त्वरित लिंक्स
Indian Polity
7 views
भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति की विधायी शक्तियों, विशेषकर 'अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति' (अनुच्छेद 123) तथा 'वीटो शक्तियों' (अनुच्छेद 111) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति को संसद के विश्रान्ति काल (Recess) में अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति प्राप्त है, और राष्ट्रपति की यह अध्यादेश निर्माण शक्ति संसद की विधि निर्माण शक्ति के समतुल्य होती है, किंतु राष्ट्रपति इस शक्ति का प्रयोग केवल तभी कर सकता है जब संसद के दोनों सदन सत्र में न हों और राष्ट्रपति का यह समाधान हो गया हो कि ऐसी परिस्थितियाँ विद्यमान हैं जिनके कारण तुरंत कार्रवाई करना आवश्यक हो गया है।
- 2. राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित प्रत्येक अध्यादेश का प्रभाव और बल वही होता है जो संसद द्वारा अधिनियमित किसी अधिनियम का होता है, किंतु यह अनिवार्य है कि ऐसे अध्यादेश को संसद के पुनः समवेत होने पर दोनों सदनों के समक्ष रखा जाए, और यदि संसद पुनः बैठक के प्रारंभ से छह सप्ताह की अवधि के भीतर इसे अस्वीकृत करने वाला संकल्प पारित कर देती है, या छह सप्ताह की अवधि समाप्त होने से पूर्व ही दोनों सदन इसे अननुमोदित कर देते हैं, तो अध्यादेश स्वतः निष्प्रभावी हो जाता है।
- 3. अनुच्छेद 111 के अधीन जब कोई विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित होने के पश्चात राष्ट्रपति के समक्ष अनुमति के लिए प्रस्तुत किया जाता है, तो राष्ट्रपति को यह संवैधानिक शक्ति प्राप्त है कि वह विधेयक पर अपनी अनुमति रोक सकता है (अत्यंतिक वीटो), उसे पुनर्विचार के लिए वापस लौटा सकता है (निलंबनकारी वीटो), या पॉकेट वीटो का प्रयोग कर सकता है, किंतु संविधान में यह स्पष्ट रूप से उपबंधित है कि राष्ट्रपति धन विधेयक (Money Bill) पर न तो अत्यंतिक वीटो का प्रयोग कर सकता है और न ही उसे पुनर्विचार के लिए संसद को वापस लौटा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
दिए गए सभी कथन पूर्णतः सत्य हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 123 के अंतर्गत राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्राप्त है, जो संसद की विधायी शक्ति के समान होती है, बशर्ते संसद सत्र में न हो। अनुच्छेद 111 के अनुसार, राष्ट्रपति धन विधेयक को छोड़कर अन्य विधेयकों पर पुनर्विचार के लिए कह सकते हैं या वीटो का उपयोग कर सकते हैं। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के विस्तृत अध्यायों का अध्ययन करें।
Related Questions
→
भारतीय संविधान के अंतर्गत महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों तथा आपातकालीन उपबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा अनुच्छेद 352 में संशोधन करके यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा संपूर्ण भारत या उसके किसी भाग तक सीमित हो सकती है, और इसके साथ ही अनुच्छेद 358 व 359 के माध्यम से यह सुनिश्चित किया गया कि आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 20 और 21 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को भी राष्ट्रपति के आदेश द्वारा निलंबित किया जा सकता है।
2. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा 'आंतरिक अशांति' शब्द को राष्ट्रीय आपातकाल के आधार के रूप में हटाकर 'सशस्त्र विद्रोह' शब्द को जोड़ा गया, तथा यह भी अनिवार्य किया गया कि राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा मंत्रिमंडल (Cabinet) के लिखित निर्णय के बिना नहीं की जा सकती है।
3. 44वें संविधान संशोधन के द्वारा ही यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार केवल तभी स्वतः निलंबित होंगे जब आपातकाल का आधार 'युद्ध' या 'बाह्य आक्रमण' हो, न कि 'सशस्त्र विद्रोह' के आधार पर।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य की कार्यपालिका, विशेष रूप से राज्यपाल की विधायी एवं अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति (अनुच्छेद 213) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 213 के अनुसार राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित अध्यादेश की शक्ति वही है जो राज्य के विधानमंडल द्वारा बनाई गई किसी विधि की होती है, किंतु राज्यपाल द्वारा इस शक्ति का प्रयोग बिना मंत्रिपरिषद की सलाह के किसी भी समय स्वेच्छा से किया जा सकता है।
2. राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित प्रत्येक अध्यादेश को राज्य विधानमंडल के पुनर्रसम्वेत होने पर उसके समक्ष रखना अनिवार्य होता है, और यदि विधानमंडल उस पर कोई संकल्प पारित किए बिना छह सप्ताह की अवधि समाप्त होने से पूर्व अस्वीकृत कर देता है, तो वह उसी क्षण निष्प्रभावी हो जाता है।
3. राज्यपाल के लिए कुछ विशिष्ट मामलों में अध्यादेश प्रख्यापित करने से पूर्व राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति (Previous Instruction) लेना अनिवार्य होता है, जैसे कि यदि वही उपबंध राज्य विधानमंडल में प्रस्तुत किए जाने पर राष्ट्रपति की अनुमति के बिना अधिनियमित नहीं किया जा सकता था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय संविधान के महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों (विशेषकर 42वें और 44वें संशोधन) तथा आपातकालीन उपबंधों (अनुच्छेद 352 से 360) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा अनुच्छेद 352 में यह प्रावधान जोड़ा गया था कि राष्ट्रपति संपूर्ण भारत में या उसके किसी भाग में राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा कर सकता है, तथा राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा को न्यायपालिका में किसी भी आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती थी।
2. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा यह अनिवार्य किया गया कि राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा तभी की जा सकती है जब संघ के मंत्रिमंडल (Cabinet) का ऐसा विनिश्चय लिखित रूप में उसे संसूचित (communicate) किया जाए, और आपातकाल की उद्घोषणा का अनुमोदन संसद के दोनों सदनों द्वारा एक माह के भीतर विशेष बहुमत द्वारा किया जाना आवश्यक है।
3. राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार स्वतः निलंबित हो जाते हैं, किंतु 44वें संशोधन के बाद यह स्पष्ट किया गया कि अनुच्छेद 20 और 21 द्वारा प्रदत्त अधिकारों को किसी भी परिस्थिति में निलंबित नहीं किया जा सकता, और अनुच्छेद 19 के अंतर्गत आपातकाल का निलंबन केवल तभी हो सकता है जब आपातकाल 'युद्ध' या 'बाह्य आक्रमण' के आधार पर घोषित किया गया हो, 'सशस्त्र विद्रोह' के आधार पर नहीं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रस्तुत और संविधान सभा द्वारा पारित 'उद्देश्य प्रस्ताव' (Objective Resolution) ही अंततः भारतीय संविधान की प्रस्तावना बना, जिसमें 'समाजवादी' और 'धर्मनिरपेक्ष' शब्दों को मूल संविधान में ही शामिल कर लिया गया था।
2. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'केशवानंद भारती वाद (1973)' में यह स्पष्ट किया गया कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है और इसमें अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन किया जा सकता है, बशर्ते इसके 'मूल ढांचे' (Basic Structure) को क्षति न पहुँचे।
3. प्रस्तावना न तो विधायिका की शक्तियों का स्रोत है और न ही उसकी शक्तियों पर कोई प्रतिबंध लगाती है, तथा यह प्रकृति से गैर-न्यायोचित (Non-justiciable) है, जिसका अर्थ है कि इसके प्रावधानों को देश के किसी भी न्यायालय में प्रवर्तित (Enforced) नहीं कराया जा सकता।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय संविधान के भाग IV-A के अंतर्गत समाविष्ट 'मूल कर्तव्यों' (Fundamental Duties) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल कर्तव्यों को स्वर्ण सिंह समिति (1976) की सिफारिशों पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान में जोड़ा गया था, किंतु इस समिति ने करों का भुगतान (Payment of Taxes) करने को भी एक मूल कर्तव्य के रूप में शामिल करने की संस्तुति की थी, जिसे तत्कालीन सरकार ने स्वीकार नहीं किया था।
2. मूल प्रकृति से ये कर्तव्य केवल भारतीय नागरिकों पर ही लागू होते हैं, विदेशी नागरिकों पर नहीं; तथा संविधान में इनका प्रवर्तन (Enforcement) सीधे न्यायालयों के माध्यम से नहीं किया जा सकता है, किंतु संसद विधि द्वारा इनके क्रियान्वयन के लिए उपयुक्त दंड या शास्ति का प्रावधान कर सकती है।
3. 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 के माध्यम से छह से चौदह वर्ष की आयु के बीच के अपने बच्चे को शिक्षा के अवसर प्रदान करने का कर्तव्य जोड़ा गया, जिससे मूल कर्तव्यों की कुल संख्या बढ़कर वर्तमान में ग्यारह हो गई है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.