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History of India
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प्राचीन भारतीय धार्मिक इतिहास के संदर्भ में, जैन धर्म और बौद्ध धर्म की दार्शनिक मान्यताओं तथा संस्थागत विकास के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. जैन धर्म के 'स्यादवाद' (सप्तभंगी नय) सिद्धांत के अनुसार ज्ञान सापेक्ष और बहुआयामी होता है, जबकि बौद्ध धर्म के 'प्रतीतसमुत्पाद' (हेतुवाद) सिद्धांत के अनुसार संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रत्येक कार्य और घटना किसी न किसी कारण पर आधारित होती है, जो 'इदं प्रत्ययता' के नियम को दर्शाती है।
  2. 2. बौद्ध संघ में महिलाओं के प्रवेश के संदर्भ में, गौतम बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य आनंद के विशेष अनुरोध पर वैशाली में सर्वप्रथम महिलाओं को संघ में प्रविष्ट होने की अनुमति दी, तथा प्रथम महिला भिक्षुणी बुद्ध की सौतेली माता महाप्रजापति गौतमी बनी थीं।
  3. 3. जैन धर्म में मोक्ष प्राप्ति के लिए महावीर स्वामी ने त्रिरत्न (सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र) के साथ-साथ अत्यंत कठोर कायाक्लेश और संलेखना (संथारा) पद्धति को अनिवार्य माना, जबकि बौद्ध धर्म ने मध्यम मार्ग (अमध्याम प्रतिपदा) का अनुसरण करते हुए अतिवादी कायाक्लेश का पुरजोर विरोध किया।
  4. 4. द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन वैशाली में कालाशोक के संरक्षण में हुआ था, जिसमें बौद्ध संघ पूर्ण रूप से 'स्थविरावद' (थेरवाद) और 'महासांगिक' नामक दो प्रमुख संप्रदायों में स्थायी रूप से विभाजित हो गया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

उपर्युक्त कथनों में से कथन 1, 2 और 3 सही हैं, जबकि कथन 4 गलत है। जैन धर्म का 'स्यादवाद' और बौद्ध धर्म का 'प्रतीतसमुत्पाद' (विकिपीडिया संदर्भ) उनके केंद्रीय दार्शनिक स्तंभ हैं। बौद्ध संघ में महिलाओं का प्रवेश वैशाली में हुआ था और महाप्रजापति गौतमी प्रथम भिक्षुणी थीं। हालांकि, कथन 4 में वर्णित द्वितीय बौद्ध संगीति में केवल 'स्थविर' और 'महासांगिक' के बीच मतभेद उभरे थे, किंतु बौद्ध संघ का औपचारिक एवं स्थायी विभाजन (हीनयान और महायान के रूप में) चतुर्थ बौद्ध संगीति (कुंडलवन, कनिष्क के काल में) के दौरान हुआ था।
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