त्वरित लिंक्स
History of India
8 views
ऋग्वैदिक कालीन समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. ऋग्वैदिक काल में 'दुहितृ' (दुहने वाली) शब्द पुत्री के लिए प्रयोग किया जाता था, जो यह दर्शाता है कि गायों के दोहन का कार्य मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा किया जाता था, और इस काल में समाज स्पष्ट रूप से पितृसत्तात्मक होने के बावजूद महिलाओं को सभा और समिति जैसी राजनीतिक संस्थाओं में भाग लेने की स्वतंत्रता थी।
- 2. इस काल की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से पशुपालन पर आधारित थी, जहाँ गाय सबसे महत्वपूर्ण और मूल्यवान संपत्ति मानी जाती थी, तथा युद्धों का मुख्य कारण भूमि या क्षेत्र का विस्तार न होकर 'गविष्टि' (गायों की खोज या गायों के लिए युद्ध) होता था।
- 3. ऋग्वैदिक कबीले के मुखिया को 'राजन्' कहा जाता था, जो भूमि का स्वामी होता था और करों (बलि) को नियमित रूप से अनिवार्य रूप से वसूलता था, जिसे जनता द्वारा राजा को देना कानूनी रूप से बाध्यकारी था।
- 4. ऋग्वैदिक देवताओं में इन्द्र को 'पुरंदरा' (किले को तोड़ने वाला) कहा गया है, जिन्हें सबसे अधिक 250 सूक्त समर्पित हैं, जबकि अग्नि को मनुष्य और देवताओं के बीच मध्यस्थ के रूप में देखा जाता था जिन्हें 200 सूक्त समर्पित किए गए हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
ऋग्वैदिक काल (Rigvedic period) प्रारंभिक भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण चरण था। कथन 1 सही है क्योंकि ऋग्वैदिक समाज पितृसत्तात्मक था, फिर भी महिलाओं (जैसे अपाला, घोषा, विश्ववारा) का उच्च सम्मान था और वे 'सभा' व 'समिति' जैसी राजनीतिक संस्थाओं में भाग लेती थीं। 'दुहितृ' शब्द पुत्री के लिए प्रयुक्त होता था। कथन 2 सही है क्योंकि ऋग्वैदिक अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार पशुपालन था और युद्धों का मुख्य उद्देश्य गायों की प्राप्ति या रक्षा करना था, जिसे 'गविष्टि' कहा जाता था। कथन 3 गलत है क्योंकि इस काल में 'राजन्' कबीले का मुखिया होता था, न कि संपूर्ण भूमि का स्वामी; भूमि व्यक्तिगत नहीं बल्कि कबीलाई संपत्ति थी। इसके अलावा, 'बलि' जनता द्वारा राजा को दिया जाने वाला एक स्वेच्छिक उपहार या भेंट थी, न कि कोई अनिवार्य कर। कथन 4 सही है क्योंकि इन्द्र को 'पुरंदरा' कहा गया है और उनके लिए 250 सूक्त हैं, जबकि अग्नि के लिए 200 सूक्त हैं। इस काल की विस्तृत जानकारी के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
Related Questions
→
वर्ष 1857 के विद्रोह के दौरान झाँसी और ग्वालियर में रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे के सैन्य अभियानों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मार्च 1858 में सर ह्यू रोज़ के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना द्वारा झाँसी की घेराबंदी किए जाने के बाद, रानी लक्ष्मीबाई ने अत्यंत साहस के साथ वीरतापूर्वक रक्षा की और अंततः कालपी की ओर प्रस्थान किया जहाँ उन्होंने तात्या टोपे के साथ मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा बनाया।
2. कालपी के पतन के बाद रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे ने ग्वालियर की ओर कूच किया, जहाँ सिंधिया राजवंश के शासक जयाजीराव सिंधिया ने उनका खुलकर समर्थन किया और अपनी पूरी सेना उन्हें सौंप दी, जिससे उनका पलड़ा अंग्रेजों पर भारी हो गया।
