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History of India
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उन्नीसवीं शताब्दी के सुधार आंदोलनों के दौरान स्थापित विभिन्न संगठनों और उनके संस्थापकों के संदर्भ में निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
- 1. तत्त्वबोधिनी सभा - देवेंद्रनाथ टैगोर
- 2. आत्माराम पांडुरंग - प्रार्थना समाज
- 3. सत्यशोधक समाज - ज्योतिराव फुले
- 4.
सर्वेंट ऑफ इंडिया सोसाइटी - गोपाल कृष्ण गोखले उपर्युक्त युग्मों में से कौन-से सही सुमेलित हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
उपर्युक्त सभी युग्म सही सुमेलित हैं। देवेंद्रनाथ टैगोर ने 1839 में 'तत्त्वबोधिनी सभा' की स्थापना की थी जिसका उद्देश्य उपनिषदों के विचारों का प्रचार करना था। आत्माराम पांडुरंग ने 1867 में महाराष्ट्र में 'प्रार्थना समाज' की स्थापना की। ज्योतिराव फुले ने 1873 में 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की जो शोषित जातियों के उत्थान के लिए समर्पित था। गोपाल कृष्ण गोखले ने 1905 में 'सर्वेंट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी' (भारत सेवक समाज) की स्थापना की थी। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान बिहार में स्वतंत्रता संग्राम के दो प्रमुख स्तंभों—वीर कुंवर सिंह और उनके छोटे भाई अमर सिंह—के नेतृत्व, सैन्य रणनीतियों और संघर्ष के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. जगदीशपुर के 80 वर्षीय जमींदार वीर कुंवर सिंह ने जुलाई 1857 में दानापुर के विद्रोही सिपाहियों के साथ मिलकर आरा पर अधिकार कर लिया था, और ब्रिटिश सेनापति मेजर विन्सेंट आयर के विरुद्ध 'बिहिया के जंगल' और 'जगदीशपुर के युद्ध' में अद्वितीय सैन्य कौशल का परिचय दिया था।
2. वीर कुंवर सिंह ने अंग्रेजों को चकमा देने के लिए अपनी सेना के साथ गंगा नदी पार करते समय ब्रिटिश गोलियों से घायल होने के कारण अपने हाथ को स्वयं काटकर गंगा में अर्पित कर दिया था, और अंततः अप्रैल 1858 में अपनी रियासत जगदीशपुर को अंग्रेजों से मुक्त कराकर वहाँ पुनः विजय पताका फहराई थी।
3. वीर कुंवर सिंह की मृत्यु के बाद उनके भाई अमर सिंह ने कैमूर की पहाड़ियों (जुड़ी पहाड़ियों) से अंग्रेजों के खिलाफ लंबे समय तक 'छापामार युद्ध' (Guerrilla Warfare) जारी रखा और शाहबाद क्षेत्र में एक समानांतर सरकार चलाकर ब्रिटिश सत्ता को गहरी चुनौती दी थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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मुगलकालीन प्रशासनिक और सैन्य व्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अकबर के शासनकाल में 'मंसबदारी प्रणाली' की शुरुआत की गई थी, जिसमें मीर बख्शी का विभाग मंसबदारों के वेतन और उनकी सैनिक टुकड़ियों के निरीक्षण के लिए उत्तरदायी था, किंतु 'जात' और 'सवार' पदों का स्पष्ट विभाजन सर्वप्रथम जहांगीर के शासनकाल में 'दो-अस्पा सिह-अस्पा' प्रणाली के माध्यम से किया गया था।
2. शाहजहां के शासनकाल में स्थापित 'चहारबाग' शैली और वास्तुकला में संगमरमर के प्रयोग के साथ-साथ मनसबदारी व्यवस्था में 'माहवार' (मासिक वेतन) पैमाने को लागू किया गया, जिसके अंतर्गत मनसबदारों को वर्ष के महीनों के आधार पर जागीर से आय प्राप्त होती थी।
3. औरंगजेब के शासनकाल में मराठा सरदारों और दक्षिण के शासकों को अपने पक्ष में मिलाने के लिए मनसबदारी व्यवस्था में 'दक्खिनी' (Deccani) अमीरों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि की गई, जिसके परिणामस्वरूप 'जागीरों का संकट' (Crisis of Jagirs) और तीव्र प्रशासनिक गतिरोध उत्पन्न हो गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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ब्रिटिश भारत में लागू की गई विभिन्न भू-राजस्व व्यवस्थाओं—स्थाई बंदोबस्त (Permanent Settlement), रयतवारी (Ryotwari) और महालवारी (Mahalwari) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. स्थाई बंदोबस्त प्रणाली को वर्ष 1793 में बंगाल, बिहार और उड़ीसा में लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा लागू किया गया था, जिसके अंतर्गत जमींदारों को भूमि का वास्तविक स्वामी मान लिया गया और सरकार ने भू-राजस्व की राशि को स्थायी रूप से निश्चित कर दिया, जिससे कंपनी की आय तो सुरक्षित हो गई किंतु पारंपरिक रूप से कृषि विकास में रुचि रखने वाले किसानों की स्थिति दयनीय हो गई।
2. थॉमस मुनरो और कैप्टन रीड द्वारा मुख्य रूप से मद्रास और बॉम्बे प्रेसीडेंसी में लागू की गई रयतवारी व्यवस्था में सरकार और काश्तकार (रयत) के बीच सीधा संपर्क स्थापित किया गया, जिसके तहत भूमि की पैमाइश कराकर व्यक्तिगत किसानों को भू-राजस्व भुगतान के लिए सीधे उत्तरदायी बनाया गया, हालांकि इसमें कर की दरें अत्यधिक थीं और बार-बार पुनरीक्षण का प्रावधान था।
3. हॉल्ट मैकेंज़ी द्वारा परिकल्पित और विलियम बेंटिंक के काल में (वर्ष 1833 के रेगुलेशन VII के माध्यम से) उत्तर-पश्चिम प्रांत, मध्य भारत और पंजाब के कुछ हिस्सों में लागू की गई महालवारी व्यवस्था में भू-राजस्व का निर्धारण व्यक्तिगत रूप से प्रत्येक कृषक पर न करके संपूर्ण ग्राम समुदाय या 'महाल' (गाँव या गाँवों के समूह) के साथ सामूहिक रूप से किया जाता था, जिसमें गाँव का कोई प्रधान या लंबरदार राजस्व एकत्र करने के लिए उत्तरदायी होता था।
4. इन तीनों भू-राजस्व प्रणालियों का दीर्घकालिक परिणाम यह हुआ कि भारत का पारंपरिक ग्रामीण स्वशासन और कृषि ढांचा पूरी तरह चरमरा गया, वाणिज्यिक फसलों के उत्पादन को बल मिला जिससे खाद्यान्न की कमी हुई, और ग्रामीण क्षेत्र बड़े पैमाने पर साहूकारों और महाजनों के चंगुल में फंस गए।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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अकबर के काल में "मुस्तौफी" का क्या पद था?
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