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History of India
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19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के संदर्भ में, सत्यशोधक समाज, देव समाज और धर्म सभा जैसी संस्थाओं के वैचारिक दृष्टिकोण एवं संस्थापकों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. ज्योतिराव फुले द्वारा वर्ष 1873 में स्थापित 'सत्यशोधक समाज' का मुख्य उद्देश्य शूद्रों और अतिशूद्रों को ब्राह्मणवादी वर्चस्व, धार्मिक पाखंडों और पुरोहिती शोषण से मुक्त कराना था, तथा इस संगठन ने अपनी मुखपत्र 'गुलामगिरी' के माध्यम से समाज के वंचित वर्गों में अधिकारों की चेतना जगाई।
- 2. वर्ष 1887 में लाहौर में शिव नारायण अग्निहोत्री द्वारा स्थापित 'देव समाज' का मूल बल आत्मा की अमरता, गुरु की सर्वोच्चता और उच्च नैतिक आचरण पर था, तथा इसने मांसाहार, मद्यपान और रिश्वतखोरी जैसी बुराइयों का कड़ा विरोध किया।
- 3. राधाकांत देव द्वारा वर्ष 1830 में स्थापित 'धर्म सभा' एक रूढ़िवादी संस्था थी, जिसने राजा राममोहन राय द्वारा ब्रह्म समाज के माध्यम से सती प्रथा के उन्मूलन के लिए चलाए गए सुधारों का समर्थन किया था, किंतु आधुनिक पश्चिमी शिक्षा के प्रसार का पुरजोर विरोध किया था।
- 4. गोपाल गणेश आगरकर और महादेव गोविंद रानाडे द्वारा स्थापित 'डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी' ने महाराष्ट्र में शिक्षा के प्रसार और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में कार्य किया, तथा आगरकर ने 'सुधारक' पत्र के माध्यम से सामाजिक रूढ़िवादिता और धार्मिक अंधविश्वासों पर तीखे प्रहार किए।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है क्योंकि ज्योतिराव फुले ने 1873 में 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की थी, जिसका उद्देश्य निचली जातियों को ब्राह्मणवादी वर्चस्व से मुक्त कराना था और उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'गुलामगिरी' इसी वैचारिक आधार पर रचित है। कथन 2 सही है; शिव नारायण अग्निहोत्री द्वारा 1887 में लाहौर में स्थापित 'देव समाज' धार्मिक और नैतिक सुधारों पर केंद्रित था जो मांसाहार व मद्यपान का विरोधी था। कथन 3 गलत है क्योंकि राधाकांत देव की 'धर्म सभा' (1830) ने विलियम बेंटिक द्वारा 1829 में सती प्रथा के निषेध कानून का तीव्र विरोध किया था (वह रूढ़िवादी थी और सती प्रथा के अंत के खिलाफ थी)। कथन 4 सही है, गोपाल गणेश आगरकर और रानाडे आदि ने शिक्षा और सुधारों में महत्वपूर्ण योगदान दिया तथा आगरकर ने 'सुधारक' पत्र निकाला था। इस काल के आंदोलनों के विस्तृत अध्ययन के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
Related Questions
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मौर्य साम्राज्य की केंद्रीय प्रशासनिक व्यवस्था और आर्थिक नियंत्रण के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' में राज्य के 'सप्तांग सिद्धांत' का उल्लेख है, जिसके अनुसार राजा (स्वामी), आमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, सेना और मित्र राज्य के सात आवश्यक अंग हैं।
2. मौर्य प्रशासन में 'समाहर्ता' साम्राज्य के आय-व्यय (राजस्व संग्रहण) का मुख्य अधिकारी होता था, जबकि 'सन्निदाता' राजकीय कोषागार और भण्डारगृह का संरक्षक था।
3. मेगास्थनीज की 'इंडिका' के अनुसार पाटलिपुत्र नगर का प्रशासन छह समितियों द्वारा संचालित होता था, और प्रत्येक समिति में सात सदस्य होते थे जो विदेशी पर्यटकों, जन्म-मृत्यु पंजीकरण, व्यापार और शिल्प का नियमन करते थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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ब्रिटिश शासनकाल में भारत में लागू की गई विभिन्न भू-राजस्व प्रणालियों—स्थाई बंदोबस्त, रयतवारी और महालवारी—के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बंगाल, बिहार और उड़ीसा में लॉर्ड कॉर्नवॉलिस द्वारा 1793 में लागू 'स्थाई बंदोबस्त' के तहत जमींदारों को भूमि का स्थाई स्वामी बना दिया गया, लेकिन 'सूर्यास्त कानून' (Sunset Law) के अंतर्गत यदि कोई जमींदार निश्चित तिथि को सूर्यास्त से पहले भू-राजस्व जमा नहीं करता था, तो उसकी जमींदारी नीलाम कर दी जाती थी।
