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History of India
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बौद्ध धर्म और जैन धर्म के दार्शनिक सिद्धांतों, उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तथा उनके प्रारंभिक संप्रदायों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. बौद्ध धर्म के 'सर्वास्तिवाद' संप्रదాయ के अनुसार सभी धर्म (तत्त्व) भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों में वास्तविक रूप से अस्तित्व रखते हैं, जबकि 'सौत्रान्तिक' संप्रదాయ बाह्य वस्तुओं के अस्तित्व को प्रत्यक्ष के बजाय केवल अनुमानगम्य मानता है।
  2. 2. जैन धर्म के 'स्यादवाद' या 'अनेकांतवाद' के सिद्धांत के अनुसार ज्ञान सापेक्ष और बहुआयामी होता है, जिसका मुख्य उद्देश्य किसी वस्तु के केवल एक एकांगी सत्य को ही पूर्ण सत्य के रूप में स्थापित करना है।
  3. 3. बौद्ध धर्म की महायान शाखा के अंतर्गत शून्यवाद (माध्यमिक दर्शन) के प्रवर्तक आचार्य नागार्जुन थे, जिन्होंने प्रतीत्यसमुत्पाद को ही शून्यता का पर्याय माना है, जिसका अर्थ है कि सभी धर्म स्वसंभाव से रहित हैं।
  4. 4. जैन धर्म के श्वेतांबर संप्रदाय के विपरीत दिगंबर संप्रदाय यह मानता है कि स्त्रियाँ अपने इसी शरीर के साथ मोक्ष प्राप्त करने की पूर्ण अधिकारिणी होती हैं और उन्हें तीर्थंकर बनने की भी अनुमति है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि सर्वास्तिवाद संप्रదాయ के अनुसार सभी धर्मों का अस्तित्व तीनों कालों (भूत, भविष्य और वर्तमान) में रहता है, और सौत्रान्तिक संप्रదాయ बाह्य जगत के अस्तित्व को अनुमान से सिद्ध मानता है। कथन 2 गलत है क्योंकि जैन धर्म का 'स्यादवाद' या 'अनेकांतवाद' किसी एक एकांगी सत्य को पूर्ण सत्य मानने का खंडन करता है और वस्तु के अनेक धर्मों की सापेक्षता को स्वीकार करता है। कथन 3 सही है क्योंकि माध्यमिक दर्शन के प्रणेता आचार्य नागार्जुन ने प्रतीत्यसमुत्पाद को शून्यता का ही रूप माना है। कथन 4 गलत है क्योंकि दिगंबर संप्रदाय के अनुसार महिलाओं के लिए मोक्ष प्राप्ति असंभव मानी गई है और उन्हें पुरुष योनि में जन्म लेना आवश्यक बताया गया है। बौद्ध धर्म के विस्तृत इतिहास और दर्शन के लिए विकिपीडिया संदर्भ देखें।
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