Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की क्षेत्राधिकार शक्तियों और संविधान पीठ (Constitutional Bench) के गठन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की शक्ति प्राप्त है, और यदि राष्ट्रपति लोक महत्व के किसी प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय की राय मांगते हैं, तो उच्चतम न्यायालय के लिए यह अनिवार्य है कि वह उस पर अपनी राय राष्ट्रपति को प्रेषित करे।
- 2. संविधान के अनुच्छेद 145(3) के अनुसार, संविधान के निर्वचन (Interpretation of the Constitution) से संबंधित किसी भी मामले की सुनवाई करने के लिए उच्चतम न्यायालय की पीठ में न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या पाँच होनी अनिवार्य है, तथा ऐसे मामलों में निर्णय बहुमत के आधार पर दिया जाता है, किंतु किसी भी न्यायाधीश को असहमत होने पर अपना अलग 'असंतोषी निर्णय' (Dissenting Judgment) देने की अनुमति नहीं होती है।
- 3. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित 'तृतीय न्यायाधीश वाद (1998)' में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि मुख्य न्यायाधीश (CJI) को कॉलेजियम के अन्य वरिष्ठतम सदस्यों की सलाह के साथ-साथ देश के विधि मंत्री (Law Minister) की लिखित सहमति प्राप्त करना भी एक संवैधानिक बाध्यता के रूप में अनिवार्य है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 143 के तहत यदि राष्ट्रपति लोक महत्व के किसी प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय की सलाह मांगते हैं, तो न्यायालय सलाह देने के लिए बाध्य नहीं है (यह विवेकाधीन है), और यदि न्यायालय सलाह देता भी है, तो राष्ट्रपति उस सलाह को मानने के लिए बाध्य नहीं होते हैं। इसके अलावा, संविधान पूर्व की किसी संधि या समझौते से उत्पन्न विवादों में राय देना उच्चतम न्यायालय के लिए अनिवार्य हो सकता है, किंतु सामान्य मामलों में नहीं। कथन 2 असत्य है क्योंकि संविधान पीठ (Constitutional Bench) में कम से कम 5 न्यायाधीश होते हैं, और बहुमत के निर्णय के साथ-साथ असमत रहने वाले न्यायाधीशों को अपना अलग 'असंतोषी निर्णय' (Dissenting Judgment) लिखने का पूर्ण अधिकार होता है। कथन 3 असत्य है क्योंकि 'तृतीय न्यायाधीश वाद (1998)' में सर्वोच्च न्यायालय ने कॉलेजियम प्रणाली को स्पष्ट किया था, जिसमें विधि मंत्री की लिखित सहमति को अनिवार्य नहीं बनाया गया था, बल्कि मुख्य न्यायाधीश और उनके चार वरिष्ठतम सहयोगियों के collegium के परामर्श को अनिवार्य किया गया था। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पढ़ें।
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) में प्रयुक्त शब्दावली, इसके दार्शनिक…
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भारतीय संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत…
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भारतीय संविधान के अंतर्गत अंतर-राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) और केंद्र-राज्य वित्तीय व प्रशासनिक संबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 263 के तहत राष्ट्रपति को राज्यों के बीच समन्वय स्थापित करने और सार्वजनिक हितों से जुड़े विषयों की जाँच व उन पर चर्चा करने के लिए अंतर-राज्यीय परिषद् की स्थापना करने की शक्ति प्राप्त है, और यह परिषद् एक संवैधानिक निकाय (Constitutional Body) होने के साथ-साथ एक स्थायी प्रकृति का न्यायिक मंच है जो दोनों पक्षों पर बाध्यकारी निर्णय देती है।
2. सरकारी आयोग (Sarkaria Commission, 1983-88) ने अपनी संस्तुति में यह सिफारिश की थी कि अंतर-राज्यीय परिषद् को एक स्वतंत्र, स्थायी और निरंतर सक्रिय निकाय के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए, जिसका नाम बदलकर 'राष्ट्रीय आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिषद्' कर दिया जाना चाहिए।
3. अंतर-राज्यीय परिषद् की स्थायी समिति (Standing Committee) का गठन वर्ष 1996 में किया गया था, जिसकी अध्यक्षता केंद्रीय गृह मंत्री करते हैं, और इसमें विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री तथा कुछ कैबिनेट मंत्री इसके सदस्य के रूप में शामिल होते हैं ताकि परिषद की बैठकों के बीच के समय में निरंतरता बनी रहे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत नगरपालिकाओं के वित्तीय स्वायत्तता, राज्य वित्त आयोग और नगरपालिकाओं के निर्वाचन से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 243-Y के प्रावधानों के अनुसार, राज्य का वित्त आयोग (State Finance Commission) प्रत्येक पाँच वर्ष की समाप्ति पर राज्यपाल को यह संस्तुति करता है कि नगरपालिकाओं को राज्य की संचित निधि से करों, शुल्कों, टोल और फीस के शुल्कों का वितरण किस प्रकार किया जाए तथा नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति को सुधारने के लिए कौन-से उपाय किए जाने चाहिए।
