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Indian Polity
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) और उसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा 13 दिसंबर 1946 को संविधान सभा में प्रस्तुत 'उद्देश्य प्रस्ताव' (Objectives Resolution) को ही कुछ संशोधनों के पश्चात संविधान की प्रस्तावना के रूप में स्वीकार किया गया था, और यह प्रस्तावना संविधान के लागू होने के पश्चात न्यायालय में वाद योग्य (Justiciable) है।
  2. 2. प्रस्तावना में उल्लिखित 'न्याय' (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक) के आदर्श को रूस की क्रांति (1917) से प्रेरणा लेकर शामिल किया गया था, जबकि 'स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व' के आदर्श को फ्रांसीसी क्रांति (1789) से लिया गया है।
  3. 3. केशवानंद भारती वाद (1973) के ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि प्रस्तावना संविधान का अभिन्न अंग है, और संसद द्वारा अनुच्छेद 368 के तहत इसमें संशोधन किया जा सकता है, बशर्ते इसके 'मूल ढाचे' (Basic Structure) को क्षति न पहुँचे, जैसा कि 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा इसमें तीन नए शब्द जोड़े जाने पर सिद्ध हुआ था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है क्योंकि भारतीय संविधान की प्रस्तावना गैर-वाद योग्य (Non-justiciable) है, अर्थात् इसके प्रावधानों को किसी भी न्यायालय में लागू नहीं कराया जा सकता है और न ही इसके आधार पर न्यायालय में कोई रिट या मुकदमा दायर किया जा सकता है। कथन 2 सत्य है; प्रस्तावना में समाहित सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय का आदर्श रूसी क्रांति (1917) से प्रेरित है, जबकि विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता तथा समता एवं बंधुत्व के आदर्श फ्रांसीसी क्रांति (1789) से लिए गए हैं। कथन 3 सत्य है; केशवानंद भारती मामले (1973) में उच्चतम न्यायालय ने अपने पूर्व के 'बेरूबारी यूनियन वाद (1960)' के निर्णय को बदलते हुए यह माना कि प्रस्तावना संविधान का भाग है और इसमें अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन किया जा सकता है, बशर्ते संविधान का मूल ढांचा (Basic Structure) प्रभावित न हो। इसी के तहत 42वें संविधान संशोधन 1976 द्वारा प्रस्तावना में 'समाजवादी', 'पंथनिरपेक्ष' और 'अखंडता' शब्द जोड़े गए थे। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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