2. थॉमस मुनरो द्वारा दक्षिण भारत में लागू 'रयतवारी व्यवस्था' के अंतर्गत सरकार और किसान (रयत) के बीच सीधा अनुबंध होता था, तथा लगard का निर्धारण भूमि की उर्वरता के आधार पर किया जाता था, किंतु यह कर स्थाई और अपरिवर्तनीय था जिसे कभी बढ़ाया नहीं जा सकता था।
3. हॉल्ट मैकेंज़ी द्वारा परिकल्पित और उत्तर-पश्चिम प्रांत, मध्य भारत व पंजाब में लागू 'महालवारी व्यवस्था' के तहत भू-राजस्व का निर्धारण व्यक्तिगत किसान के स्तर पर न करके संपूर्ण ग्राम या 'महाल' (गाँवों के समूह) के स्तर पर किया जाता था, और राजस्व भुगतान के लिए ग्राम का मुखिया या लंबरदार उत्तरदायी होता था।
4. इन तीनों भू-राजस्व प्रणालियों के परिणामस्वरूप भारतीय कृषि का बड़े पैमाने पर वाणिज्यीकरण हुआ, जिससे पारंपरिक खाद्य फसलों के स्थान पर नील, कपास, अफीम और जूट जैसी नकदी फसलों के उत्पादन को बढ़ावा मिला तथा कृषक वर्ग महाजनों व साहूकारों के कर्ज के जाल में उलझता चला गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह की असफलता और उसके नेतृत्व की कमियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 1857 के विद्रोह के पास एक सुसंगत आधुनिक राजनीतिक दृष्टिकोण और भविष्य के भारत के लिए कोई स्पष्ट सामाजिक-आर्थिक और प्रशासनिक एजेंडा नहीं था, बल्कि अधिकांश विद्रोही नेता अपनी पुरानी खोई हुई जागीरें और अधिकार वापस पाने तक ही सीमित थे।
2. विद्रोही ताकतों के बीच अखिल भारतीय स्तर पर एक केंद्रीय और प्रभावी सैन्य नेतृत्व का पूर्ण अभाव था; दिल्ली के सम्राट बहादुर शाह जफर नाममात्र के प्रतीक थे, किंतु उनके पास न तो वास्तविक सैन्य शक्ति थी और न ही विभिन्न क्षेत्रीय कमांडरों के बीच समन्वय स्थापित करने की क्षमता।
3. भारत के अधिकांश बड़े जमींदार, साहूकार और आधुनिक शिक्षित वर्ग ने विद्रोह का खुलकर समर्थन किया क्योंकि वे ब्रिटिश आर्थिक नीतियों से त्रस्त थे, जिससे अंग्रेजों को भारत में टिके रहने में भारी कठिनाई हुई।
4. पंजाब और दक्षिण भारत के अधिकांश क्षेत्र तथा सिंधिया, होलकर और हैदराबाद जैसी बड़ी रियासतें इस विद्रोह से तटस्थ रहीं या उन्होंने ब्रिटिश सेना को दबाने में सक्रिय सहायता प्रदान की, जिससे अंग्रेजों के लिए उत्तर भारत के विद्रोह को कुचलना आसान हो गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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शिवाजी महाराज का विधिवत राज्याभिषेक 1674 ई. में किस स्थान पर हुआ था?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह की प्रकृति और उसके वैचारिक स्वरूप के संबंध में विभिन्न इतिहासकारों और विचारकों द्वारा दिए गए निम्नलिखित प्रसिद्ध मतों/कथनों पर विचार कीजिए:
1. इतिहासकार जॉन लॉरेंस और सी. आर. सीले (John Lawrence & Seeley) के अनुसार 1857 का विद्रोह पूर्णतः एक 'सिपाही विद्रोह' (Sepoy Mutiny) मात्र था, जिसका उद्देश्य किसी राष्ट्रीय स्वतंत्रता या जन-आंदोलन का रूप लेना नहीं था, बल्कि यह केवल अनुशासित सैनिकों का अपनी सरकार के खिलाफ किया गया असंतोष था।
2. ब्रिटिश इतिहासकार टी. आर. होम्स (T. R. Holmes) का मानना था कि 1857 का विद्रोह 'सभ्यता और बर्बरता के बीच का संघर्ष' (Conflict between Civilization and Barbarism) था, जिसमें अंग्रेजों ने आधुनिक सभ्यता और कानून के शासन को बनाए रखने के लिए इस क्रूर विद्रोह का दमन किया था।
3. स्वतंत्रता सेनानी और इतिहासकार विनायक दामोदर सावरकर (V. D. Savarkar) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में इसे सुनियोजित ढंग से लड़ा गया भारत का 'प्रथम स्वतंत्रता संग्राम' (First War of Indian Independence) घोषित किया था।
4. प्रसिद्ध मार्क्सवादी इतिहासकार एस. एन. सेन (S. N. Sen) ने अपनी आधिकारिक पुस्तक '1857' में यह निष्कर्ष निकाला था कि यह महान विद्रोह राष्ट्रीय स्तर पर अंग्रेजों के विरुद्ध एक सुनियोजित और पूर्व-नियोजित षड्यंत्र था, जिसकी शुरुआत एक धर्मयुद्ध के रूप में हुई और अंततः इसका समापन स्वतंत्रता प्राप्ति के रूप में हुआ था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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