Indian Polity
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) और उनके विशिष्ट अनुच्छेदों के क्रियान्वयन एवं न्यायिक समीक्षा के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 43 के अंतर्गत राज्य, उपयुक्त विधान या आर्थिक संगठन द्वारा या किसी अन्य रीति से, कृषि के, उद्योग के या अन्य प्रकार के सभी श्रमिकों को काम, निर्वाह मजदूरी, शिष्ट जीवन स्तर और अवकाश तथा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों की सुलभ कराने का प्रयास करेगा, तथा विशेष रूप से राज्य ग्रामीण क्षेत्रों में व्यक्तिगत या सहकारी आधार पर कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने का प्रयास करेगा।
- 2. संविधान के अनुच्छेद 45 के अंतर्गत मूलतः 14 वर्ष की आयु पूरी करने तक सभी बालकों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने का प्रावधान था, किंतु 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 द्वारा इस अनुच्छेद की विषय-वस्तु को परिवर्तित कर इसे 'प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा' (Early childhood care and education) से संबंधित बना दिया गया, जिसे अब 6 वर्ष से कम आयु के बालकों के लिए उपबंधित किया गया है।
- 3. सर्वोच्च न्यायालय ने 'केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)' और उसके पश्चात के कई निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि यद्यपि नीति निर्देशक तत्व मूल अधिकारों से सीधे तौर पर श्रेष्ठ नहीं हैं, किंतु यदि संसद अनुच्छेद 39(b) और 39(c) में निर्दिष्ट सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अनुच्छेद 31C के तहत कोई कानून बनाती है, तो उसे इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 के अधिकारों का उल्लंघन करती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
दिए गए सभी कथन नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) के संबंध में पूर्णतः सत्य हैं। प्रथम कथन के अनुसार अनुच्छेद 43 श्रमिकों के लिए निर्वाह मजदूरी और कुटीर उद्योगों के प्रोत्साहन की बात करता है। द्वितीय कथन में 86वें संविधान संशोधन, 2002 (वर्ष 2002 में पारित) द्वारा अनुच्छेद 45 में किए गए संशोधन का सही उल्लेख है जिसके तहत 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों की देखभाल का प्रावधान जोड़ा गया। तृतीय कथन अनुच्छेद 31C और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों की पुष्टि करता है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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भारतीय संविधान के ऐतिहासिक विकास और ब्रिटिश राज के दौरान पारित विभिन्न अधिनियमों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 के माध्यम से ब्रिटिश संसद ने पहली बार ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासनिक और राजनीतिक कार्यों को मान्यता दी तथा इसके तहत बंगाल के गवर्नर को 'बंगाल का गवर्नर-जनरल' पदनाम दिया गया, जिसके पहले गवर्नर-जनरल लॉर्ड वारेन हेस्टिंग्स बने और उनकी सहायता के लिए एक चार-सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया।
2. पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 द्वारा कंपनी के राजनीतिक और वाणिज्यिक कार्यों को पृथक कर दिया गया; इसके अंतर्गत राजनीतिक मामलों के प्रबंधन के लिए 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' (नियंत्रण बोर्ड) और वाणिज्यिक मामलों के लिए 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स' (निदेशक मंडल) की स्थापना की गई, जिससे ब्रिटिश सरकार का कंपनी के मामलों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित हो गया।
3. चार्टर अधिनियम, 1833 ने भारत में केंद्रीयकरण की दिशा में एक निर्णायक कदम उठाया, जिसके तहत बंगाल के गवर्नर-जनरल को 'भारत का गवर्नर-जनरल' बना दिया गया और देश की सभी नागरिक तथा सैन्य शक्तियाँ इस नए पद में निहित कर दी गईं, तथा इस अधिनियम के माध्यम से लॉर्ड विलियम बेंटिक भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल बने और कंपनी की एक व्यापारिक निकाय के रूप में बची हुई वाणिज्यिक गतिविधियों को भी पूर्णतः समाप्त कर दिया गया।
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भारतीय संविधान के महत्वपूर्ण संशोधनों और आपातकालीन उपबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा का आधार 'आंतरिक अशांति' (Internal Disturbance) शब्द को प्रतिस्थापित कर 'सशस्त्र विद्रोह' (Armed Rebellion) किया गया, तथा यह भी प्रावधान किया गया कि राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा को केवल मंत्रिमंडल (Cabinet) के लिखित अनुमोदन के पश्चात ही राष्ट्रपति द्वारा जारी किया जा सकता है।
