BaalVikas
Menu
Indian Polity
Asked 2 months ago · Viewed 26 times

भारत के निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) और चुनाव सुधारों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग की स्थापना एक स्थायी और स्वतंत्र निकाय के रूप में की गई है, जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त और राष्ट्रपति द्वारा समय-समय पर निर्धारित अन्य निर्वाचन आयुक्त होते हैं, तथा वर्ष 1993 के बाद से यह एक बहु-सदस्यीय निकाय के रूप में कार्य कर रहा है जहाँ सभी आयुक्तों की शक्तियां और वेतन-भत्ते उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान होते हैं।
  2. 2. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अनुसार लोकसभा या विधानसभा चुनाव के दौरान किसी निर्वाचन क्षेत्र में मतदान की तिथि से ठीक पूर्व 48 घंटों की अवधि (जिसे 'साइलेंट पीरियड' या मौन अवधि कहा जाता है) के दौरान किसी भी प्रकार के सार्वजनिक बैठकों, जुलूसों या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से चुनाव प्रचार करने पर पूर्ण प्रतिबंध होता है, और यह अवधि मतदान समाप्त होने के समय तक प्रभावी रहती है।
  3. 3. निर्वाचन आयोग को अपने कार्यों के निर्वहन के लिए लोकसभा या राज्य विधानसभाओं के चुनाव क्षेत्रों के परिसीमन (Delimitation) करने की अंतिम वैधानिक शक्ति प्राप्त है, और परिसीमन आयोग अधिनियम के तहत इसके द्वारा लिए गए निर्णयों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग की व्यवस्था की गई है। 16 अक्टूबर 1993 से यह एक बहु-सदस्यीय निकाय (एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो अन्य आयुक्त) बन गया है तथा इनके वेतन और सेवा शर्तें उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान होती हैं। कथन 2 सही है क्योंकि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126 के अनुसार मतदान समाप्त होने के ठीक पहले के 48 घंटों की अवधि में चुनाव प्रचार पर प्रतिबंध रहता है। कथन 3 गलत है क्योंकि निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन करने की शक्ति निर्वाचन आयोग को नहीं, बल्कि संसद द्वारा विधि के तहत गठित एक स्वतंत्र 'परिसीमन आयोग' (Delimitation Commission) को प्राप्त होती है। भारतीय राजव्यवस्था के ऐसे ही अन्य महत्वपूर्ण और गहन विषयों को पढ़ने के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर क्लिक करें।
Share:
अगला प्रश्न → भारतीय संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा स्थापित पंचायती राज… ← पिछला प्रश्न राज्य विधानमंडल के अंतर्गत विधानसभा और विधान परिषद के गठन…

