BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

History of India
4 views

भक्ति आंदोलन और सूफी सिलसिले के दार्शनिक तथा ऐतिहासिक विकास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. दक्षिण भारत के अलवार (विष्णु भक्त) और नयनार (शिव भक्त) संतों ने भक्ति आंदोलन की नींव रखी थी, और इनकी भक्ति परंपरा में जाति और लिंग के भेदभाव का कड़ाई से पालन करते हुए शूद्रों तथा महिलाओं के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया था।
  2. 2. बारहवीं शताब्दी में बंगाल में उत्पन्न 'अचिन्त्य भेदभेदवाद' के प्रस्तावक चैतन्य महाप्रभु ने कीर्तन पद्धति के माध्यम से भक्ति को जन-जन तक पहुँचाया और प्रेम तथा आनंद के मार्ग को मोक्ष का मुख्य साधन बताया।
  3. 3. सूफी संतों का 'वह्दत-उल-वुजूद' (अस्तित्व की एकता) का सिद्धांत इस विचार पर आधारित है कि सृष्टिकर्ता (अल्लाह) और उसकी रचना (ब्रह्मांड) मूलतः एक ही हैं, जिसकी दार्शनिक व्याख्या आगे चलकर इब्न अल-अरबी द्वारा की गई थी।
  4. 4. चिश्ती सिलसिले के प्रसिद्ध संत निजामुद्दीन औलिया ने राजकीय संरक्षण और सुल्तानों के दरबार में उपस्थिति को अनिवार्य मानते हुए दिल्ली सल्तनत के कई पदों को स्वीकार किया था ताकि इस्लाम के प्रसार में मदद मिल सके।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है क्योंकि दक्षिण भारत के अलवार और नयनार संतों ने रूढ़िवादी जाति व्यवस्था को चुनौती दी थी और उनकी भक्ति परंपरा में समाज के सभी वर्गों, विशेषकर शूद्रों और महिलाओं को भी सम्मिलित किया गया था। कथन 2 सत्य है; चैतन्य महाप्रभु ने 'अचिन्त्य भेदभेदवाद' का प्रतिपादन किया और संकीर्तन आंदोलन के माध्यम से बंगाल में भक्ति को अत्यधिक लोकप्रिय बनाया। कथन 3 सत्य है, क्योंकि सूफी मत का 'वह्दत-उल-वुजूद' सिद्धांत (जिसका अर्थ 'अस्तित्व की एकता' है) इब्न अल-अरबी के दर्शन पर आधारित है, जिसके अनुसार ईश्वर और उसकी सृष्टि में कोई तात्विक भेद नहीं है। कथन 4 असत्य है; हजरत निजामुद्दीन औलिया और अधिकांश चिश्ती संत राजकीय संरक्षण, सुल्तानों के दरबार और शाही उपहारों से हमेशा दूर रहते थे (वे 'सुल्तान-उल-मशाइख' कहलाए और दरबार से दूरी बनाए रखने की नीति अपनाई)। विकिपीडिया संदर्भ
Share:

