Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 63 के अनुसार भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा, जो राज्यसभा का पदेन सभापति होगा और वह इस रूप में अन्य कोई लाभ का पद धारण नहीं करेगा, किंतु जब वह राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है या उसके कृत्यों का निर्वहन करता है, तब वह राज्यसभा के सभापति के रूप में किसी भी वेतन या भत्ते का हकदार नहीं होगा, बल्कि उसे राष्ट्रपति के वेतन और परिलब्धियों प्राप्त करने का अधिकार होगा।
- 2. अनुच्छेद 74(1) के तहत राष्ट्रपति को उसके कृत्यों के प्रयोग में सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होगा, और राष्ट्रपति अपनी शक्तियों का प्रयोग इस सलाह के अनुसार करने के लिए पूरी तरह बाध्य है, तथा मंत्रिपरिषद द्वारा राष्ट्रपति को दी गई सलाह की किसी भी न्यायालय में जाँच की जा सकती है।
- 3. अनुच्छेद 75(2) के उपबंधों के अनुसार प्रधानमंत्री और अन्य मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत अपने पद पर बने रहते हैं, जिसका तात्पर्य यह है कि राष्ट्रपति प्रधानमंत्री को व्यक्तिगत रूप से कभी भी और किसी भी कारण से बर्खास्त कर सकता है, भले ही लोकसभा में प्रधानमंत्री के पास स्पष्ट बहुमत क्यों न हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 63, 64 और 97 के अनुसार उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है और जब वह राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है, तब उसे राज्यसभा के सभापति का वेतन न मिलकर राष्ट्रपति की उपलब्धियाँ और भत्ते मिलते हैं। कथन 2 गलत है क्योंकि 42वें और 44वें संविधान संशोधन के माध्यम से यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह को पुनर्विचार के लिए एक बार वापस भेज सकता है, किंतु पुनर्विचार के पश्चात दी गई सलाह के अनुसार कार्य करने के लिए वह बाध्य होता है; इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 74(2) के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार मंत्रिपरिषद द्वारा राष्ट्रपति को दी गई सलाह की किसी भी न्यायालय में जाँच **नहीं** की जा सकती (Non-justiciable)। कथन 3 गलत है क्योंकि यद्यपि सैद्धांतिक रूप से मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं, किंतु व्यावहारिक और संवैधानिक रूप से प्रधानमंत्री को तब तक बर्खास्त नहीं किया जा सकता जब तक कि उसके पास लोकसभा का बहुमत है; लोकसभा में विश्वास खोने पर ही उसे हटाया जा सकता है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के विस्तृत अध्यायों का अध्ययन करें।
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भारतीय संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 के प्रावधानों और पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 243-D के अंतर्गत पंचायतों के सभी स्तरों पर महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण कुल भरी जाने वाली सीटों के कम से कम एक-तिहाई (33%) से कम नहीं होगा, और यह आरक्षण प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरी जाने वाली सीटों के साथ-साथ पंचायतों में अध्यक्षों (Chairpersons) के पदों पर भी लागू होता है।
2. अनुच्छेद 243-H के अनुसार किसी राज्य का विधानमंडल विधि द्वारा किसी पंचायत को कर, शुल्क, टोल और फीस आरोपित करने, वसूलने तथा विनियमित करने की शक्ति प्रदान कर सकता है, किंतु इस संशोधन के तहत पंचायतों को कर लगाने की शक्ति देना केंद्र सरकार द्वारा अनिवार्य कर दिया गया है, जिसे राज्य सरकार अस्वीकार नहीं कर सकती।
3. संविधान के अनुच्छेद 243-K के उपबंधों के तहत प्रत्येक राज्य में पंचायतों के लिए निर्वाचनों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण करने की जिम्मेदारी एक स्वतंत्र 'राज्य निर्वाचन आयोग' (State Election Commission) में निहित होती है, जिसके राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है और उसे उसके पद से उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए लागू होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत नागरिकता के प्रावधानों (अनुच्छेद 5-11) और नागरिकता संशोधन अधिनियमों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 9 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार यदि कोई भारत का नागरिक स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता अर्जित कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त (Termination) हो जाएगी, और इसके लिए सरकार द्वारा किसी औपचारिक आदेश की आवश्यकता नहीं होती।
