाद) में यह स्पष्ट किया गया कि संविधान की मूल आत्मा इन दोनों के बीच सामंजस्य और संतुलन पर टिकी है।
  3. 3. संविधान के अनुच्छेद 45 में 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 के माध्यम से संशोधन करके 'छह वर्ष से कम आयु के बालकों के लिए प्रारंभिक बचपन देखरेख और शिक्षा (ECCV/ECE)' का उपबंध अंतःस्थापित किया गया, जबकि मूल रूप से इस अनुच्छेद में चौदह वर्ष की आयु तक के बालकों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 39A (समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता) और अनुच्छेद 43A (उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी) मूल संविधान में नहीं थे, बल्कि इन्हें 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा अंतःस्थापित किया गया था। कथन 2 सत्य है; 'चाम्पाकम दोरैराजन वाद (1951)' में उच्चतम न्यायालय ने यह अभीप्सा दी थी कि DPSP मूल अधिकारों के अधीन हैं, जिसे संसद ने 42वें संशोधन द्वारा पलटने का प्रयास किया, किंतु 'मिनर्वा मिल्स वाद (1980)' में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मूल अधिकार और DPSP एक-दूसरे के पूरक हैं। कथन 3 पूर्णतः सत्य है; मूल संविधान के अनुच्छेद 45 में 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देने का प्रावधान था, जिसे 86वें संविधान संशोधन 2002 द्वारा अनुच्छेद 21A में मूल अधिकार बना दिया गया तथा अनुच्छेद 45 को संशोधित करके 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों की देखभाल से संबंधित नया नीति निर्देशक तत्व जोड़ा गया। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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→ भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है। 2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो। 3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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