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History of India
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प्राचीन भारतीय इतिहास में बौद्ध धर्म और जैन धर्म के दार्शनिक सिद्धांतों तथा उनकी संस्थागत परंपराओं के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. बौद्ध धर्म के विपरीत, जैन धर्म ने आत्मा (जीव) के अस्तित्व को स्वीकार किया है और इसके अनुसार प्रत्येक वस्तु, यहाँ तक कि पत्थरों, पानी और पौधों में भी जीव का वास होता है, जबकि बुद्ध ने 'अनात्मवाद' (Anatta) का प्रतिपादन करते हुए किसी भी स्थायी शाश्वत आत्मा के अस्तित्व से इनकार किया था।
  2. 2. महावीर स्वामी द्वारा प्रतिपादित जैन धर्म के 'पंच महाव्रतों' में पार्श्वनाथ द्वारा जोड़े गए चार व्रतों (सत्य, अहिंसा, अस्तेय और अपरिग्रह) में पाँचवें व्रत के रूप में 'ब्रह्मचर्य' को स्वयं महावीर ने जोड़ा था।
  3. 3. बौद्ध संघ की सदस्यता ग्रहण करने के लिए न्यूनतम आयु सीमा 15 वर्ष निर्धारित की गई थी, और संघ में प्रवेश पाने के लिए किसी भी व्यक्ति को राजा या अपने ऋणदाताओं की अनुमति लेना अनिवार्य नहीं था।
  4. 4. जैन संघ में उपासकों के लिए त्रिरत्न (सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र) का मार्ग अनिवार्य माना गया है, और बौद्ध धर्म की तरह ही जैन धर्म ने भी वेदों की प्रामाणिकता तथा वर्ण व्यवस्था के जन्मगत विभाजन को पूरी तरह से स्वीकार किया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि बुद्ध ने 'अनात्मवाद' का सिद्धांत दिया जिसके अनुसार कोई शाश्वत आत्मा नहीं है, जबकि जैन धर्म 'जीव' (आत्मा) के अस्तित्व में दृढ़ विश्वास रखता है। कथन 2 सही है क्योंकि जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने चार महाव्रत दिए थे और महावीर स्वामी ने उसमें 'ब्रह्मचर्य' को पाँचवें व्रत के रूप में जोड़ा था। कथन 3 गलत है क्योंकि बौद्ध संघ में प्रवेश के लिए न्यूनतम आयु 15 वर्ष नहीं बल्कि 20 वर्ष थी, और यदि कोई व्यक्ति ऋणी, दास या राजा का सेवक था, तो उसे संघ में प्रवेश के लिए अनुमति लेनी पड़ती थी। कथन 4 गलत है क्योंकि जैन धर्म ने भी बौद्ध धर्म की तरह वेदों की प्रामाणिकता और जन्मगत वर्ण व्यवस्था को अस्वीकार किया था। इस विषय के विस्तृत अध्ययन के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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