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History of India
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बौद्ध धर्म के दार्शनिक और संस्थागत विकास के संदर्भ में, 'सौत्रान्तिक' तथा 'वैभाषिक' संप्रदायों की मान्यताओं और उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. 'वैभाषिक' संप्रదాయ के आचार्य बाह्य वस्तुओं के अस्तित्व को प्रत्यक्ष मानते हैं (प्रत्यक्षवादी), जबकि 'सौत्रान्तिक' संप्रदाय बाह्य वस्तुओं के अस्तित्व को केवल अनुमानगम्य (अनुमानवादी) मानता है।
  2. 2. महायान बौद्ध धर्म के अंतर्गत 'शून्यवाद' (माध्यमिक दर्शन) के प्रवर्तक आचार्य नागार्जुन थे, जिन्होंने प्रतीत्यसमुत्पाद को ही शून्यता का पर्याय माना है, जिसका अर्थ है कि सभी धर्म स्वसंभाव से रहित हैं।
  3. 3. बौद्ध धर्म के इतिहास में 'सर्वास्तिवाद' संप्रదాయ से ही वैभाषिक और सौत्रान्तिक दोनों उप-संप्रदाय विकसित हुए थे, जो सभी कालों (भूत, भविष्य और वर्तमान) में धर्मों के वास्तविक अस्तित्व में विश्वास करते थे।
  4. 4. तृतीय बौद्ध संगीति के उपरांत अशोक के काल में बौद्ध संघ में जो गंभीर मतभेद उत्पन्न हुए थे, उनके परिणामस्वरूप थेइवादियों (स्थविरवादियों) ने महायान मत की स्थापना की थी, जिसने आगे चलकर हीनयान को पूरी तरह समाप्त कर दिया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1, 2 और 3 पूरी तरह सही हैं। वैभाषिक संप्रదాయ बाह्य जगत की वस्तुओं को प्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करता है, जबकि सौत्रान्तिक संप्रदाय बाह्य वस्तुओं के ज्ञान को अनुमान पर आधारित मानता है। माध्यमिक दर्शन (शून्यवाद) के प्रणेता नागार्जुन थे। सर्वास्तिवाद से ही वैभाषिक और सौत्रान्तिक मतों का विकास हुआ था। किंतु कथन 4 असत्य है क्योंकि थेइवादियों (स्थविरवादियों) ने महायान मत की स्थापना नहीं की थी, बल्कि महायान का उदय और बौद्ध संघ में विभाजन द्वितीय बौद्ध संगीति (महासाघिक और स्थविरवाद) के समय से प्रारंभ हुआ था और तृतीय संगीति तक आते-आते विभिन्न संप्रदाय स्थापित हो चुके थे। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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