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History of India
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मध्यकालीन भारत के इतिहास में 'भक्ति और सूफी आंदोलन' के दार्शनिक स्वरूप और उनके प्रमुख विचारकों के योगदान के संदर्भ में निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:

  1. 1. शंकराचार्य - अद्वैत वेदांत (ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः)
  2. 2. रामानुज - विशिष्टाद्वैतवाद (परमात्मा और जीव दोनों वास्तविक हैं, किंतु जीव परमात्मा का ही एक अंश है)
  3. 3. माधवाचार्य - द्वैताद्वैतवाद (जीव और ईश्वर न तो पूर्णतः भिन्न हैं और न ही पूर्णतः एक हैं)
  4. 4.

वल्लभाचार्य - शुद्धाद्वैतवाद (ब्रह्म और जगत में पूर्ण एकता है, जगत ब्रह्म की ही वास्तविक अभिव्यक्ति है माया का परिणाम नहीं) उपर्युक्त युग्मों में से कौन-से युग्म सही सुमेलित हैं?

Detailed Explanation

मध्यकालीन भारत के भक्ति आंदोलन में विभिन्न आचार्यों द्वारा अलग-अलग दार्शनिक सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया था। पहला युग्म सही है क्योंकि आदि शंकराचार्य ने 'अद्वैत वेदांत' का प्रतिपादन किया, जिसके अनुसार ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है और यह संसार मिथ्या है। दूसरा युग्म सही है क्योंकि रामानुजाचार्य ने 'विशिष्टाद्वैतवाद' का सिद्धांत दिया, जिसके अनुसार ईश्वर (ब्रह्म) और आत्मा (जीव) दोनों सत्य हैं। तीसरा युग्म गलत है क्योंकि माधवाचार्य ने 'द्वैतवाद' (Dualism) का प्रतिपादन किया था, जबकि 'द्वैताद्वैतवाद' का प्रतिपादन निंबार्काचार्य द्वारा किया गया था। चौथा युग्म सही है क्योंकि वल्लभाचार्य ने 'शुद्धाद्वैतवाद' की स्थापना की, जिसके अनुसार यह जगत माया की देन नहीं बल्कि स्वयं ब्रह्म का ही शुद्ध रूप और वास्तविक अभिव्यक्ति है। इस विषय की विस्तृत जानकारी के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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