Related Questions

वर्ष 1857 के विद्रोह की असफलता के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. विद्रोहियों के पास एक सुसंगत राजनीतिक दृष्टिकोण, आधुनिक केंद्रीय नेतृत्व तथा अखिल भारतीय स्तर पर एक साझा भविष्य का प्रशासनिक एजेंडा नहीं था, जिसके कारण यह क्षेत्रीय असंतोष तक सीमित होकर रह गया। 2. अधिकांश भारतीय रियासतों के शासकों, बड़े जमींदारों और शिक्षित मध्य वर्ग ने ब्रिटिश सत्ता के प्रति वफादारी दिखाई या तटस्थ रहे, क्योंकि उन्हें भय था कि विद्रोह की सफलता से देश में सामंती अराजकता फैल जाएगी। 3. आधुनिक संचार साधनों—जैसे टेलीग्राफ, रेलवे और आधुनिक डाक व्यवस्था—का पूर्ण नियंत्रण अंग्रेजों के पास था, जिससे उन्हें देश के दूरदराज के हिस्सों से सैन्य टुकड़ियों को तुरंत गतिशीलता प्रदान करने में रणनीतिक लाभ मिला। 4. विद्रोहियों के पास हथियारों और गोला-बारूद की कोई कमी नहीं थी, किंतु अंग्रेजों द्वारा युद्ध के दौरान आधुनिक तोपखाने और वैज्ञानिक सैन्य रणनीति का उपयोग न किए जाने के कारण अंततः भारतीय सेनाओं को हार का सामना करना पड़ा। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? प्राचीन भारतीय इतिहास के संदर्भ में वर्धन राजवंश एवं दक्षिण भारत के राजवंशों (चोल, पल्लव, चालुक्य) की प्रशासनिक और सांस्कृतिक विशेषताओं के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. पल्लव शासक नरसिंहवर्मन प्रथम (महामल्ल) के शासनकाल में महाबलीपुरम में प्रसिद्ध 'पंच रथ' मंदिरों का निर्माण किया गया था, जो एकात्म (Monolithic) वास्तुकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। 2. बादामी के चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा नदी के तट पर हर्षवर्धन को पराजित किया था, और इस विजय का विस्तृत उल्लेख एहोल (Aihole) प्रशस्ति में मिलता है, जिसकी रचना रवि कीर्ति ने की थी। 3. चोल प्रशासन की सबसे बड़ी विशेषता उनकी स्थानीय स्वशासन प्रणाली थी, जिसके अंतर्गत 'उर' (साधारण ग्राम सभा), 'सभा' या 'महासभा' (अग्रहार गाँवों की सभा) और 'नगरम' (व्यापारियों की बस्ती) जैसी संस्थाएं स्वायत्त रूप से कार्य करती थीं, और इसका सबसे प्रामाणिक विवरण उत्तरमेरूर (Uttiramerur) शिलालेखों से प्राप्त होता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34), प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930) तथा गांधी-इरविन समझौते (1931) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. मार्च 1930 में महात्मा गांधी द्वारा आरंभ किए गए दांडी मार्च के साथ ही देश के विभिन्न भागों में 'चौकीदारी कर' का भुगतान न करने का अभियान, वन कानूनों का उल्लंघन तथा उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत में खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में 'खुदाई खिदमतगार' (लाल कुर्ती दल) द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन का अत्यंत प्रभावी संचालन किया गया था। 2. 5 मार्च 1931 को हस्ताक्षरित 'दिल्ली समझौता' (गांधी-इरविन समझौता) के अंतर्गत सरकार ने हिंसा के मामलों में संलिप्त व्यक्तियों को छोड़कर सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर सहमति व्यक्त की, तथा कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित कर आगामी द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेना स्वीकार किया। 3. वर्ष 1930 से 1932 के मध्य लंदन में आयोजित तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया था, क्योंकि गांधी-इरविन समझौते के पश्चात कांग्रेस ने सभी सम्मेलनों में अपनी उपस्थिति अनिवार्य कर दी थी। 4. कराची में मार्च 1931 में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में गांधी-इरविन समझौते का अनुमोदन किया गया, तथा इसी अधिवेशन में पहली बार 'मौलिक अधिकार और राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम' से संबंधित ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया गया जिसकी अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल ने की थी। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? 1857 के महान विद्रोह के दौरान फैजाबाद, बरेली और इलाहाबाद में हुए संघर्ष और उनके दमन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. फैजाबाद में विद्रोह का नेतृत्व करने वाले मौलवी अहमदुल्लाह शाह को 'डंका शाह' के नाम से भी जाना जाता था, और इस क्षेत्र में विद्रोह का दमन करने वाले ब्रिटिश सैन्य अधिकारी कर्नल नील थे। 2. बरेली में रुहेलखंड के पूर्व शासक के वंशज खान बहादुर खान ने विद्रोह की कमान संभाली थी, जिन्हें बाद में ब्रिटिश सेनापति सर कॉलिन कैंपबेल द्वारा पराजित किया गया। 3. इलाहाबाद में विद्रोह का नेतृत्व मौलवी लियाकत अली ने किया था, जहाँ उन्होंने प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित कर लिया था, किंतु जनरल नील ने अत्यधिक क्रूरता के साथ इस विद्रोह को कुचल दिया। 4. मौलवी अहमदुल्लाह शाह पर अंग्रेजों द्वारा 50,000 रुपये का भारी इनाम रखा गया था, और अंततः पवयाँ (पुवयाँ) के राजा के विश्वासघात के कारण उनकी हत्या कर दी गई थी। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? लाहौर की प्रसिद्ध "बादशाही मस्जिद" का निर्माण किस मुगल शासक ने करवाया था?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.