Related Questions

→ भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति की विधायी, कार्यकारी और वीटो शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 111 के अनुसार जब कोई विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित होने के पश्चात राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो राष्ट्रपति को उस पर अपनी अनुमति देना या अनुमति रोक लेना या धन विधेयक को छोड़कर किसी अन्य विधेयक को संसद के पुनर्विचार के लिए वापस भेजना का अधिकार है, किंतु यदि संसद उस विधेयक को बिना किसी संशोधन के या संशोधन के साथ पुनः पारित कर देती है, तो राष्ट्रपति को उस पर अनुमति देना अनिवार्य हो जाता है। 2. राष्ट्रपति की 'आधाकारी वीटो' (Pocket Veto) की शक्ति का आधार यह है कि संविधान में राष्ट्रपति द्वारा किसी विधेयक पर अनुमति देने या न देने के लिए कोई समय-सीमा (Time Limit) निर्धारित नहीं की गई है, जिसके कारण राष्ट्रपति अनिश्चित काल तक विधेयक को अपने पास रख सकते हैं, और इस वीटो शक्ति का प्रयोग सर्वप्रथम वर्ष 1986 में राष्ट्रपति ज्ञानी जेल सिंह द्वारा 'भारतीय डाकघर (संशोधन) विधेयक' के संदर्भ में किया गया था। 3. संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति को अध्यादेश प्रख्यापित (Promulgate) करने की शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति संसद के दोनों सदनों के सत्र में न होने पर ही प्रयोग की जा सकती है, तथा राष्ट्रपति द्वारा जारी किया गया अध्यादेश संसद की पुनर्सवेतन बैठक शुरू होने के ठीक छह सप्ताह के भीतर संसद द्वारा अनुमोदित होना अनिवार्य होता है, अन्यथा वह स्वतः निष्प्रभावी हो जाता है। → राज्य विधानमंडल के अंतर्गत विधानसभा और विधान परिषद के गठन, उनकी सदस्यता, तथा विधायी और वित्तीय शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 171 के अनुसार विधान परिषद के सदस्यों की संरचना एक विशिष्ट प्रकार की होती है, जिसमें कुल सदस्यों का 1/3 भाग स्थानीय निकायों के निर्वाचक मंडल द्वारा, 1/12 भाग स्नातकों द्वारा, 1/12 भाग अध्यापकों द्वारा, 1/3 भाग विधानसभा के सदस्यों द्वारा और शेष 1/6 भाग राज्यपाल द्वारा साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन और समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले व्यक्तियों में से मनोनीत किए जाते हैं। 2. साधारण विधियों (Ordinary Bills) के पारित होने की प्रक्रिया में, यदि विधानसभा द्वारा पारित कोई विधेयक विधान परिषद द्वारा अस्वीकार कर दिया जाता है या विधान परिषद उसमें ऐसे संशोधन करती है जिन्हें विधानसभा स्वीकार नहीं करती है, तो विधानसभा उस विधेयक को दोबारा पारित करके विधान परिषद के पास भेज सकती है, और विधान परिषद उसे अधिकतम चार महीने (प्रथम बार में 3 महीने और दूसरी बार में 1 महीना) तक ही और रोक सकती है। 3. राज्य की विधान परिषद को धन विधेयकों (Money Bills) के संबंध में अत्यंत सीमित शक्तियां प्राप्त हैं; विधानसभा द्वारा पारित धन विधेयक जब विधान परिषद के पास भेजा जाता है, तो विधान परिषद को उसे बिना किसी संशोधन के अधिकतम 14 दिनों के भीतर अपनी सिफारिशों के साथ या बिना सिफारिशों के विधानसभा को वापस लौटाना अनिवार्य होता है, और यदि वह ऐसा नहीं करती है तो विधेयक दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित मान लिया जाता है जिसे विधानसभा ने तय किया था। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम, 1992 और शहरी स्थानीय शासन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इस अधिनियम द्वारा संविधान में भाग IX-A जोड़ा गया, जिसका शीर्षक 'नगरपालिकाएँ' है और इसमें अनुच्छेद 243-P से 243-ZG तक के प्रावधान शामिल हैं, तथा इसके तहत बारहवीं अनुसूची में कुल 18 कार्यकारी विषयों को सूचीबद्ध किया गया है। 2. अधिनियम के अनुसार प्रत्येक राज्य में तीन प्रकार की नगरपालिकाओं का गठन किया जाना अनिवार्य है—संक्रमणकालीन क्षेत्र के लिए नगर पंचायत, छोटे नगरीय क्षेत्र के लिए नगरपालिका परिषद, और बड़े नगरीय क्षेत्र के लिए नगर निगम; किंतु 10 लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले महानगरों में 'महानगर योजना समिति' (Metropolitan Planning Committee) का गठन अनिवार्य किया गया है। 3. नगरपालिकाओं के सभी स्तरों पर महिलाओं के लिए कुल सीटों के कम से कम एक-तिहाई (33%) स्थान आरक्षित होने चाहिए, और यह आरक्षण केवल प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होने वाली सीटों तक ही सीमित है, इसका विस्तार नगरपालिकाओं के अध्यक्षों (Chairpersons) के पदों पर नहीं किया गया है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के भाग-III के अंतर्गत प्रदत्त मूल अधिकारों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान का अनुच्छेद 13 न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का स्पष्ट आधार प्रदान करता है, जिसके तहत संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा बनाई गई कोई भी ऐसी विधि जो भाग-III के प्रावधानों का उल्लंघन करती है, अपने उल्लंघन की मात्रा तक शून्य (Void) होगी। 2. अनुच्छेद 15(5) के तहत राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए नागरिकों के वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए शैक्षणिक संस्थानों (अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों सहित) में प्रवेश के संबंध में विशेष उपबंध करने की शक्ति प्रदान की गई है। 3. अनुच्छेद 20(2) के अंतर्गत 'दोहरे जोखिम' (Double Jeopardy) के संरक्षण का अधिकार केवल किसी न्यायालय के समक्ष या न्यायिक अधिकरण (Judicial Tribunal) की कार्यवाही में अभियोजित किए जाने और दंडित किए जाने पर लागू होता है, यह विभागीय या प्रशासनिक प्राधिकारियों के समक्ष की गई कार्रवाइयों पर लागू नहीं होता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था। 2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है। 3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है। 2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो। 3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.