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Indian Polity
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP - अनुच्छेद 36-51) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 37 में यह स्पष्ट रूप से उपबंधित है कि नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा, किंतु इन्हें देश के किसी भी न्यायालय द्वारा न्यायोचित (Justiciable) नहीं ठहराया जा सकता है, अर्थात् इनके उल्लंघन पर न्यायालय द्वारा रिट जारी नहीं की जा सकती है।
  2. 2. अनुच्छेद 39(क) के तहत राज्य अपनी नीति का इस प्रकार संचालन करेगा कि सभी नागरिकों को समान अवसर के आधार पर निःशुल्क विधिक सहायता (Free Legal Aid) सुलभ हो सके, और इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए संसद द्वारा 'विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987' (Legal Services Authorities Act, 1987) पारित किया गया था।
  3. 3. अनुच्छेद 44 के अंतर्गत 'समान नागरिक संहिता' (Uniform Civil Code) का प्रावधान किया गया है, जो कि एक नीति निर्देशक तत्व है, और गोवा एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ पूरे देश के लिए लागू होने वाली इस संहिता को संवैधानिक संशोधन के माध्यम से सर्वप्रथम अनिवार्य रूप से लागू किया गया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 37 के अनुसार नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मौलिक हैं और देश की विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य है, लेकिन वे गैर-न्यायोचित (Non-justiciable) हैं यानी उनके क्रियान्वयन के लिए न्यायालय की शरण नहीं ली जा सकती। कथन 2 भी सही है; अनुच्छेद 39क (जिसे 42वें संविधान संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया) के अंतर्गत गरीबों को समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता प्रदान करने का निर्देश है, जिसे लागू करने हेतु संसद ने विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 बनाया। कथन 3 गलत है क्योंकि गोवा में समान नागरिक संहिता (UCC) पुर्तगाली नागरिक संहिता, 1867 के ऐतिहासिक प्रभाव के कारण लागू है, न कि किसी संवैधानिक संशोधन के माध्यम से इसे सर्वप्रथम अनिवार्य रूप से लागू किया गया था। आप इसके बारे में विस्तृत अध्ययन भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर पढ़ सकते हैं।
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