Indian Polity
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भारतीय संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत शहरी स्थानीय शासन और नगरपालिकाओं के गठन तथा उनकी संरचना के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. इस अधिनियम के तहत नगरपालिकाओं के तीन प्रकारों (नगर पंचायत, नगरपालिका परिषद और नगर निगम) का प्रावधान किया गया है, और किसी संक्रमणकालीन क्षेत्र (ग्रामीण से नगरीय क्षेत्र में परिवर्तित होने वाले क्षेत्र) के लिए 'नगरपालिका परिषद' का गठन किया जाता है।
- 2. अनुच्छेद 243-S के अंतर्गत 'वार्ड समितियों' (Wards Committees) के गठन का प्रावधान किया गया है, जो कि तीन लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले नगरपालिका क्षेत्र के अंतर्गत एक या अधिक वार्डों को मिलाकर बनाई जाती हैं।
- 3. प्रत्येक नगरपालिका में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने गए वार्डों के सदस्यों के अतिरिक्त, राज्य विधानमंडल विधि द्वारा उस नगरपालिका क्षेत्र में लोकसभा और राज्य विधानसभा के उन सदस्यों (सांसदों व विधायकों) को भी प्रतिनिधित्व प्रदान कर सकता है जो उस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है, क्योंकि 74वें संविधान संशोधन के तहत संक्रमणकालीन क्षेत्र (ग्रामीण से नगरीय क्षेत्र में परिवर्तित होने वाला क्षेत्र) के लिए 'नगर पंचायत' का गठन किया जाता है, जबकि 'नगरपालिका परिषद' का गठन छोटे नगरीय क्षेत्र के लिए किया जाता है। कथन 2 गलत है, क्योंकि वार्ड समितियों का गठन तीन लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले नगरपालिका क्षेत्र के लिए किया जाता है (न कि पाँच लाख)। कथन 3 सही है, क्योंकि अनुच्छेद 243R के अनुसार राज्य विधानमंडल विधि द्वारा नगरपालिका के प्रशासन में विशेष ज्ञान या अनुभव रखने वाले व्यक्तियों के साथ-साथ लोकसभा सदस्यों और राज्य विधानसभा के सदस्यों (तथा राज्यसभा और विधान परिषद के सदस्यों) को भी प्रतिनिधित्व प्रदान कर सकता है। इस विषय की विस्तृत जानकारी के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर जा सकते हैं।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य विधानमंडल की संरचना, विधानसभा और विधान परिषद…
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भारतीय संविधान के अंतर्गत प्रदत्त मूल कर्तव्यों (Fundamental Duties) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल कर्तव्यों को संविधान में समाविष्ट करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा वर्ष 1976 में 'सरदार स्वर्ण सिंह समिति' का गठन किया गया था, जिसकी सिफारिशों पर 42वें संविधान संशोधन द्वारा 10 मूल कर्तव्यों को जोड़ा गया था, किंतु समिति ने कर अदायगी (Payment of Taxes) को भी एक मूल कर्तव्य बनाए जाने की संस्तुति की थी जिसे सरकार द्वारा स्वीकार नहीं किया गया था।
2. संविधान के अनुच्छेद 51क के अंतर्गत उल्लिखित सभी 11 मूल कर्तव्य प्रकृति से केवल 'भारतीय नागरिकों' के लिए ही बाध्यकारी हैं, और भारत में निवास करने वाले विदेशी नागरिकों (Foreigners) पर ये कर्तव्य कानूनी रूप से लागू नहीं होते हैं।
3. जिस प्रकार मूल अधिकारों (Fundamental Rights) के उल्लंघन की स्थिति में नागरिकों को अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सर्वोच्च न्यायालय जाने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है, उसी प्रकार किसी नागरिक द्वारा मूल कर्तव्यों का उल्लंघन या उनकी अवहेलना किए जाने पर संसद द्वारा बनाए गए किसी विधि के तहत उसे दंडित किए जाने का प्रावधान किया जा सकता है, क्योंकि ये कर्तव्य स्वयं स्वतः प्रवर्तनीय (Self-executing) नहीं हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत शहरी स्थानीय शासन, नगरपालिकाओं की संरचना, और समितियों के गठन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस अधिनियम के तहत तीन प्रकार की नगरपालिकाओं - संक्रमणकालीन क्षेत्र के लिए 'नगर पंचायत', लघु नगरीय क्षेत्र के लिए 'नगरपालिका परिषद' और बृहत नगरीय क्षेत्र के लिए 'नगर निगम' का गठन किया जाता है, और राज्यपाल द्वारा किसी क्षेत्र की जनसंख्या, जनसंख्या घनत्व और आर्थिक महत्व के आधार पर उसे नगरीय क्षेत्र के रूप में अधिसूचित किया जाता है।
