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History of India
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गुप्तोत्तर काल एवं गुप्त साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था तथा आर्थिक संरचना के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. गुप्त काल में भूमि अनुदान की प्रथा ('अग्रहार' व्यवस्था) में व्यापक वृद्धि हुई, जिसके परिणामस्वरूप न केवल ब्राह्मणों और बौद्ध विहारों को कर-मुक्त भूमि दी गई, बल्कि प्रशासनिक और न्यायिक अधिकारों का भी स्थानीय स्तर पर हस्तांतरण हुआ, जिससे सामंती प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिला।
- 2. इस काल में हस्तशिल्प और आंतरिक व्यापार में अत्यधिक समृद्धि आई तथा रोमन साम्राज्य के साथ होने वाला समुद्री व्यापार अपने चरम पर पहुँच गया, जिसके कारण सोने के सिक्कों ('दीनार') का प्रचलन समाज के प्रत्येक वर्ग में सामान्य हो गया था।
- 3. गुप्तकालीन प्रशासन में राजा की सहायता के लिए 'मंत्रित्रीपरिषद' होती थी, जिसके सदस्यों को 'मंत्री' या 'अमात्य' कहा जाता था, और प्रांतों (देश या भुक्ति) के प्रशासनिक प्रमुख के रूप में 'उपपरिक' नियुक्त किए जाते थे, जो सीधे सम्राट के प्रति उत्तरदायी थे।
- 4. सुप्रसिद्ध खगोलशास्त्री एवं गणितज्ञ आर्यभट्ट ने इसी काल में 'आर्यभट्रीय' और 'सूर्यसिद्धांत' की रचना की, तथा उन्होंने सर्वप्रथम यह वैज्ञानिक प्रतिपादन किया कि पृथ्वी गोल है और अपनी धुरी पर घूमती है जिससे दिन और रात होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
गुप्त साम्राज्य (Gupta Empire) के संदर्भ में कथन 1, 3 और 4 सही हैं। गुप्त काल में राजाओं, ब्राह्मणों और मंदिरों को कर-मुक्त भूमि दान देने की प्रथा ('अग्रहार' और देवदान) में भारी वृद्धि हुई, जिससे सामंती व्यवस्था (Feudalism) का बीजारोपण हुआ। प्रांतों (भुक्ति) के शासक 'उपरिक' कहलाते थे। आर्यभट्ट ने गुप्त काल में ही खगोल विज्ञान में पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने के सिद्धांत को प्रतिपादित किया था। किंतु कथन 2 गलत है क्योंकि गुप्त काल के उत्तरार्ध में (विशेषकर स्कंदगुप्त के बाद) रोमन व्यापार में भारी गिरावट आई और सिक्कों में धातु की मिलावट (खराब होते दीनार) के प्रमाण मिलते हैं, जिससे आर्थिक पतन के संकेत मिलते हैं। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देखें।
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बुलंद दरवाजा किसने बनवाया?
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ब्रिटिश भारत में लागू की गई विभिन्न भू-राजस्व प्रणालियों — स्थाई बंदोबस्त, रयतवारी और महालवारी — के वैधानिक, प्रशासनिक और आर्थिक प्रभावों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बंगाल प्रेसीडेंसी में 1793 में लॉर्ड कार्नवालिस द्वारा लागू 'स्थाई बंदोबस्त' (Permanent Settlement) के अंतर्गत भू-राजस्व का निर्धारण जमींदारों के साथ किया गया था, जिसमें कुल वसूल किए जाने वाले राजस्व का 10/11 भाग कंपनी को तथा 1/11 भाग जमींदारों को अपने प्रशासनिक व्यय और लाभ के रूप में रखने का अधिकार दिया गया था।
2. थॉमस मुनरो द्वारा मुख्य रूप से मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसी में क्रियान्वित 'रयतवारी व्यवस्था' (Ryotwari System) में सरकार और किसानों (रयतों) के मध्य सीधा समझौता हुआ था, जिसके तहत भूमि का स्वामित्व प्रत्यक्ष रूप से किसानों के पास था, किंतु राज्य द्वारा लगान की दरें अत्यधिक उच्च रखी गईं और अकाल के समय भी राहत का कोई प्रावधान नहीं था।
3. उत्तर-पश्चिम प्रांत, मध्य भारत और पंजाब के कुछ हिस्सों में लागू 'महालवारी व्यवस्था' (Mahalwari System) के अंतर्गत भू-राजस्व भुगतान की इकाई व्यक्तिगत किसान न होकर संपूर्ण गाँव या महलों (ग्राम समूह) होता था, जहाँ पूरा ग्रामीण समुदाय सामूहिक रूप से राजस्व अदायगी के लिए उत्तरदायी होता था और इस प्रणाली का प्रतिपादन आधिकारिक रूप से होल्ट मैकेंजी द्वारा किया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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दीन-ए-इलाही की शुरुआत किसने की?
