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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति की विधायी, कार्यपालिका और अध्यादेश जारी करने की शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 123 के अनुसार राष्ट्रपति को अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति प्राप्त है, और राष्ट्रपति द्वारा जारी यह अध्यादेश संसद के पुनः समवेत होने की तिथि से छह सप्ताह की अवधि समाप्त होने पर निष्प्रभावी हो जाता है, तथा इस अध्यादेश को वापस लेने के लिए राष्ट्रपति को केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह की आवश्यकता नहीं होती है, वह अपने एकांतिक विवेक (Discretion) का प्रयोग करता है।
  2. 2. राष्ट्रपति किसी राज्य के विधानमंडल द्वारा पारित किए गए किसी विधेयक (जो राज्यपाल द्वारा अनुच्छेद 200 के तहत राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखा गया है) पर अपनी अनुमति (Assent) देने या उसे रोकने की शक्ति रखता है, किंतु धन विधेयक के अतिरिक्त अन्य किसी भी प्रकार के विधेयक को राष्ट्रपति राज्य विधानसभा को पुनर्विचार के लिए लौटाने का निर्देश दे सकता है, भले ही वह विधेयक राज्य विधानमंडल द्वारा दोबारा संशोधित या बिना संशोधन के पुनः पारित कर दिया गया हो।
  3. 3. अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को क्षमादान (Pardon), प्रविलंबन, विराम और परिहार की शक्ति प्राप्त है, और राष्ट्रपति की यह क्षमादान शक्ति न्यायपालिका की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से पूर्णतः बाहर है, अर्थात् राष्ट्रपति द्वारा किसी दया याचिका को अस्वीकार किए जाने के निर्णय को किसी भी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है क्योंकि राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश को वापस लेने या प्रख्यापित करने की शक्ति का प्रयोग हमेशा केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह (अनुच्छेद 74) के अनुसार ही किया जाता है, राष्ट्रपति इस मामले में अपने स्वविवेक (Discretion) का प्रयोग नहीं कर सकता है। कथन 2 सत्य है क्योंकि अनुच्छेद 201 के अंतर्गत जब कोई राज्य विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखा जाता है, तो राष्ट्रपति उस पर अपनी अनुमति दे सकता है या रोक सकता है, और यदि वह धन विधेयक नहीं है, तो राष्ट्रपति राज्य विधानमंडल को विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटाने का निर्देश दे सकता है। विधानमंडल द्वारा पुनः पारित किए जाने पर भी राष्ट्रपति उस पर अनुमति देने के लिए बाध्य नहीं है। कथन 3 असत्य है क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने 'ईश्वर सिंह बनाम भारत संघ' और अन्य कई मामलों (जैसे केहर सिंह मामला) में यह स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति न्यायिक समीक्षा के अधीन है, और यदि राष्ट्रपति का निर्णय तर्कहीन, मालाफाइड (दुराशापूर्ण) या भेदभावपूर्ण पाया जाता है, तो न्यायालय उसकी समीक्षा कर सकते हैं। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर विस्तृत अध्ययन करें।
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