2. अनुच्छेद 243-S के अनुसार, तीन लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले प्रत्येक नगरपालिका क्षेत्र के लिए एक या अधिक 'वार्ड समितियों' (Wards Committees) का गठन किया जाएगा, और इस समिति के क्षेत्र के भीतर आने वाले वार्डों से चुने गए नगरपालिका के पार्षद इस समिति के पदेन सदस्य होते हैं।
3. प्रत्येक नगरपालिका के लिए एक 'जिला योजना समिति' (District Planning Committee) के गठन का प्रावधान अनुच्छेद 243-ZD के अंतर्गत किया गया है, जिसके कुल सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई (2/3rd) सदस्य जिले की पंचायतों और नगरपालिकाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने में से ही चुने जाते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग-III (मूल अधिकार) के अंतर्गत प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों तथा उनके अपवादों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अनुच्छेद 25 के अंतर्गत 'हिंदू धार्मिक संस्थाओं' (Hindu religious institutions) के सार्वजनिक प्रकार के हिंदुओं के सभी वर्गों और खंडों के लिए खोलने का प्रावधान किया गया है, और इस अभिव्यक्ति 'हिंदू' के अंतर्गत सिख, जैन और बौद्ध धर्म के मानने वाले व्यक्ति भी शामिल माने जाते हैं।
2. अनुच्छेद 26 के तहत प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग को अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है, और यह अधिकार पूरी तरह से निरपेक्ष (Absolute) है, जिस पर राज्य द्वारा लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के आधार पर भी किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है।
3. अनुच्छेद 28 के अनुसार, पूरी तरह से राज्य निधि (State funds) से पोषित किसी भी शैक्षणिक संस्थान में किसी भी प्रकार की धार्मिक शिक्षा पूरी तरह से प्रतिबंधित की गई है, किंतु ऐसे शैक्षणिक संस्थान जिन पर राज्य का प्रशासन है लेकिन उनकी स्थापना किसी न्यास (Trust) या बंदोबस्त के तहत हुई है, वहाँ धार्मिक शिक्षा दिए जाने की अनुमति हो सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोगों (SPSC) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 316 के अनुसार संघ लोक सेवा आयोग या किसी राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या अन्य सदस्यों को उनके पद से केवल राष्ट्रपति द्वारा ही हटाया जा सकता है, भले ही वे राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्य या अध्यक्ष हों, और हटाने का आधार कदाचार (Misbehavior) होने पर उच्चतम न्यायालय की जाँच अनिवार्य होती है।
2. अनुच्छेद 318 के अंतर्गत राष्ट्रपति को संघ लोक सेवा आयोग के सदस्यों की संख्या और उनकी सेवा की शर्तों के नियम बनाने की शक्ति प्राप्त है, जबकि राज्यपाल को अपने राज्य के लोक सेवा आयोग के संदर्भ में ऐसे नियम बनाने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है।
3. संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के अध्यक्ष या सदस्य अपनी पदावधि समाप्त होने के पश्चात भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी अन्य रोजगार के पात्र नहीं होते हैं, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) का अध्यक्ष अपने कार्यकाल की समाप्ति के बाद संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या सदस्य के रूप में अथवा किसी अन्य राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किए जाने का पात्र होता है।
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था।
2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है।
3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है।
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भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है।
2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो।
3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
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