2. अनुच्छेद 243-ZA के अंतर्गत प्रत्येक नगरपालिका के लिए निर्वाचनों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण का जिम्मा एक स्वतंत्र निकाय यानी भारत के निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) में निहित होता है, जो लोकसभा और विधानसभा चुनावों के साथ-साथ शहरी स्थानीय निकायों के चुनाव भी संपन्न कराता है।
3. 74वें संविधान संशोधन के द्वारा शहरी स्थानीय शासन के सुदृढ़ीकरण के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि किसी भी परिस्थिति में नगरपालिका का विघटन होने पर छह मास की अवधि के भीतर नए चुनाव संपन्न करा लिए जाने चाहिए, सिवाय इसके कि यदि विघटन का शेष कार्यकाल छह महीने से कम का बचा हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारत के निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) और चुनावी सुधारों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 324 के खंड (2) के अनुसार निर्वाचन आयोग मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों (यदि कोई हों) से मिलकर बनेगा, और इनकी नियुक्ति संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, तथा आयोग को सहायता प्रदान करने के लिए क्षेत्रीय आयुक्तों की नियुक्ति का अधिकार भी संसद के पास सुरक्षित है।
2. वर्ष 1993 में सर्वोच्च न्यायालय ने 'इन्द्रजीत बरुवा बनाम भारत संघ' मामले के ऐतिहासिक निर्णय में यह स्पष्ट किया था कि चुनाव आयोग की बहु-सदस्यीय प्रकृति में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के पास मतदान के अधिकारों के मामले में समान शक्तियाँ होती हैं, और किसी भी मतभेद की स्थिति में निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जाता है, न कि केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सहमति से।
3. निर्वाचन आयोग के व्यय भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) पर भारित (Charged) होते हैं, ठीक उसी तरह जैसे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों और भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के वेतन व भत्ते होते हैं, ताकि आयोग की वित्तीय स्वायत्तता और निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके।
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) और उसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा 13 दिसंबर 1946 को संविधान सभा में प्रस्तुत 'उद्देश्य प्रस्ताव' (Objectives Resolution) को ही कुछ संशोधनों के पश्चात संविधान की प्रस्तावना के रूप में स्वीकार किया गया था, और यह प्रस्तावना संविधान के लागू होने के पश्चात न्यायालय में वाद योग्य (Justiciable) है।
2. प्रस्तावना में उल्लिखित 'न्याय' (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक) के आदर्श को रूस की क्रांति (1917) से प्रेरणा लेकर शामिल किया गया था, जबकि 'स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व' के आदर्श को फ्रांसीसी क्रांति (1789) से लिया गया है।
3. केशवानंद भारती वाद (1973) के ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि प्रस्तावना संविधान का अभिन्न अंग है, और संसद द्वारा अनुच्छेद 368 के तहत इसमें संशोधन किया जा सकता है, बशर्ते इसके 'मूल ढाचे' (Basic Structure) को क्षति न पहुँचे, जैसा कि 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा इसमें तीन नए शब्द जोड़े जाने पर सिद्ध हुआ था।
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था।
2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है।
3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है।
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भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है।
2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो।
3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
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