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Indian Polity
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भारतीय संविधान के ऐतिहासिक विकास के अंतर्गत 'चार्टर अधिनियम, 1793' (Charter Act of 1793) के प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. इस अधिनियम के द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को भारत में अगले बीस वर्षों के लिए पुनः बढ़ा दिया गया था, साथ ही कंपनी को यह अनुमति दी गई कि वह ब्रिटिश व्यापारियों और निर्माताओं को भारत में व्यापार करने के लिए लाइसेंस (लहसेंस प्रणाली) प्रदान कर सके।
  2. 2. इस अधिनियम के प्रावधान के अनुसार गवर्नर-जनरल को अपनी परिषद के अधिकांश सदस्यों के निर्णयों और मतों को अस्वीकार करने तथा किसी भी विशेष परिस्थिति में परिषद के निर्णय को पलटने की व्यापक शक्ति प्रदान की गई, तथा इस शक्ति का विस्तार भविष्य के सभी गवर्नर-जनरलों और गवर्नरों के लिए भी कर दिया गया।
  3. 3. इस अधिनियम के तहत यह व्यवस्था की गई कि बोर्ड ऑफ कंट्रोल (Board of Control) के सदस्यों और उनके कर्मचारियों का वेतन एवं भत्तों का भुगतान ब्रिटिश राजकोष (British Exchequer) से किया जाएगा, न कि भारतीय राजस्व से, ताकि ब्रिटिश सरकार पर वित्तीय बोझ न पड़े।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है क्योंकि चार्टर अधिनियम, 1793 द्वारा कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को तो बीस वर्षों के लिए बढ़ाया गया था, किंतु ब्रिटिश व्यापारियों और निर्माताओं को भारत में व्यापार करने के लिए 'लाइसेंस' देने की व्यवस्था इस अधिनियम में नहीं, बल्कि 'चार्टर अधिनियम, 1813' के द्वारा की गई थी, जिसके तहत कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त (चीन और चाय के व्यापार को छोड़कर) किया गया था।

कथन 2 सत्य है क्योंकि इस अधिनियम ने गवर्नर-जनरल (और गवर्नरों) को अपनी परिषद के निर्णयों को ओवरराइड (अस्वीकार) करने की विशेष शक्ति दी, जो मूल रूप से कॉर्नवालिस को दी गई थी और बाद में इसे सभी गवर्नर-जनरलों और गवर्नरों के लिए विस्तारित कर दिया गया।

कथन 3 असत्य है क्योंकि इस अधिनियम के तहत बोर्ड ऑफ कंट्रोल के अध्यक्ष और उसके कर्मचारियों के वेतन व भत्तों का भुगतान भारतीय राजस्व (Indian Revenues) से किए जाने का प्रावधान किया गया था, न कि ब्रिटिश राजकोष से। यह व्यवस्था भारत के वित्तीय शोषण का एक प्रमुख अंग थी। भारतीय संविधान के क्रमिक विकास और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की विस्तृत जानकारी के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर जा सकते हैं।
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→ भारतीय संविधान के ऐतिहासिक विकास के अंतर्गत 'रेगुलेटिंग एक्ट, 1773' (Regulating Act of 1773) के प्रावधानों और उसके क्रियान्वयन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इस अधिनियम के द्वारा बंगाल के गवर्नर के पद को 'बंगाल का गवर्नर-जनरल' में परिवर्तित किया गया, तथा लॉर्ड वारेन हेस्टिंग्स को इस पद पर नियुक्त करने के साथ-साथ उसकी सहायता के लिए चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद (Executive Council) का गठन किया गया, जिसके निर्णय बहुमत के आधार पर होते थे और गवर्नर-जनरल को केवल बराबरी की स्थिति में निर्णायक मत (Casting Vote) का अधिकार था। 2. इस अधिनियम के माध्यम से ब्रिटिश सरकार का पहली बार कंपनी पर नियंत्रण स्थापित हुआ, जिसके तहत 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स' (कंपनी की संचालक समिति) को यह अनिवार्य किया गया कि वे भारत के नागरिक, सैन्य और राजस्व संबंधी सभी मामलों की पूरी जानकारी ब्रिटिश सरकार (राजस्व सचिव) को दें। 3. इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत वर्ष 1774 में कलकत्ता के फोर्ट विलियम में एक उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की स्थापना की गई, जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य न्यायाधीश शामिल थे, और इस न्यायालय को बंगाल, बिहार और उड़ीसा के सभी ब्रिटिश विषयों के लिए दीवानी, फौजदारी, admiralty और धार्मिक मामलों में प्रारंभिक और अपीलीय अधिकारिता प्रदान की गई थी। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और विशेष उपकरणों (जैसे कि विभिन्न प्रस्तावों और कटौतियों) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 107 के अनुसार, धन विधेयक (Money Bill) के अतिरिक्त किसी भी अन्य साधारण विधेयक को संसद के किसी भी सदन में पुनः स्थापित किया जा सकता है, तथा यदि कोई साधारण विधेयक संसद के दोनों सदनों के बीच गतिरोध के कारण संयुक्त बैठक (Joint Sitting) में पारित किया जाता है, तो राष्ट्रपति द्वारा बुलाई गई इस संयुक्त बैठक की अध्यक्षता अनिवार्य रूप से लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है, और यदि वह अनुपस्थित हो तो लोकसभा का उपाध्यक्ष इसकी अध्यक्षता करता है। 