3. ग्वालियर पर अधिकार करने के बाद रानी लक्ष्मीबाई ने तात्या टोपे के साथ मिलकर यहाँ एक मजबूत रक्षा पंक्ति बनाई, किंतु अंततः जून 1858 में कोट की सराय के युद्ध में ब्रिटिश सेना से लड़ते हुए रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुईं।
4. ग्वालियर के पतन के पश्चात तात्या टोपे ने मध्य भारत और राजस्थान के जंगलों में सफल गोरिल्ला युद्ध का संचालन किया, और लगभग एक वर्ष तक अंग्रेजों को छकाने के बाद उनके एक विश्वासघाती जमींदार मित्र मानसिंह द्वारा धोखा दिए जाने के कारण उन्हें पकड़ लिया गया और फांसी दे दी गई।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी आंदोलनों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वर्ष 1928 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में 'हिुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HRA) का नाम बदलकर 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) कर दिया गया और इसमें समाजवाद को आधिकारिक रूप से मुख्य वैचारिक आधार बनाया गया।
2. वर्ष 1924 में कानपुर में स्थापित HRA के संस्थापक सदस्यों में सचिंद्र नाथ सान्याल, रामप्रसाद बिस्मिल और जोगेश चंद्र चटर्जी शामिल थे, जिन्होंने कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित होकर इस दल का गठन किया था।
3. सेंट्रल असेंबली बम कांड (8 अप्रैल 1929) के दौरान भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 'पब्लिक सेफ्टी बिल' और 'ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल' के विरोध में विधानसभा में बम फेंके थे, जिसका उद्देश्य किसी को जान से मारना नहीं बल्कि 'बहरे कानों को सुनाना' था।
4. लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए दिसंबर 1928 में लाहौर में ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सांडर्स की हत्या की योजना में चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और सुखदेव के साथ-साथ बटुकेश्वर दत्त भी प्रत्यक्ष रूप से गोली चलाने वालों में शामिल थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
वर्ष 1857 के महान विद्रोह के परिणाम और भारत सरकार अधिनियम 1858 (क्वीन विक्टोरिया की घोषणा) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत सरकार अधिनियम 1858 के द्वारा भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन कर दिया गया, जिसके तहत 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' और 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स' की दोहरी शासन प्रणाली को समाप्त कर दिया गया और 'भारत के राज्य सचिव' (Secretary of State for India) के पद का सृजन किया गया, जिसे सहायता के लिए 15 सदस्यीय परिषद प्रदान की गई।
2. क्वीन विक्टोरिया की ऐतिहासिक घोषणा (जिसे इलाहाबाद दरबार में 1 नवंबर 1858 को लॉर्ड कैनिंग द्वारा पढ़ा गया था) में यह आश्वासन दिया गया कि ब्रिटिश सरकार भारतीय रियाسतों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगी, उनके दत्तक पुत्र लेने के अधिकारों (Doctrine of Lapse को समाप्त करते हुए) को मान्यता दी जाएगी, तथा ब्रिटिश भारत के लोगों के साथ नस्ल, धर्म या जन्म के आधार पर सरकारी नौकरियों में कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।
3. इस अधिनियम और महारानी की घोषणा के पश्चात ब्रिटिश सेना की नीति में यह आमूल-चूल परिवर्तन किया गया कि बंगाल की सेना में उच्च जातियों के सैनिकों (विशेषकर अवध के ब्राह्मणों और राजपूतों) के अनुपात को कम किया गया, तथा सिख, गोरखा और पठानों जैसी जातियों को 'मार्शल रेस' (लड़ाकू नस्ल) घोषित कर सेना में उनकी संख्या बढ़ाई गई।
