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History of India
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ब्रिटिश भारत में लागू की गई विभिन्न भू-राजस्व प्रणालियों (स्थाई बंदोबस्त, रयतवारी और महालवारी) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. स्थाई बंदोबस्त प्रणाली के अंतर्गत लॉर्ड कार्नवालिस ने बंगाल और बिहार के क्षेत्रों में भू-राजस्व की मांग को जमींदारों के लिए हमेशा के लिए निश्चित कर दिया था, जिसके कारण कृषि के विस्तार और सुधारों में जमींदारों की रुचि बहुत अधिक बढ़ गई थी और उन्होंने किसानों के कल्याण के लिए बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश किया था।
  2. 2. रयतवारी व्यवस्था के तहत मद्रास और बॉम्बे प्रेसीडेंसी में भूमि का स्वामित्व सीधे किसानों (रयत) के पास था, तथा सरकार और किसानों के बीच सीधा अनुबंध होता था, जिसमें लगान की दरें बहुत अधिक थीं और अकाल या फसल खराब होने की स्थिति में भी लगान माफी का कोई स्पष्ट या उदार प्रावधान नहीं था।
  3. 3. महालवारी व्यवस्था को मुख्य रूप से उत्तर-पश्चिम प्रांत, मध्य भारत और पंजाब के कुछ हिस्सों में लागू किया गया था, जिसके अंतर्गत भू-राजस्व का निर्धारण व्यक्तिगत किसान के स्तर पर न करके संपूर्ण ग्राम या ग्राम समुदाय (महाल) के स्तर पर किया जाता था, और इसके भुगतान के लिए पूरा गाँव सामूहिक रूप से उत्तरदायी था।
  4. 4. इन तीनों भू-राजस्व प्रणालियों का दीर्घकालिक प्रभाव यह हुआ कि भारतीय कृषि का तेजी से वाणिज्यीकरण हुआ और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का औपनिवेशिक दोहन इस हद तक बढ़ गया कि किसान पूरी तरह से साहूकारों और महाजनों के ऋणजाल में उलझते चले गए।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है क्योंकि स्थाई बंदोबस्त के अंतर्गत यद्यपि राजस्व की मांग जमींदारों के लिए निश्चित कर दी गई थी, किंतु जमींदारों ने कृषि सुधारों या किसानों के कल्याण के लिए कोई पूंजी निवेश नहीं किया। वे केवल एक बिचौलिए की तरह लगान वसूलने का कार्य करते थे और 'सूर्यास्त कानून' के डर से किसानों का अत्यधिक शोषण करते थे। कथन 2, 3 और 4 बिल्कुल सही हैं; रयतवारी व्यवस्था में सीधा संपर्क था किंतु दरें अत्यधिक थीं, महालवारी व्यवस्था में सामूहिक जिम्मेदारी का प्रावधान था, और इन नीतियों के कारण भारतीय कृषि का वाणिज्यीकरण हुआ जिससे ग्रामीण ऋणग्रस्तता तेजी से बढ़ी। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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