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ब्रिटिश भारत में लागू की गई विभिन्न भू-राजस्व प्रणालियों—स्थाई बंदोबस्त, रयतवारी और महालवारी—के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बंगाल, बिहार और उड़ीसा में लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा 1793 में लागू 'स्थाई बंदोबस्त' के तहत जमींदारों को भूमि का स्थायी स्वामी बना दिया गया, जहाँ राजस्व की दरें इतनी अधिक थीं कि 'सूर्यास्त कानून' (Sunset Law) के कठोर प्रावधानों के कारण शुरुआती वर्षों में ही कई पारंपरिक जमींदारों की संपत्तियां नीलाम हो गईं।
2. थॉमस मुनरो द्वारा मद्रास प्रेसीडेंसी में बड़े पैमाने पर लागू 'रयतवारी व्यवस्था' में बिचौलियों का पूर्ण रूप से उन्मूलन कर दिया गया और किसानों (रयतों) को भूमि का पूर्ण और सुरक्षित स्वामित्व दे दिया गया, जिससे किसानों पर महाजनों का आर्थिक शिकंजा पूरी तरह समाप्त हो गया।
3. हॉल्ट मैकेंज़ी और रॉबर्ट मार्टिन बर्ड द्वारा उत्तर-पश्चिम प्रांत और पंजाब के क्षेत्रों में विकसित 'महालवारी व्यवस्था' के अंतर्गत व्यक्तिगत किसानों को अलग से उत्तरदायी न मानकर पूरे ग्राम समुदाय या 'महाल' को संयुक्त रूप से भू-राजस्व भुगतान के लिए उत्तरदायी ठहराया गया।
4. इन तीनों भू-राजस्व प्रणालियों के संयुक्त परिणाम के रूप में भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था का तेजी से वाणिज्यीकरण (Commercialization of Agriculture) हुआ, जिसके फलस्वरूप खाद्यान्न फसलों के स्थान पर नकदी फसलों (जैसे नील, कपास, अफीम) के उत्पादन को बल मिला।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह (1917), खेड़ा सत्याग्रह (1918) और असहयोग आंदोलन (1920-22) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. चंपारण सत्याग्रह के दौरान यूरोपीय नील बागान मालिकों द्वारा किसानों पर 'तीनकथा पद्धति' थोपी गई थी, जिसके तहत किसानों को अपनी कुल भूमि के 3/20वें हिस्से पर अनिवार्य रूप से नील की खेती करना आवश्यक था, और इस समस्या के समाधान हेतु जाँच समिति के सदस्यों में महात्मा गांधी भी एक सदस्य के रूप में शामिल थे।
2. खेड़ा सत्याग्रह में फसल खराब होने के बावजूद ब्रिटिश सरकार द्वारा राजस्व वसूली न रोके जाने पर गांधीजी ने किसानों को लगान अदायगी रोकने का आह्वान किया था, और इस संघर्ष के दौरान इंदुलाल याग्निक, वल्लभभाई पटेल और शंकरलाल बैंकर जैसे स्थानीय नेताओं ने गांधीजी का पूर्ण सहयोग किया था।
3. असहयोग आंदोलन के दौरान कलकत्ता के विशेष अधिवेशन (सितंबर 1920) में असहयोग का प्रस्ताव चित्तरंजन दास द्वारा प्रस्तुत किया गया था, जबकि नागपुर अधिवेशन (दिसंबर 1920) में इस प्रस्ताव की पुष्टि के साथ-साथ कांग्रेस के संगठन में बड़ा बदलाव करते हुए भाषाई आधार पर प्रांतीय कांग्रेस समितियों का गठन किया गया।
4. चौरी-चौरा की घटना (5 फरवरी 1922) के उपरांत महात्मा गांधी ने बारडोली में हुई कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में एकतरफा रूप से असहयोग आंदोलन को तत्काल प्रभाव से स्थगित कर दिया था, जिसके विरोध में मोतीलाल नेहरू और चित्तरंजन दास ने कांग्रेस से अलग होकर 'स्वराज पार्टी' की स्थापना की थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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