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History of India
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प्राचीन भारतीय इतिहास के संदर्भ में बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म की दार्शनिक मान्यताओं और उनके संस्थागत विकास के निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. बौद्ध धर्म के मध्यम प्रतिपदा (अष्टांगिक मार्ग) और जैन धर्म के स्याद्वाद (अनेकांतवाद) दोनों ने ही वेदों की प्रामाणिकता और वैदिक यज्ञों की अनिवार्यता को सैद्धांतिक रूप से स्वीकार किया था, हालांकि दोनों ने कठोर तपस्या की मात्रा में अंतर रखा।
- 2. जैन धर्म में मोक्ष प्राप्ति के लिए शरीर का अंत करना या संथारा (संलेखना) पद्धति द्वारा प्राण त्यागना एक स्वीकृत विधि रही है, जबकि बौद्ध धर्म में अतिवादी कायाक्लेश या कठोर आत्म-पीड़न (शरीर को कष्ट देना) का पूर्ण निषेध किया गया है।
- 3. बौद्ध संघ की सदस्यता के लिए वर्ण व्यवस्था या जाति का कोई बंधन नहीं था, और संघ में प्रवेश के उपरांत सभी भिक्षु संघ के अनुशासन के अधीन हो जाते थे, जबकि जैन संघ में प्रारंभिक काल से ही केवल क्षत्रिय वर्ण के पुरुषों और महिलाओं को ही दीक्षा प्राप्त करने का अधिकार था।
- 4. जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने चातुर्याम धर्म (जो पार्श्वनाथ द्वारा प्रतिपादित था) में 'ब्रह्मचर्य' नामक पाँचवें महाव्रत को जोड़ा था, तथा बौद्ध धर्म के प्रथम तीन बौद्ध संगीतियों के दौरान हीनयान और महायान संप्रदायों का औपचारिक विभाजन हो चुका था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है क्योंकि बौद्ध और जैन दोनों ही धर्म नास्तिक (अनश्वरवादी) दर्शन हैं जो वेदों की प्रामाणिकता और यज्ञों की अनिवार्यता को सिरे से खारिज करते हैं। कथन 2 सही है क्योंकि जैन धर्म में संलेखना या संथारा उपवास के माध्यम से प्राण त्यागने की एक संप्रभु और आध्यात्मिक परंपरा है, जबकि गौतम बुद्ध ने मध्य मार्ग अपनाते हुए अत्यधिक शारीरिक तपस्या का खंडन किया था। कथन 3 गलत है क्योंकि जैन संघ में भी सभी वर्णों और जातियों के लोगों के लिए प्रवेश खुला था, केवल कुछ सामाजिक वर्जनाएं थीं। कथन 4 गलत है क्योंकि हीनयान और महायान का औपचारिक विभाजन चतुर्थ बौद्ध संगीति (कुंडलवन, कश्मीर) के दौरान कनिष्क के शासनकाल में हुआ था, न कि प्रथम तीन संगीतियों में। जैन धर्म और बौद्ध धर्म के ऐतिहासिक विकास के बारे में अधिक जानने के लिए विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के उदय और प्रसार के पीछे उत्तरदायी राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक कारणों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राजनीतिक कारणों के अंतर्गत लॉर्ड डलहौजी की 'व्यपगत का सिद्धांत' (Doctrine of Lapse) और लॉर्ड कैनिंग द्वारा मुगल सम्राटों के शाही उपाधियों और लाल किले के आवास को समाप्त करने की घोषणा ने भारतीय शासकों और राजपरिवारों में गहरा असंतोष पैदा किया।
2. आर्थिक रूप से, अंग्रेजों की मुक्त व्यापार नीति और पारंपरिक हस्तशिल्प उद्योगों के पतन ने भारतीय अर्थव्यवस्था को पूरी तरह झकझोर दिया, जबकि भू-राजस्व की भारी माँग और ऋणग्रस्तता के कारण किसान और ज़मींदार दोनों बुरी तरह प्रभावित हुए।
3. सामाजिक और धार्मिक कारणों में वर्ष 1850 के 'धार्मिक निर्योग्यता अधिनियम' (Religious Disabilities Act) ने ईसाई धर्म अपनाने वाले व्यक्ति को पैतृक संपत्ति से वंचित करने के नियम को बदल दिया, जिसे भारतीयों ने ईसाईकरण का षड्यंत्र माना।
4. सेना के स्तर पर धार्मिक और सांस्कृतिक असंतोष का मुख्य कारण वर्ष 1856 का 'सामान्य सेवा Enlistment Act' था, जिसके तहत भारतीय सैनिकों को समुद्र पार विदेशों में भी सेवा देने के लिए बाध्य किया गया, जिसे तत्कालीन रूढ़िवादी भारतीय समाज में धर्म भ्रष्ट होने का प्रतीक माना गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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मुगल काल में "कनकुत" (Kankut) विधि का अर्थ क्या था?
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औरंगजेब की धार्मिक कट्टरता के कारण उसके किस पुत्र ने राजपूतों के साथ मिलकर विद्रोह किया था?
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मुगल काल में "खुलासत-उत-तवारीख" के लेखक कौन हैं?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान फैजाबाद, बरेली और इलाहाबाद में विद्रोह के दमन तथा उसके नेतृत्वकर्ताओं के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. फैजाबाद में विद्रोह का नेतृत्व मौलवी अहमदullah शाह ने किया था, जिन्हें 'फैजाबाद का डंका शाह' भी कहा जाता था, और इस क्षेत्र में ब्रिटिश सेना के जनरल कैंपबेल तथा बाद में कर्नल मैकडॉवेल ने अत्यधिक संघर्ष के बाद इस विद्रोह को कुचला था।
2. रोहिलखंड क्षेत्र के बरेली में विद्रोह का नेतृत्व खान बहादुर खान ने किया था, जिन्होंने अपने आपको रोहिलखंड का नवाब घोषित कर प्रशासनिक व्यवस्था संभाली थी, और बाद में ब्रिटिश जनरल कैंपबेल ने कड़े संघर्ष के बाद बरेली पर पुन: अधिकार कर खान बहादुर खान को फांसी दे दी थी।
3. इलाहाबाद (प्रयागराज) और बनारस में हुए विद्रोह का दमन ब्रिटिश सेनापति कर्नल नील (James Neil) द्वारा अत्यधिक क्रूरता के साथ किया गया था, जहाँ इलाहाबाद में मौलवी लियाकत अली ने विद्रोह का सफल नेतृत्व किया था।
4. मौलवी लियाकत अली को इलाहाबाद में पराजित होने के बाद ब्रिटिश सेना द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया था और उन्हें तुरंत फांसी की सजा दे दी गई थी, जिससे इस क्षेत्र में विद्रोह का पूरी तरह अंत हो गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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