2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा यह उपबंधित किया गया कि राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 20 और अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को निलंबित नहीं किया जा सकता है।
3. अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन की अधिकतम अवधि, बिना किसी विशेष अनुमोदन या समीक्षा के, लगातार बढ़ाई जाकर कुल 3 वर्ष तक की जा सकती है, किंतु 44वें संशोधन अधिनियम के पश्चात यह अनिवार्य कर दिया गया कि 1 वर्ष के पश्चात इसे आगे बढ़ाने के लिए यह आवश्यक है कि पूरे देश में या संबंधित राज्य के किसी भाग में राष्ट्रीय आपातकाल लागू हो तथा निर्वाचन आयोग यह प्रमाणित करे कि राज्य में विधानसभा के चुनाव कराना कठिन है।
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भारतीय संविधान के भाग-III (मूल अधिकार) के अंतर्गत प्रदत्त स्वतंत्रता के अधिकारों और विभिन्न न्यायिक दृष्टांतों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के अंतर्गत कोई भी वृत्ति, व्यापार या कारोबार करने का मूल अधिकार प्रदत्त किया गया है, किंतु राज्य इस अधिकार के प्रयोग पर 'व्यापक लोक हित' (General Public Interest) में युक्तियुक्त निर्बंधन आरोपित कर सकता है, और इसके तहत राज्य किसी भी व्यापार या कारोबार पर पूर्ण एकाधिकार (Complete Monopoly) स्थापित करने के लिए भी कानून बना सकता है, जिसके लिए नागरिकों के अपने व्यवसाय के संवैधानिक अधिकार का पूर्णतः समाप्त होना असंवैधानिक नहीं माना जाएगा।
2. 'अनुच्छेद 21' के अंतर्गत दिए गए 'प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण' के अधिकार के दायरे में 'निजता का अधिकार' (Right to Privacy) को उच्चतम न्यायालय की नौ-सदस्यीय संविधान पीठ द्वारा 'के. एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017)' मामले में सर्वसम्मति से एक मौलिक अधिकार घोषित किया गया था, जो अनुच्छेद 21 के साथ-साथ भाग-III के अन्य अनुच्छेदों के अंतर्गत भी अंतर्निहित है।
3. संविधान के अनुच्छेद 22 के उपबंधों के अनुसार निवारक नजरबंदी (Preventive Detention) के अधीन किसी भी व्यक्ति को, चाहे वह विदेशी हो या भारत का नागरिक, किसी भी परिस्थिति में बिना सलाहकार बोर्ड (Advisory Board) की राय प्राप्त किए तीन महीने से अधिक की अवधि के लिए निरुद्ध नहीं रखा जा सकता, और संसद के पास यह शक्ति नहीं है कि वह इस तीन महीने की अवधि को बिना बोर्ड की संस्तुति के बढ़ा सके।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्च न्यायालयों (High Courts) की रिट अधिकारिता (Writ Jurisdiction) और अधीनस्थ न्यायपालिका के प्रशासनिक नियंत्रण के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय को रिट जारी करने की जो शक्ति प्राप्त है, वह न केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए बल्कि 'अन्य प्रयोजनों' (जैसे कि साधारण विधिक अधिकारों के उल्लंघन पर) के लिए भी प्रयोग की जा सकती है, और इस दृष्टि से उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार उच्चतम न्यायालय के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत प्रदत्त रिट क्षेत्राधिकार की तुलना में अधिक विस्तृत है।
2. संविधान के अनुच्छेद 233 के प्रावधानों के अंतर्गत किसी राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा उस राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करने के पश्चात ही की जाती है, और इसमें उच्च न्यायालय की सहमति अनिवार्य होती है।
3. संविधान के अनुच्छेद 235 के तहत राज्य के सभी अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण, जिसमें जिला न्यायालयों के नीचे के न्यायालयों के अधिकारियों की पोस्टिंग, प्रमोशन, पदस्थापन और अनुशासनिक नियंत्रण शामिल है, पूर्णतः संबंधित राज्य सरकार (राज्यपाल) के प्रशासनिक क्षेत्राधिकार में निहित होता है, और इसमें उच्च न्यायालय की कोई प्रशासनिक भूमिका नहीं होती है।
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था।
2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है।
3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है।
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भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है।
2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो।
3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
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