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History of India
Asked 2 months ago · Viewed 15 times

भक्ति और सूफी आंदोलन की विभिन्न धाराओं, उनके दार्शनिक सिद्धांतों और प्रमुख संतों के योगदान के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संत ज्ञानेश्वर (ज्ञानदेव) ने मराठी भाषा में 'भावार्थदीपिका' (ज्ञानेश्वरी) की रचना की, जो भगवद्गीता पर एक अत्यंत प्रसिद्ध और दार्शनिक टीका है, तथा उन्होंने महाराष्ट्र के 'वारकरी संप्रदाय' को मुख्यधारा की धार्मिक चेतना से जोड़ा था।
  2. 2. सूफी संत शेख शहाबुद्दीन सुहरावर्दी द्वारा स्थापित 'सुहरावर्दी सिलसिला' ने राजकीय सत्ता और सुल्तानों के दरबार से पूर्ण दूरी बनाए रखने की नीति का कठोरता से पालन किया था, और इसके संतों ने कभी भी राज्य से किसी प्रकार की जागीर या वित्तीय सहायता स्वीकार नहीं की।
  3. 3. वल्लभाचार्य ने 'शुद्धद्वैत वेदांत' के दर्शन का प्रतिपादन किया और कृष्ण भक्ति के 'पुष्टिमार्ग' की स्थापना की, जिसके अनुसार ब्रह्म और जगत में कोई भेद नहीं है, बल्कि जगत ब्रह्म का ही शुद्ध और वास्तविक रूप है।
  4. 4. सूफी मत के अंतर्गत 'बेशरा' वे संत थे जो इस्लामिक शरीयत (कानून) के नियमों और आदेशों से बंधे नहीं थे और अपनी स्वतंत्र आध्यात्मिक अवस्था में जीवन व्यतीत करते थे, जबकि 'बाशरा' वे संत थे जो शरीयत के कानूनों का कठोरता से पालन करते थे।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

भक्ति और सूफी आंदोलन भारतीय इतिहास के मध्यकाल के अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक आंदोलन थे। इस प्रश्न के संदर्भ में: कथन 1 सही है क्योंकि संत ज्ञानेश्वर (ज्ञानदेव) ने वारकरी संप्रदाय से संबंधित रहते हुए मराठी में 'ज्ञानेश्वरी' की रचना की। कथन 2 गलत है क्योंकि सुहरावर्दी सिलसिले के संतों ने चिश्ती संतों के विपरीत राजकीय सत्ता और शाही दरबार के साथ घनिष्ठ संबंध रखे तथा सुल्तानों से जागीरें एवं वित्तीय सहायता स्वीकार की थी (राज्य से दूरी बनाए रखने की कठोर नीति चिश्ती संतों की विशेषता थी)। कथन 3 सही है, वल्लभाचार्य ने शुद्धद्वैत वेदांत का प्रतिपादन किया और पुष्टिमार्ग के माध्यम से कृष्ण भक्ति का प्रचार किया। कथन 4 सही है, बेशरा संत शरीयत के नियमों से मुक्त थे (जिन्हें मस्तों या कलंदर भी कहा जाता था) जबकि बाशरा संत शरीयत का पालन करते थे। विस्तृत अध्ययन के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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