2. अनुच्छेद 11 के तहत भारतीय संसद को नागरिकता के अर्जन और समाप्ति तथा नागरिकता से संबंधित अन्य सभी विषयों के संबंध में उपबंध करने की संपूर्ण और अनन्य शक्ति प्रदान की गई है, जिसके अंतर्गत संसद ने 'नागरिकता अधिनियम, 1955' (Citizenship Act, 1955) पारित किया था।
3. नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 (CAA) के अंतर्गत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से 31 दिसंबर 2014 को या उससे पहले भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के प्रवासियों को अवैध प्रवासी नहीं माना जाएगा और उन्हें देश की 'देशीकरण' (Naturalisation) प्रक्रिया के माध्यम से नागरिकता प्रदान करने के लिए आवश्यक निवास अवधि को 11 वर्ष से घटाकर 5 वर्ष कर दिया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) और उनके न्यायिक तथा गैर-न्यायिक स्वरूप के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 37 के अनुसार नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा, किंतु इन्हें किसी भी न्यायालय द्वारा न्यायोचित (Justiciable) नहीं ठहराया जा सकता है, अर्थात् इनके उल्लंघन पर न्यायालय द्वारा इन्हें प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता।
2. संविधान के अनुच्छेद 39A के तहत 'समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता' का प्रावधान जोड़ा गया था, जिसे मूल संविधान में शामिल नहीं किया गया था, बल्कि इसे 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा अंतःस्थापित किया गया था।
3. सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में यह प्रतिपादित किया है कि नीति निर्देशक तत्व और मूल अधिकार एक-दूसरे के पूरक हैं तथा इनके बीच संतुलन संविधान के 'मूल ढांचे' (Basic Structure) का एक अभिन्न अंग है, और निदेशक तत्वों को प्रभावी बनाने के लिए यदि कोई विधि अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 के मूल अधिकारों का अतिक्रमण करती है, तो उसे अनुच्छेद 31C के तहत असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता यदि वह विधि अनुच्छेद 39(b) या 39(c) के लक्ष्यों को पूरा करती हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्यों के उच्च न्यायालयों (High Courts) और अधीनस्थ न्यायालयों की शक्तियों, क्षेत्राधिकारों एवं संरचना के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत प्रत्येक उच्च न्यायालय को अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए तथा किसी अन्य प्रयोजन के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, निषेध, अधिकार-पृच्छा और उत्प्रेषण रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है, और इस अनुच्छेद के अंतर्गत उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार (Writ Jurisdiction) उच्चतम न्यायालय के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत प्रदत्त रिट क्षेत्राधिकार की तुलना में अधिक विस्तृत है क्योंकि यह न केवल मूल अधिकारों बल्कि 'अन्य प्रयोजनों' (कानूनी अधिकारों) के लिए भी रिट जारी कर सकता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 233 के अनुसार किसी राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा उस राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करने के पश्चात की जाती है, किंतु न्यायिक सेवा के अन्य सदस्यों (जिला न्यायाधीशों से भिन्न) की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा राज्य लोक सेवा आयोग और उच्च न्यायालय से परामर्श करके नियमों के तहत की जाती है।
3. संविधान के अनुच्छेद 235 के तहत अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण, जिसमें जिला न्यायालयों के नीचे के न्यायालयों के अधिकारियों की पोस्टिंग, प्रमोशन और उन्हें छुट्टी देने का अधिकार शामिल है, पूरी तरह से संबंधित राज्य के राज्यपाल के प्रशासनिक क्षेत्राधिकार के अंतर्गत निहित होता है, और इसमें उच्च न्यायालय की कोई भूमिका नहीं होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था।
2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है।
3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है।
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भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है।
2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो।
3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
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