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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति की अध्यादेश निर्माण शक्ति (अनुच्छेद 123) तथा क्षमादान की शक्ति (अनुच्छेद 72) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. राष्ट्रपति की अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति संसद की विधि बनाने की शक्ति के सह-विस्तार (Co-extensive) होती है, जिसका अर्थ है कि राष्ट्रपति उसी विषय पर अध्यादेश जारी कर सकता है जिन विषयों पर संसद कानून बना सकती है, किंतु इस शक्ति का प्रयोग राष्ट्रपति द्वारा अपने व्यक्तिगत विवेक (Discretion) से किया जा सकता है, इसके लिए केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह अनिवार्य नहीं होती है।
  2. 2. संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को क्षमादान की जो शक्ति प्राप्त है, उसके अंतर्गत राष्ट्रपति सैन्य न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड या मृत्युदंड के मामलों में भी पूर्ण क्षमादान (Pardon) दे सकता है, तथा राज्यपाल की क्षमादान शक्ति (अनुच्छेद 161) के विपरीत राष्ट्रपति के इस अधिकार पर राज्य की कार्यपालिका शक्ति का कोई प्रतिबंध नहीं होता है।
  3. 3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'कृष्णा अय्यर बनाम राज्य' या अन्य न्यायिक निर्णयों में यह स्पष्ट किया गया है कि राष्ट्रपति द्वारा क्षमादान की याचिका पर निर्णय लेते समय की गई देरी (Inordinate Delay) के आधार पर अपराधी की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदला जा सकता है, किंतु राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का दायरा पूरी तरह से वर्जित है और अदालतें राष्ट्रपति के निर्णय की शुचिता की जांच नहीं कर सकती हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है क्योंकि राष्ट्रपति की अध्यादेश निर्माण शक्ति (अनुच्छेद 123) मंत्रिपरिषद की 'सहायता और सलाह' (Aid and Advice) के अधीन होती है। राष्ट्रपति अपनी मर्जी या व्यक्तिगत विवेक से अध्यादेश जारी नहीं कर सकता; इसके लिए केंद्रीय मंत्रिपरिषद की लिखित अनुशंसा आवश्यक होती है। कथन 2 सत्य है, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को सैन्य न्यायालयों द्वारा दिए गए दंड तथा मृत्युदंड के मामलों में भी पूर्ण क्षमादान, प्रविलंबन, विराम या परिहार करने की अनन्य शक्ति प्राप्त है, जबकि राज्यपाल (अनुच्छेद 161) को सैन्य न्यायालय के दंड को माफ करने की शक्ति प्राप्त नहीं है और राज्यपाल मृत्युदंड को पूरी तरह क्षमा (Pardon) नहीं कर सकता है। कथन 3 आंशिक रूप से असत्य है; यद्यपि राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की जा सकती है (यदि निर्णय प्रथम दृष्ट्या मनमाना, mala fide या भेदभावपूर्ण पाया जाए), और अत्यधिक देरी के आधार पर मृत्युदंड को बदला जा सकता है, लेकिन यह कहना गलत है कि न्यायिक समीक्षा पूरी तरह से वर्जित है। सर्वोच्च न्यायालय ने ईपुरा रामू रेड्डी और अन्य मामलों में स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति की सीमित न्यायिक समीक्षा संभव है। अधिक अध्ययन के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर विजिट कर सकते हैं।
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