BaalVikas
Menu
Indian Polity
Asked 2 months ago · Viewed 19 times

भारतीय संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति की निर्वाचन पद्धति, पदच्युति और प्रधानमंत्री तथा केंद्रीय मंत्रिपरिषद के संबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 66 के अनुसार भारत के उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के सभी सदस्यों से मिलकर बनने वाले निर्वाचक गण द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है, जिसमें संसद के मनोनीत सदस्य भी भाग लेते हैं, किंतु राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित या मनोनीत सदस्यों को इस निर्वाचक गण में कोई स्थान नहीं दिया गया है।
  2. 2. उपराष्ट्रपति को उसके पद से हटाने के लिए आवश्यक प्रस्ताव (संकल्प) केवल राज्यसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है, और लोकसभा में इस प्रकार के प्रस्ताव को पेश करने का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है, बशर्ते कि इस आशय का प्रस्ताव राज्यसभा द्वारा अपने तत्सम उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के पूर्ण बहुमत (Absolute Majority) से पारित किया जाए तथा लोकसभा उसकी साधारण बहुमत से सहमति दे।
  3. 3. अनुच्छेद 75 के उपबंधों के तहत प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह पर की जाती है, तथा संविधान के अनुच्छेद 75(3) में यह स्पष्ट रूप से उपबंधित किया गया है कि मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होगी, जिसका अर्थ यह है कि लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव केवल संपूर्ण मंत्रिपरिषद के विरुद्ध ही लाया जा सकता है, किसी एक व्यक्तिगत मंत्री के विरुद्ध नहीं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 66 के अनुसार उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों (निर्वाचित एवं मनोनीत दोनों) के सदस्यों से मिलकर बनने वाले निर्वाचक मंडल द्वारा होता है, और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों की इसमें कोई भूमिका नहीं होती। कथन 2 सही है क्योंकि उपराष्ट्रपति को हटाने का संकल्प (Resolution) केवल राज्यसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है (राज्यसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत द्वारा पारित और लोकसभा की सहमति आवश्यक)। कथन 3 गलत है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 75(3) के तहत मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है, किंतु अविश्वास प्रस्ताव (No-confidence Motion) या निंदा प्रस्ताव (Censure Motion) किसी एक व्यक्तिगत मंत्री के विरुद्ध भी लोकसभा में लाया जा सकता है, जिससे पूरी मंत्रिपरिषद की सामूहिक जवाबदेही और एकता सुनिश्चित होती है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पढ़ें।
Share:
अगला प्रश्न → भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्च न्यायालयों (High Courts) की अधिकारिता, रिट… ← पिछला प्रश्न भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य…