2. बजट प्रक्रिया के दौरान अनुदानों की मांगों पर चर्चा के समय विपक्षी सदस्यों द्वारा 'नीतिगत कटौती प्रस्ताव' (Policy Cut Motion) प्रस्तुत किया जाता है, जिसका उद्देश्य मांग की राशि को घटाकर 1 रुपये करना होता है, और यह प्रस्ताव सरकार की नीतियों के प्रति पूर्ण असहमति को व्यक्त करता है, जबकि 'मितव्ययिता कटौती प्रस्ताव' (Economy Cut Motion) के तहत मांग की राशि में एक निश्चित विशिष्ट राशि की कटौती करने का प्रस्ताव किया जाता है। 3. 'ध्यानाकर्षण प्रस्ताव' (Calling Attention Motion) और 'अल्पकालिक चर्चा' (Short Duration Discussion) दोनों ही भारतीय संसदीय प्रक्रिया के अ-संवैधानिक और परंपरा-आधारित उपकरण हैं, जिनमें ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के माध्यम से किसी सदस्य द्वारा लोक-महत्व के अति-आवश्यक मामले पर मंत्री का ध्यान आकर्षित किया जाता है और इस पर कोई औपचारिक मतदान नहीं होता है, किंतु अल्पकालिक चर्चा के विपरीत ध्यानाकर्षण प्रस्ताव की पूर्व अनुमति राज्यसभा के सभापति या लोकसभा के अध्यक्ष से प्राप्त करना आवश्यक नहीं होता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति की विधायी शक्तियों, विशेषकर 'अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति' (अनुच्छेद 123) तथा 'वीटो शक्तियों' (अनुच्छेद 111) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति को संसद के विश्रान्ति काल (Recess) में अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति प्राप्त है, और राष्ट्रपति की यह अध्यादेश निर्माण शक्ति संसद की विधि निर्माण शक्ति के समतुल्य होती है, किंतु राष्ट्रपति इस शक्ति का प्रयोग केवल तभी कर सकता है जब संसद के दोनों सदन सत्र में न हों और राष्ट्रपति का यह समाधान हो गया हो कि ऐसी परिस्थितियाँ विद्यमान हैं जिनके कारण तुरंत कार्रवाई करना आवश्यक हो गया है। 2. राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित प्रत्येक अध्यादेश का प्रभाव और बल वही होता है जो संसद द्वारा अधिनियमित किसी अधिनियम का होता है, किंतु यह अनिवार्य है कि ऐसे अध्यादेश को संसद के पुनः समवेत होने पर दोनों सदनों के समक्ष रखा जाए, और यदि संसद पुनः बैठक के प्रारंभ से छह सप्ताह की अवधि के भीतर इसे अस्वीकृत करने वाला संकल्प पारित कर देती है, या छह सप्ताह की अवधि समाप्त होने से पूर्व ही दोनों सदन इसे अननुमोदित कर देते हैं, तो अध्यादेश स्वतः निष्प्रभावी हो जाता है। 3. अनुच्छेद 111 के अधीन जब कोई विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित होने के पश्चात राष्ट्रपति के समक्ष अनुमति के लिए प्रस्तुत किया जाता है, तो राष्ट्रपति को यह संवैधानिक शक्ति प्राप्त है कि वह विधेयक पर अपनी अनुमति रोक सकता है (अत्यंतिक वीटो), उसे पुनर्विचार के लिए वापस लौटा सकता है (निलंबनकारी वीटो), या पॉकेट वीटो का प्रयोग कर सकता है, किंतु संविधान में यह स्पष्ट रूप से उपबंधित है कि राष्ट्रपति धन विधेयक (Money Bill) पर न तो अत्यंतिक वीटो का प्रयोग कर सकता है और न ही उसे पुनर्विचार के लिए संसद को वापस लौटा सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की संवैधानिक प्रकृति, न्यायिक समीक्षा तथा उनके व्यावहारिक क्रियान्वयन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 37 में यह स्पष्ट रूप से उपबंधित है कि नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा, किंतु ये किसी भी न्यायालय द्वारा न्यायसंगत (Justiciable) नहीं हैं, जिसका अर्थ है कि इनके क्रियान्वयन न होने पर न्यायालय द्वारा इन्हें प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता है। 2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा नीति निर्देशक तत्वों में कुछ नए प्रावधान जोड़े गए, जिनके तहत अनुच्छेद 39A (समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता), अनुच्छेद 43A (उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी), और अनुच्छेद 48A (पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन तथा वन एवं वन्यजीवों की रक्षा) को शामिल किया गया था। 3. सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक निर्णयों (विशेषकर 'मिनर्वा मिल्स वाद', 1980) में यह प्रतिपादित किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं, और यदि संसद अनुच्छेद 39(b) तथा 39(c) में वर्णित सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कोई कानून बनाती है जो अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 के मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो ऐसा कानून सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वतः असंवैधानिक घोषित कर दिया जाएगा और इसे कोई विधिक संरक्षण प्राप्त नहीं होगा। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था। 2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है। 3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है। 2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो। 3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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