4. विद्रोह के दमन के तुरंत बाद ब्रिटिश संसद ने भारतीय जनता को यह पूर्ण अधिकार प्रदान कर दिया कि वे देश के सर्वोच्च विधायी निकायों (विधान परिषदों) में अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों को भेजकर ब्रिटिश नीतियों के विरुद्ध कानून निर्माण में संशोधन की मांग कर सकते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
वर्ष 1857 के महान विद्रोह की असफलता और उसके नेतृत्व की सीमाओं के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 1857 के विद्रोहियों के पास न तो कोई केंद्रीयकृत उच्च कमान (Centralized High Command) था और न ही कोई सुनियोजित अखिल भारतीय राजनीतिक व सैन्य रणनीति; विभिन्न क्षेत्रों के नेतृत्वकर्ताओं ने मुख्य रूप से अपने स्थानीय और क्षेत्रीय हितों व अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष किया।
2. ब्रिटिश सेना के पास आधुनिक संचार साधनों जैसे टेलीग्राफ और तीव्र रेल परिवहन का निर्णायक लाभ था, जबकि विद्रोहियों के पास सैनिक अनुशासन, आधुनिक हथियारों और गुप्त सूचनाओं के आदान-प्रदान की व्यवस्था का पूर्ण अभाव था।
3. भारत के अधिकांश बड़े देसी रियासतें (जैसे हैदराबाद, ग्वालियर, इंदौर और भोपाल के शासक) तथा शिक्षित मध्यम वर्ग व व्यापारी वर्ग या तो तटस्थ रहे या उन्होंने अंग्रेजों का सक्रिय रूप से समर्थन किया, जिससे विद्रोह अखिल भारतीय जन-आंदोलन का रूप नहीं ले सका।
4. मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को विद्रोहियों द्वारा भारत का सम्राट घोषित किए जाने के बाद उनके पास विशाल सैन्य संसाधन और अत्याधुनिक तोपखाने उपलब्ध थे, जिनकी सहायता से उन्होंने अंग्रेजों को दिल्ली से खदेड़ दिया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
मौर्य साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था, केंद्रीय अधिकारियों (तीर्थों) और आर्थिक नियंत्रण के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' में राज्य के सर्वोच्च उच्चाधिकारियों को 'तीर्थ' कहा गया है, जिनकी कुल संख्या अठारह थी; इनमें 'समाहर्त्ता' साम्राज्य के राजस्व संग्रहण और वित्तीय लेखा-जोखा (आय-व्यय) का मुख्य अधिकारी होता था, जबकि 'संनिधातृ' राजकीय कोषागार और भण्डागार का मुख्य संरक्षक था।
2. मौर्य काल में व्यापार और वाणिज्य पर राज्य के कड़े नियंत्रण के लिए विभिन्न विभागाध्यक्ष नियुक्त किए जाते थे, जिनमें 'पण्यनध्यक्ष' राजकीय व्यापार का अधीक्षक, 'संस्थानध्यक्ष' बाजार और माप-तौल का निरीक्षक तथा 'गणिकाध्यक्ष' वेश्यावृत्ति और वैश्यों के नियमन का प्रमुख अधिकारी होता था।
3. अशोक के शासनकाल में प्रांतीय प्रशासन के अंतर्गत चार प्रमुख प्रांत (चक्र) थे—उत्तरापथ (तक्षशिला), अवंतीराष्ट्र (उज्जैन), प्राची (पाटलिपुत्र) और कलिंग (तोसली), तथा इन प्रांतों का शासन सीधे सम्राट द्वारा नियुक्त अमत्यों (मंत्रियों) द्वारा चलाया जाता था, जिसमें राजवंशीय कुमारों की नियुक्ति का कोई प्रावधान नहीं था।
4. मौर्यकालीन न्याय व्यवस्था में दो प्रकार के न्यायालयों का उल्लेख मिलता है—'धर्मस्थीय' न्यायालय दीवानी मामलों (जैसे संपत्ति और संविदा विवाद) से संबंधित थे, जबकि 'कंटकशोधन' न्यायालय फौजदारी मामलों (जैसे समाज कंटकों और राज्य के विरुद्ध अपराधों) का दमन करने वाले न्यायालय थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.