Related Questions

→ भारतीय संविधान के भाग II (अनुच्छेद 5-11) के अंतर्गत 'भारतीय नागरिकता' और नागरिकता (संशोधन) अधिनियमों के प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 9 के अनुसार यदि किसी भारत के नागरिक ने स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता प्राप्त कर ली है, तो वह भारत का नागरिक नहीं रहेगा, किंतु यह नियम उन मामलों में लागू नहीं होता जहाँ आपातकाल की घोषणा लागू हो और राष्ट्रपति ने इस संबंध में विशेष आदेश जारी किया हो। 2. नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत भारत की नागरिकता का अंत तीन प्रकार से हो सकता है - नागरिकता का त्याग (Renunciation), नागरिकता की समाप्ति (Termination) और सरकार द्वारा नागरिकता से वंचित किया जाना (Deprivation); तथा इनमें से 'वंचित किया जाना' (Deprivation) एक अनिवार्य (Compulsory) समाप्ति है जो केवल उन नागरिकों पर लागू होती है जिन्होंने पंजीकरण या देशीयकरण द्वारा नागरिकता प्राप्त की हो, जन्म या वंश से नागरिकता प्राप्त करने वालों पर नहीं। 3. वर्ष 2019 में लाए गए नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (CAA) के माध्यम से अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से 31 दिसंबर 2014 को या उससे पहले भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के प्रवासियों को अवैध प्रवासी की परिभाषा से छूट दी गई है, और उनके लिए देशीयकरण (Naturalisation) द्वारा नागरिकता प्राप्त करने हेतु आवश्यक निवास की अवधि को सामान्य 11 वर्ष से घटाकर 5 वर्ष कर दिया गया है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) के गठन, कार्यप्रणाली और स्वतंत्रता के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 315 के अनुसार संघ के लिए एक संघ लोक सेवा आयोग और प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्य लोक सेवा आयोग होगा, किंतु दो या अधिक राज्य यह करार कर सकते हैं कि उनमें से प्रत्येक राज्य के लिए राज्य लोक सेवा आयोग न होकर दोनों या सभी राज्यों के लिए एक 'संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग' (JPSC) होगा, जिसका गठन संसद द्वारा विधि बनाकर किया जाता है, न कि राष्ट्रपति के अध्यादेश द्वारा। 2. संघ लोक सेवा आयोग या किसी राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को उसके पद से केवल राष्ट्रपति के आदेश द्वारा ही हटाया जा सकता है, भले ही उसकी नियुक्ति राज्य लोक सेवा आयोग के संदर्भ में संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा की गई हो, और राष्ट्रपति ऐसा तब कर सकता है जब उच्चतम न्यायालय द्वारा (अनुच्छेद 145 के अधीन विहित प्रक्रिया के अनुसार) अन्वेषण किए जाने पर उसे दिवालिया घोषित किए जाने, अपने पद के कर्तव्यों के बाहर किसी अन्य नियोजन में लगने या शारीरिक या मानसिक infirmity के कारण पद पर बने रहने के लिए असमर्थ पाए जाने पर कदाचार का दोषी पाया जाए। 3. अनुच्छेद 320 के अंतर्गत संघ लोक सेवा आयोग का यह कर्तव्य है कि वह संघ की सेवाओं में नियुक्तियों के लिए परीक्षाओं का संचालन करे, तथा राज्य लोक सेवा आयोग अपने राज्य की सिविल सेवाओं के संबंध में राज्यपाल के अनुरोध पर सभी या किन्हीं मामलों में संयुक्त रूप से योजना बनाने और उसके प्रवर्तन में सहायता कर सकता है, किंतु राज्य लोक सेवा आयोग को अपने कार्यों की वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करने की आवश्यकता केवल राज्यपाल के माध्यम से मुख्यमंत्री को होती है, न कि सीधे राज्यपाल को। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और सदनों की संयुक्त बैठकों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 108 के अनुसार, यदि किसी साधारण विधेयक के एक सदन द्वारा पारित किए जाने और दूसरे सदन को भेजे जाने के बाद, दूसरे सदन द्वारा विधेयक को अस्वीकार कर दिया जाता है, या संशोधनों के संबंध में दोनों सदनों के बीच अंतिम रूप से असहमति हो जाती है, या दूसरा सदन विधेयक को प्राप्त होने की तारीख से छह मास से अधिक समय तक बिना पारित किए अपने पास रोक रखता है, तो राष्ट्रपति दोनों सदनों की संयुक्त बैठक आहूत कर सकता है, किंतु यह प्रावधान धन विधेयक (Money Bill) या संविधान संशोधन विधेयक (Constitutional Amendment Bill) पर लागू नहीं होता है। 2. लोकसभा के विघटन के कारण व्यपगत (Lapse) होने वाले विधेयकों के संबंध में नियम यह है कि लोकसभा में लंबित प्रत्येक विधेयक, चाहे वह लोकसभा में ही प्रारंभ हुआ हो या राज्यसभा से पारित होकर लोकसभा में आया हो, लोकसभा के विघटन पर व्यपगत हो जाता है, सिवाय उस स्थिति के जब वह विधेयक राष्ट्रपति द्वारा संयुक्त बैठक बुलाए जाने के लिए अधिसूचित किया जा चुका हो। 3. संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोकसभा के अध्यक्ष द्वारा की जाती है, और यदि लोकसभा अध्यक्ष अनुपस्थित है, तो लोकसभा का उपाध्यक्ष उसकी अध्यक्षता करता है, तथा यदि उपाध्यक्ष भी अनुपस्थित है, तो राज्यसभा का उपसभापति उसकी अध्यक्षता करेगा, किंतु किसी भी परिस्थिति में राज्यसभा का सभापति (भारत का उपराष्ट्रपति) संयुक्त बैठक की अध्यक्षता नहीं कर सकता है क्योंकि वह संसद के किसी भी सदन का सदस्य नहीं होता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत आने वाले 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (Articles 1-4) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अनुसार संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह विधि द्वारा ऐसे नियमों और शर्तों पर, जो वह ठीक समझे, नए राज्यों का संघ में प्रवेश या उनकी स्थापना कर सकती है, किंतु यह शक्ति केवल विदेशी क्षेत्रों को भारत में शामिल करने तक सीमित है, न कि नए राज्यों के आंतरिक पुनर्गठन से संबंधित है। 2. अनुच्छेद 3 के तहत किसी राज्य के क्षेत्र को बढ़ाने, घटाने, उसके नाम या सीमा में परिवर्तन करने से संबंधित कोई भी विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व संस्वीकृति (Prior Recommendation) के बिना संसद के किसी भी सदन में पुनःस्थापित नहीं किया जा सकता है, और राष्ट्रपति के लिए यह अनिवार्य है कि वह ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसके विचार जानने के लिए भेजे, तथा राज्य विधानमंडल द्वारा व्यक्त किया गया मत राष्ट्रपति या संसद पर संवैधानिक रूप से बाध्यकारी होता है। 3. अनुच्छेद 4 यह स्पष्ट करता है कि अनुच्छेद 2 और अनुच्छेद 3 के अधीन नए राज्यों के प्रवेश या स्थापना तथा मौजूदा राज्यों के पुनर्गठन के लिए बनाई गई विधियों को संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' नहीं माना जाएगा, जिसका अर्थ है कि ऐसी विधियाँ संसद द्वारा साधारण बहुमत (Simple Majority) से पारित की जा सकती हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था। 2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है। 3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है। 2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो। 3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.