त्वरित लिंक्स
History of India
6 views
वर्ष 1857 के विद्रोह के दौरान कानपुर में नाना साहब, तात्या टोपे और अजीमुल्ला खां की गतिविधियों और रणनीतिक भूमिका के संबंध में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. नाना साहब ने कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व करते हुए स्वयं को पेशवा घोषित किया और पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र होने के नाते अपनी ब्रिटिश पेंशन रोके जाने के बाद कंपनी के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष की कमान संभाली।
- 2. अजीमुल्ला खां ने नाना साहब के मुख्य राजनीतिक और कूटनीतिक सलाहकार के रूप में कार्य किया, तथा उन्होंने ब्रिटिश नीतियों के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जनमत तैयार करने और कूटनीतिक प्रयास करने के लिए लंदन तक की यात्रा की थी।
- 3. कानपुर में ब्रिटिश रेजिडेंट सर ह्यू व्हीलर द्वारा आत्मसमर्पण किए जाने के बाद हुई 'सती चौरा घाट घटना' के पश्चात नाना साहब ने अंग्रेजों को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करते हुए उन्हें कलकत्ता सुरक्षित भेज दिया था, और इस घटना में किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं हुई थी।
- 4. तात्या टोपे ने कानपुर के पतन के बाद सैन्य रूप से संघर्ष जारी रखा और बाद में रानी लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर ग्वालियर में ब्रिटिश सेना के खिलाफ प्रभावी गुरिल्ला युद्ध का संचालन किया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान कानपुर में पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब ने विद्रोहियों का नेतृत्व संभाला और स्वयं को पेशवा घोषित किया, क्योंकि अंग्रेजों ने उनकी पेंशन बंद कर दी थी। उनके मुख्य सलाहकार अजीमुल्ला खां थे, जिन्होंने लंदन जाकर कानूनी और कूटनीतिक प्रयास भी किए थे। तात्या टोपे ने नाना साहब के सैन्य बल का संचालन किया और बाद में रानी लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर ग्वालियर में अंग्रेजों के विरुद्ध कड़ा संघर्ष किया। हालांकि, कथन 3 असत्य है क्योंकि 'सती चौरा घाट घटना' में आत्मसमर्पण करने वाले अंग्रेजों के निष्क्रमण के दौरान भयंकर हिंसा भड़क उठी थी, जिससे कई अंग्रेज सैनिक मारे गए थे। इस विषय की विस्तृत जानकारी के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
Related Questions
→
औरंगजेब के सेनापति मीर जुमला ने उत्तर-पूर्व के किस राज्य को जीतकर वहाँ संधि की थी?
→
1857 के महान विद्रोह के दौरान दिल्ली में विद्रोहियों के वास्तविक नेतृत्व और मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर की भूमिका के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. दिल्ली में विद्रोह की शुरुआत 11 मई 1857 को मेरठ से आए सिपाहियों द्वारा लाल किले में प्रवेश करने के साथ हुई, जहाँ उन्होंने अनिच्छुक वृद्ध मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को भारत का 'शहनशाह-ए-हिंदुस्तान' (सम्राट) घोषित कर दिया।
2. यद्यपि बहादुर शाह जफर को विद्रोहियों का प्रतीकात्मक और औपचारिक प्रमुख घोषित कर दिया गया था, किंतु वास्तविक सैन्य और प्रशासनिक निर्णय लेने की शक्ति 'सैन्य अदालत' (Court of Administration) के पास थी, जिसमें विभिन्न रेजीमेंटों से चुने गए सिपाही प्रतिनिधि शामिल थे।
3. दिल्ली में विद्रोहियों के नेतृत्व का वास्तविक नियंत्रण जनरल बख्त खान के हाथों में था, जो बरेली से आए सैनिकों के एक दस्ते के प्रमुख के रूप में दिल्ली पहुँचे थे और जिन्हें जफर द्वारा 'साहिब-ए-आलम बहादुर' की उपाधि प्रदान की गई थी।
4. सितंबर 1857 में ब्रिटिश सेना द्वारा दिल्ली पर पुनः अधिकार किए जाने के पश्चात जनरल जॉन निकलसन के नेतृत्व में शाही परिवार के राजकुमारों को गोली मार दी गई तथा बहादुर शाह जफर पर देशद्रोह का मुकदमा चलाकर उन्हें रंगून (मर्मा) निर्वासित कर दिया गया जहाँ वर्ष 1862 में उनकी मृत्यु हो गई।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
