Indian Polity
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत राज्य पूरे भारत के राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) को सुरक्षित करने का प्रयास करेगा, और यह निर्देश उन विशिष्ट नीति निर्देशक तत्वों में शामिल है जिन्हें मूल संविधान में नहीं जोड़ा गया था, बल्कि बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा अंतःस्थापित किया गया था।
- 2. अनुच्छेद 45 में मूल रूप से यह प्रावधान था कि राज्य इस संविधान के प्रारंभ से दस वर्ष की अवधि के भीतर सभी बालकों के लिए चौदह वर्ष की आयु पूरी होने तक निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने का प्रयास करेगा, जिसे बाद में 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा संशोधित करके प्रारंभिक शिक्षा को अनुच्छेद 21क के तहत एक मौलिक अधिकार बना दिया गया।
- 3. अनुच्छेद 50 के अंतर्गत राज्य की लोक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक् करने के लिए राज्य कदम उठाएगा, और यह सिद्धांत शक्ति के पृथक्करण (Separation of Powers) के प्रशासनिक दर्शन पर आधारित है जो देश की शासन प्रणाली को अधिक पारदर्शी और स्वतंत्र बनाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 44 (समान नागरिक संहिता) मूल संविधान में ही नीति निर्देशक तत्वों के रूप में विद्यमान था, न कि इसे 42वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया था। कथन 2 सही है; अनुच्छेद 45 में मूलतः 14 वर्ष की आयु तक के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने का उपबंध था, जिसे 86वें संविधान संशोधन, 2002 द्वारा बदलकर 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों की बाल्यावस्था की देखभाल और शिक्षा से संबंधित कर दिया गया तथा इसी संशोधन से अनुच्छेद 21क के तहत शिक्षा को मूल अधिकार बनाया गया। कथन 3 सही है; अनुच्छेद 50 राज्य की लोक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक् करने का निर्देश देता है जो संविधान के मूल ढांचे और शक्ति के पृथक्करण के सिद्धांत का महत्वपूर्ण भाग है। भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के विस्तृत अध्ययन के लिए इस पोर्टल का संदर्भ लें।
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भारतीय संविधान के ऐतिहासिक विकास के संदर्भ में, 'पिट्स इंडिया एक्ट, 1784'…
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्यों के उच्च न्यायालयों की प्रशासनिक शक्तियों, अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण तथा उनकी अधिकारिता के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 227 के अनुसार प्रत्येक उच्च न्यायालय को अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर आने वाले सभी न्यायालयों और न्यायाधिकरणों (Tribunals) पर अधीक्षण (Superintendence) की शक्ति प्राप्त है, और इस शक्ति में केवल न्यायिक अधीक्षण ही शामिल है, प्रशासनिक या वित्तीय निरीक्षण का अधिकार उच्च न्यायालय के पास नहीं होता है।
2. अनुच्छेद 235 के तहत राज्य के अधीनस्थ न्यायालयों (जिनमें जिला न्यायालय और उनके अधीन अन्य सिविल न्यायालय शामिल हैं) पर नियंत्रण, जिसमें उनकी पोस्टिंग, प्रमोशन, पदस्थापन और न्यायिक सेवा के अधिकारियों को छुट्टी देने का अधिकार है, पूर्ण रूप से संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय में निहित होता है।
3. संसद को यह संवैधानिक शक्ति प्राप्त है कि वह विधि द्वारा किसी राज्य के उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को किसी संघ राज्यक्षेत्र (Union Territory) तक विस्तारित कर सकती है या किसी संघ राज्यक्षेत्र के उच्च न्यायालय को किसी अन्य राज्य के अधीन कर सकती है, और ऐसा विस्तार करते समय उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि करने का अधिकार भी संसद के पास ही होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के ऐतिहासिक विकास के क्रम में 'रेगुलेटिंग एक्ट, 1773' और 'पिट्स इंडिया एक्ट, 1784' के प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 के द्वारा बंगाल के गवर्नर को 'बंगाल का गवर्नर-जनरल' पदनाम दिया गया, तथा उसकी सहायता के लिए एक चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया, जिसमें निर्णय बहुमत के आधार पर लिए जाते थे और गवर्नर-जनरल को केवल निर्णायक मत (casting vote) देने का अधिकार था।
