Indian Polity
Asked 2 months ago · Viewed 19 times
राज्य की कार्यपालिका के संदर्भ में राज्यपाल की क्षमादान शक्तियों (अनुच्छेद 161) और मुख्यमंत्री के संवैधानिक उत्तरदायित्वों (अनुच्छेद 167) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 161 के अनुसार राज्यपाल को उस विषय से संबंधित, जिस विषय पर राज्य की कार्यकारी शक्ति का विस्तार है, किसी विधि के विरुद्ध किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा करने, उसका प्रविलಂಬन, विराम या परिहार करने की शक्ति प्राप्त है, और राष्ट्रपति की तरह राज्यपाल को भी मृत्युदंड के मामलों में पूर्ण क्षमादान देने तथा सैन्य न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के विरुद्ध क्षमादान देने की संवैधानिक शक्ति प्राप्त है।
- 2. अनुच्छेद 167 के अंतर्गत मुख्यमंत्री का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह राज्य के प्रशासन से संबंधित मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राज्यपाल को संसूचित करे, तथा विधान के लिए प्रस्ताव और संघ के मामलों से संबंधित प्रशासनिक जानकारी भी राज्यपाल को दे, यदि राज्यपाल ऐसी जानकारी मांगता है।
- 3. राज्यपाल द्वारा मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General) की नियुक्ति की जाती है, और महाधिवक्ता राज्यपाल के प्रसादपर्यंत अपने पद पर बना रहता है, तथा उसे राज्य के विधानमंडल के दोनों सदनों में बोलने और उसकी कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार होता है, किंतु उसे मतदान का अधिकार प्राप्त नहीं होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को मृत्युदंड के मामलों में पूर्ण क्षमादान (Pardon) देने की शक्ति प्राप्त नहीं है, यद्यपि वह मृत्युदंड का प्रविलंबन या परिहार कर सकता है। इसके अलावा, राष्ट्रपति के विपरीत राज्यपाल को सैन्य न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के विरुद्ध क्षमादान देने की कोई शक्ति प्राप्त नहीं है। कथन 2 सही है क्योंकि अनुच्छेद 167 के अंतर्गत मुख्यमंत्री का यह स्पष्ट संवैधानिक कर्तव्य है कि वह राज्य के प्रशासन और विधान प्रस्तावों से संबंधित मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राज्यपाल को संसूचित करे और मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराए। कथन 3 गलत है क्योंकि राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General) की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा मंत्रिपरिषद की सलाह पर की जाती है, न कि राज्यपाल द्वारा पूरी तरह से स्वतंत्र रूप से बिना सलाह के। अधिक जानकारी के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर जा सकते हैं।
अगला प्रश्न →
चार्टर अधिनियम, 1853 (Charter Act of 1853) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर…
← पिछला प्रश्न
भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court)…
Related Questions
→
भारतीय संविधान के ऐतिहासिक विकास के अंतर्गत ब्रिटिश संसद द्वारा पारित विभिन्न अधिनियमों और उनके प्रभावों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 के माध्यम से कंपनी के राजनीतिक और व्यापारिक कार्यों को पृथक किया गया, जिसके तहत 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' (नियंत्रण बोर्ड) की स्थापना की गई जो राजनीतिक मामलों की देखरेख करता था, और इसे ब्रिटिश कैबिनेट के एक सदस्य के अधीन रखा गया।
2. चार्टर अधिनियम, 1833 द्वारा बंगाल के गवर्नर-जनरल को 'भारत का गवर्नर-जनरल' बना दिया गया, तथा इस अधिनियम ने मद्रास और बॉम्बे के गवर्नरों की विधायी शक्तियों को पूरी तरह से समाप्त कर दिया, जिससे भारत में केंद्रीय केंद्रीकृत प्रशासन की नींव पड़ी।
3. चार्टर अधिनियम, 1853 के द्वारा गवर्नर-जनरल की परिषद के विधायी और प्रशासनिक कार्यों को स्पष्ट रूप से अलग किया गया, जिसके तहत परिषद में छह नए पार्षदों को जोड़ा गया जिन्हें 'विधान पार्षद' (Legislative Councillors) कहा गया, और सिविल सेवकों की भर्ती के लिए खुली प्रतियोगिता प्रणाली की शुरुआत की गई।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय संविधान की अनुसूचियों, राजभाषा तथा राजनीतिक दलों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान की आठवीं अनुसूची में मूल रूप से 14 भाषाएँ थीं, जिन्हें बाद में विभिन्न संवैधानिक संशोधनों (जैसे 21वें, 71वें और 92वें संशोधन) के माध्यम से जोड़कर वर्तमान में कुल 22 राजभाषाएँ कर दिया गया है, तथा अंग्रेजी इस अनुसूची में शामिल भाषाओं में से एक है।
