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History of India
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सविनय अवज्ञा आंदोलन के दूसरे चरण (1932-34) और गांधी-इरविन समझौते के पश्चात उत्पन्न राजनीतिक परिदृश्य के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. गांधी-इरविन समझौते (5 मार्च 1931) के तहत कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित कर दिया और कराची अधिवेशन (1931) में इस समझौते का अनुमोदन किया गया, जहाँ महात्मा गांधी को दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में नामित किया गया था।
  2. 2. लंदन में आयोजित द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर गंभीर मतभेद होने के कारण गांधीजी निराश होकर भारत लौटे और जनवरी 1932 में कांग्रेस ने पुनः सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने का निर्णय लिया, जिसे वायसराय लॉर्ड विलिंगटन की दमनकारी नीतियों के कारण तुरंत कुचल दिया गया।
  3. 3. दूसरे चरण के सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान ब्रिटिश सरकार ने दमन चक्र तेज करते हुए कांग्रेस को अवैध घोषित कर दिया तथा वायसराय लॉर्ड विलिंगटन ने महात्मा गांधी के साथ किसी भी प्रकार की बातचीत करने से स्पष्ट इनकार कर दिया था।
  4. 4. मई 1934 में पटना में ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी की बैठक में औपचारिक रूप से सविनय अवज्ञा आंदोलन को पूरी तरह से समाप्त करने का निर्णय लिया गया।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि 5 मार्च 1931 को हस्ताक्षरित गांधी-इरविन समझौते के तहत कांग्रेस ने आंदोलन स्थगित किया और कराची अधिवेशन में इसे मंजूरी दी गई। कथन 2 गलत है क्योंकि लॉर्ड विलिंगटन ने आंदोलन शुरू होने पर कांग्रेस को अवैध घोषित कर दिया और दमन किया, लेकिन बातचीत से इनकार जैसी कोई बात नहीं थी; बल्कि सरकार ने आंदोलन को सख्ती से दबाया। कथन 3 और 4 सही हैं, मई 1934 में पटना अधिवेशन में आंदोलन आधिकारिक रूप से समाप्त हुआ। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देखें।
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