वर्धन राजवंश तथा दक्षिण भारत के राजवंशों (चोल, पल्लव, चालुक्य) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पल्लव राजा नरसिंहवर्मन प्रथम (महामल्ल) ने वातापी के चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय को पराजित किया था और 'वातापिकोंड' की उपाधि धारण की थी, तथा इसी के शासनकाल में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने पल्लव की राजधानी कांची का भ्रमण किया था।
2. बादामी के चालुक्य वंश के सबसे महान शासक पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा नदी के तट पर हर्षवर्धन को पराजित किया था, और इस ऐतिहासिक युद्ध का विस्तृत विवरण अहोल अभिलेख में मिलता है जिसकी रचना उसके दरबारी कवि रविर्किर्ति ने की थी।
3. चोल राजवंश के शासक राजराजा प्रथम ने श्रीलंका (सिंध के तत्कालीन उत्तरी भाग) पर आक्रमण कर उसे अपने साम्राज्य में मिला लिया तथा संपूर्ण श्रीलंका को चोल साम्राज्य का एक नया प्रांत घोषित करते हुए वहाँ एक स्थायी चोल गवर्नर की नियुक्ति की थी।
4. वर्धन वंश के राजा हर्षवर्धन के शासनकाल में कन्नौज को साम्राज्य की राजधानी बनाया गया था, तथा कन्नौज में आयोजित भव्य धार्मिक सभा में बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय के सिद्धांतों का प्रचार किया गया था जिसकी अध्यक्षता ह्वेनसांग ने की थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
प्राचीन भारतीय इतिहास के संदर्भ में वर्धन राजवंश तथा दक्षिण भारत के राजवंशों (चोल, पल्लव, चालुक्य) की प्रशासनिक, सैन्य और सांस्कृतिक उपलब्धियों के संबंध में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पल्लव राजा नरसिंहवर्मन प्रथम (महामल्ल) ने वातापी के चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय को पराजित करके 'वातापीकोंड' की उपाधि धारण की थी और महाबलीपुरम में प्रसिद्ध रथ मंदिरों (मोनोलिथिक सप्तपगोडा) का निर्माण करवाया था।
2. हर्ष के शासनकाल में नालंदा विश्वविद्यालय की यात्रा करने वाले चीनी यात्री ह्वेनसांग ने यह उल्लेख किया है कि हर्ष के प्रशासन में राज्य की आय का एक बड़ा हिस्सा चार भागों में विभाजित था, जिसमें से एक भाग राजा के व्यक्तिगत खर्च और प्रशासनिक कार्यों के लिए तथा अन्य भाग विद्वानों, धार्मिक कार्यों और लोक कल्याण के लिए निर्धारित थे।
3. चोल राजवंश की स्थानीय स्वशासन प्रणाली, जो विशेष रूप से 'उत्तरमेरूर शिलालेखों' (परान्तक चोल प्रथम के शासनकाल के) से ज्ञात होती है, में ग्राम सभाओं (सभा या महासभा) के सदस्यों के चयन के लिए 'कुडवोलाई' (Kudavolai) नामक गुप्त मतदान (लॉटरी सिस्टम) पद्धति का प्रयोग किया जाता था।
4. बादामी के चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय और हर्षवर्धन के बीच नर्मदा नदी के तट पर हुए ऐतिहासिक युद्ध का सजीव विवरण जैन कवि रविकीर्ति द्वारा रचित 'ऐहोल प्रशस्ति' में प्राप्त होता है, जिसमें हर्षवर्धन की विजय और चालुक्य साम्राज्य के पतन का स्पष्ट उल्लेख है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान और उसके पश्चात आयोजित गोलमेज सम्मेलनों तथा गांधी-इरविन समझौते के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. गांधी-इरविन समझौते (1931) के तहत सरकार ने हिंसात्मक अपराधों के आरोपियों को छोड़कर शेष सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा करने और समुद्र के किनारे बिना कर दिए नमक बनाने का अधिकार स्वीकार कर लिया था।
2. द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) में कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में महात्मा गांधी ने भाग लिया था, जहाँ सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के विवाद और ब्रिटिश सरकार की अनुदार नीतियों के कारण यह सम्मेलन पूरी तरह असफल रहा।
3. डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लिया था और उन्होंने दलितों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की मांग की थी, जिसे महात्मा गांधी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया था।
4. वर्ष 1932 में लंदन में आयोजित तृतीय गोलमेज सम्मेलन का कांग्रेस द्वारा पूर्ण बहिष्कार किया गया था, और इसी सम्मेलन के निर्णयों के आधार पर बाद में 'भारत सरकार अधिनियम, 1935' पारित किया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.