2. संविधान के भाग XVII के अंतर्गत अनुच्छेद 343 से 351 तक संघ की राजभाषा का प्रावधान किया गया है, जिसके अनुसार संघ की राजभाषा देवनागरी लिपि में हिंदी होगी, किंतु संसद को यह अधिकार दिया गया है कि वह विधि द्वारा सरकारी कार्यों के लिए अंग्रेजी के निरंतर प्रयोग को प्राधिकृत कर सके।
3. वर्ष 1985 के 52वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसे 'दल-बदल विरोधी कानून' कहा जाता है, तथा इस अनुसूची के प्रावधानों के अंतर्गत किसी राजनीतिक दल के विलय (Merger) के लिए यह आवश्यक है कि उस दल के कम से कम दो-तिहाई (2/3rd) सदस्य अन्य दल में विलय के पक्ष में हों।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में पारित 'रेगुलेटिंग एक्ट, 1773' और 'पिट्स इंडिया एक्ट, 1784' के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 के द्वारा बंगाल के गवर्नर को 'बंगाल का गवर्नर-जनरल' पदनाम दिया गया तथा उसकी सहायता के लिए एक चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया, जिसके निर्णय बहुमत से होते थे और गवर्नर-जनरल को केवल बराबरी की स्थिति में निर्णायक मत (casting vote) देने का अधिकार था।
2. पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 के माध्यम से ब्रिटिश सरकार का कंपनी के व्यापारिक और राजनीतिक मामलों पर नियंत्रण और अधिक बढ़ा दिया गया, जिसके तहत 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' (नियंत्रण बोर्ड) की स्थापना की गई जो राजनीतिक मामलों की देखरेख करता था, जबकि 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर' (निदेशक मंडल) को व्यापारिक मामलों के संचालन की अनुमति दी गई।
3. रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 के प्रावधानों के अंतर्गत ही वर्ष 1774 में कलकत्ता में एक उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की स्थापना की गई, जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य न्यायाधीश शामिल थे, तथा इस न्यायालय को भारत के सभी प्रांतों के दीवानी और फौजदारी मामलों में सर्वोच्च अपीलीय अधिकार प्राप्त था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ न्यायालयों की संरचना, क्षेत्राधिकार तथा उनकी स्वतंत्रता के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 216 के अनुसार प्रत्येक उच्च न्यायालय एक मुख्य न्यायमूर्ति और ऐसे अन्य न्यायाधीशों से मिलकर बनेगा जिन्हें राष्ट्रपति समय-समय पर नियुक्त करना आवश्यक समझे, तथा संविधान ने उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की अधिकतम संख्या निश्चित कर दी है जिसे संसद के विशेष बहुमत द्वारा ही बदला जा सकता है।
2. अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय को मूल अधिकारों के प्रवर्तन के अलावा किसी 'अन्य प्रयोजन' (जैसे सामान्य कानूनी अधिकारों के उल्लंघन) के लिए भी बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, अधिकार पृच्छा, उत्प्रेषण और प्रतिषेध रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है, और इस संदर्भ में उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार उच्चतम न्यायालय की तुलना में अधिक विस्तृत है।
3. जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति राज्यपाल द्वारा संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करने के पश्चात अनुच्छेद 233 के अंतर्गत की जाती है, जबकि न्यायिक सेवा के अन्य सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा राज्य लोक सेवा आयोग और उच्च न्यायालय से परामर्श करके की जाती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था।
2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है।
3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है।
2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो।
3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.