2. रेगुलेटिंग एक्ट के तहत ही वर्ष 1774 में कलकत्ता में एक उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की स्थापना की गई, जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य न्यायाधीश शामिल थे, और इस न्यायालय की अपीलें सीधे तौर पर कलकत्ता स्थित गवर्नर-जनरल की परिषद में की जा सकती थीं, न कि ब्रिटेन की प्रिवी कौंसिल में।
3. पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 द्वारा कंपनी के राजनीतिक और व्यापारिक कार्यों को पृथक कर दिया गया, जिसके तहत राजनीतिक मामलों के प्रबंधन के लिए 'बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल' (Board of Control) और व्यापारिक मामलों के लिए 'कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स' (Court of Directors) की स्थापना की गई, जिससे भारत में 'द्वैध शासन' (Double Government) की प्रणाली प्रारंभ हुई।
4. पिट्स इंडिया एक्ट के माध्यम से ही पहली बार भारत में कंपनी के अधीन क्षेत्र को आधिकारिक रूप से 'ब्रिटिश अधिकार क्षेत्र का भारतीय क्षेत्र' (British Possessions in India) कहा गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग II (अनुच्छेद 5-11) के अंतर्गत भारतीय नागरिकता के अर्जन, समाप्ति तथा नागरिकता संबंधी विधियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 11 के तहत भारतीय संसद को यह पूर्ण शक्ति प्रदान की गई है कि वह नागरिकता के अर्जन और समाप्ति तथा नागरिकता से संबंधित अन्य सभी विषयों के संबंध में कोई भी उपबंध कर सके, और इसी शक्ति का प्रयोग करते हुए संसद ने नागरिकता अधिनियम, 1957 (मूल रूप से 1955) अधिनियमित किया था।
2. नागरिकता अधिनियम, 1957 के अनुसार भारत में जन्म (Birth), वंश (Descent), पंजीकरण (Registration), देशीयकरण (Naturalization) और राज्यक्षेत्र के समावेशन (Incorporation of territory) के आधार पर नागरिकता प्राप्त की जा सकती है, तथा वर्ष 2019 के संशोधन के पश्चात अवैध प्रवासियों (Illegal Migrants) के लिए देशीयकरण द्वारा नागरिकता प्राप्त करने के मार्ग को और अधिक सुगम बना दिया गया है।
3. अनुच्छेद 9 के प्रावधानों के अनुसार यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता ग्रहण कर लेता है, तो भारत की नागरिकता स्वतः समाप्त (Termination) हो जाती है, किंतु यह नियम उन परिस्थितियों में लागू नहीं होता जब देश में युद्ध की स्थिति चल रही हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) और उनके न्यायिक प्रवर्तन, सामाजिक-आर्थिक दर्शन तथा विविध संशोधनों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 37 में यह स्पष्ट रूप से उपबंधित है कि नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा, तथा ये तत्व किसी भी न्यायालय द्वारा न्यायसंगत (Justiciable) न होने के बावजूद देश के सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना के लिए मौलिक आधार हैं।
2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान में जोड़े गए नीति निर्देशक तत्वों में बच्चों के स्वस्थ विकास के अवसरों को सुरक्षित करना (अनुच्छेद 39(f)), समान न्याय और गरीबों को निःशुल्क विधिक सहायता (अनुच्छेद 39A), तथा उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी (अनुच्छेद 43A) शामिल हैं, किंतु पर्यावरण संरक्षण से संबंधित अनुच्छेद 48A मूल संविधान में ही विद्यमान था।
3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'मिनर्वा मिल्स वाद' (1980) में यह निर्णय दिया गया था कि मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं, और संसद को भाग-III तथा भाग-IV के बीच सामंजस्य और संतुलन बनाए रखना चाहिए, क्योंकि इनमें से किसी एक की पूर्ण प्रधानता दूसरे को समाप्त कर सकती है जो संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन होगा।
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था।
2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है।
3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है।
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भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है।
2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो।
3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
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