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History of India
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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना और नरम दल-गरम दल काल के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. कांग्रेस के प्रारंभिक वर्षों (1885-1905) में नरमपंथियों की कार्यपद्धति 'प्रार्थना, याचिका और विरोध' (Prayer, Petition and Protest) की नीति पर आधारित थी, और उन्होंने वर्ष 1892 के भारतीय परिषद अधिनियम (Indian Councils Act 1892) को अपनी पहली बड़ी वैधानिक सफलता माना था, हालांकि वे इसके सीमित दायरे से पूर्णतः संतुष्ट नहीं थे।
  2. 2. वर्ष 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस के विभाजन के पीछे मुख्य वैधानिक और वैचारिक मतभेद यह था कि गरम दल (लाल-बाल-पाल) स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन को केवल बंगाल तक सीमित रखना चाहते थे, जबकि नरम दल इसे पूरे देश में लागू करने के पक्षधर थे।
  3. 3. वर्ष 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में कांग्रेस ने पहली बार 'स्वराज' (Self-Government) को अपने राजनीतिक लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया, जिसे नरमपंथियों और चरमपंथियों के बीच एक अस्थायी समझौते के रूप में देखा गया था।
  4. 4. ब्रिटिश सरकार ने उग्रवादी राष्ट्रवादी आंदोलन को कुचलने के लिए वर्ष 1908 में 'विस्फोटक पदार्थ अधिनियम' (Explosive Substances Act) और 'समाचार पत्र (अपराधों के लिए प्रोत्साहन) अधिनियम' जैसे दमनकारी कानून पारित किए, जिसके तहत बाल गंगाधर तिलक को राजद्रोह के आरोप में छह वर्ष की कैद की सजा देकर मांडले (बर्मा) जेल भेज दिया गया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि नरमपंथियों की कार्यप्रणाली मुख्य रूप से ब्रिटिश न्यायप्रियता में विश्वास और 'प्रार्थना, याचिका तथा विरोध' पर आधारित थी, और उन्होंने 1892 के अधिनियम को एक शुरुआती उपलब्धि माना था। कथन 2 गलत है क्योंकि इसके विपरीत गरम दल पूरे देश में स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन का विस्तार चाहते थे, जबकि नरमपंथियों का एक वर्ग इसे केवल बंगाल तक ही सीमित रखना चाहता था। कथन 3 सही है, 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी के अध्यक्षीय भाषण में पहली बार 'स्वराज' शब्द का आधिकारिक मंच से प्रयोग किया गया। कथन 4 सही है, 1908 में बाल गंगाधर तिलक को 'केसरी' में प्रकाशित लेखों के आधार पर राजद्रोह का दोषी ठहराया गया और उन्हें मांडले जेल भेजा गया। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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→ वर्ष 1857 के विद्रोह की असफलता और इसके नेतृत्व की कमियों तथा अन्य कारणों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. विद्रोहियों के पास न तो कोई केंद्रीयकृत उच्च कमान (Centralized High Command) था और न ही कोई सुनियोजित अखिल भारतीय राजनीतिक व सैन्य रणनीति; विभिन्न क्षेत्रों के नेतृत्वकर्ताओं ने मुख्य रूप से अपने स्थानीय और क्षेत्रीय हितों व अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष किया। 2. ब्रिटिश सेना के पास आधुनिक संचार साधनों जैसे टेलीग्राफ और तीव्र रेल परिवहन का निर्णायक लाभ था, जबकि विद्रोहियों के पास सैनिक अनुशासन, आधुनिक हथियारों और गुप्त सूचनाओं के आदान-प्रदान की व्यवस्था का पूर्ण अभाव था। 3. भारत के अधिकांश बड़े देसी रियासतें (जैसे हैदराबाद, ग्वालियर, इंदौर और भोपाल के शासक) तथा शिक्षित मध्यम वर्ग व व्यापारी वर्ग या तो तटस्थ रहे या उन्होंने अंग्रेजों का सक्रिय रूप से समर्थन किया, जिससे विद्रोह अखिल भारतीय जन-आंदोलन का रूप नहीं ले सका। 4. मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को विद्रोहियों द्वारा भारत का सम्राट घोषित किए जाने के बाद उनके पास विशाल सैन्य संसाधन और अत्याधुनिक तोपखाने उपलब्ध थे, जिनकी सहायता से उन्होंने अंग्रेजों को दिल्ली से खदेड़ दिया था। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? → सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34), गोलमेज सम्मेलनों और गांधी-इरविन समझौते के ऐतिहासिक घटनाक्रम के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन (1929) में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित होने के पश्चात महात्मा गांधी ने 31 जनवरी 1930 को वायसराय लॉर्ड इरविन के समक्ष अपनी प्रसिद्ध '11 सूत्री मांगें' रखीं, जिनमें नमक कर की समाप्ति, लग्जूरियस विदेशी कपड़ों पर भारी शुल्क और राजनीतिक बंदियों की रिहाई प्रमुख थीं। 2. दांडी मार्च (12 मार्च 1930 से 6 अप्रैल 1930) के उपरांत सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत हुई, जिसके दौरान उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत में खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में 'खुदाई खिदमतगार' (लाल कुर्ती दल) संगठन ने इस आंदोलन को अहिंसक तरीके से आगे बढ़ाया। 3. प्रथम गोलमेज सम्मेलन (नवंबर 1930 - जनवरी 1931) में कांग्रेस ने आधिकारिक रूप से भाग लिया था, जिसके परिणामस्वरुप महात्मा गांधी और लॉर्ड इरविन के बीच 5 मार्च 1931 को एक समझौता हुआ, जिसे 'दिल्ली समझौता' या गांधी-इरविन पैक्ट कहा गया। 4. कराची कांग्रेस अधिवेशन (मार्च 1931) में गांधी-इरविन समझौते का अनुमोदन किया गया और इसी अधिवेशन में पहली बार कांग्रेस ने 'मौलिक अधिकार और राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम' से संबंधित प्रस्ताव को स्वीकार किया, जिसकी अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल ने की थी। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? → ब्रिटिश भारत में लागू की गई विभिन्न भू-राजस्व प्रणालियों (स्थाई बंदोबस्त, रयतवारी और महालवारी) और उनके आर्थिक प्रभावों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. बंगाल, बिहार और उड़ीसा में वर्ष 1793 में लॉर्ड कार्नवालिस द्वारा लागू किए गए 'स्थाई बंदोबस्त' (इस्तमरारी बंदोबस्त) के तहत भूमि का स्वामित्व जमींदारों को सौंप दिया गया, जिससे कंपनी का राजस्व तो निश्चित हो गया, किंतु कृषि सुधारों के प्रति जमींदारों की कोई रुचि नहीं होने के कारण कृषक वर्ग अत्यधिक शोषित हुआ। 2. थॉमस मुनरो और कैप्टन रीड द्वारा मुख्य रूप से मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसी में लागू की गई 'रयतवारी व्यवस्था' में सरकार और किसान (रयत) के बीच सीधा समझौता होता था, जिसमें राजस्व का निर्धारण भूमि की उर्वरता के आधार पर होता था और किसानों को स्वामित्व अधिकार मिलने के कारण वे महाजनों के शिकंजे से पूरी तरह सुरक्षित रहे। 3. उत्तर-पश्चिम प्रांत, मध्य भारत और पंजाब के कुछ हिस्सों में लागू 'महालवारी व्यवस्था' के अंतर्गत भू-राजस्व का निर्धारण व्यक्तिगत किसान के स्तर पर न करके संपूर्ण ग्राम या 'महाल' (गाँव के समूह) के स्तर पर किया जाता था, और राजस्व भुगतान की सामूहिक जिम्मेदारी पूरे ग्राम समुदाय की होती थी। 4. इन सभी भू-राजस्व प्रणालियों के दीर्घकालिक परिणामस्वरूप भारतीय कृषि का तेजी से वाणिज्यीकरण (Commercialisation of Agriculture) हुआ, जिससे खाद्यान्न फसलों के स्थान पर नील, कपास और अफीम जैसी नकदी फसलों के उत्पादन को बल मिला और ग्रामीण अर्थव्यवस्था औपनिवेशिक हितों की पूरक बन गई। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? → वैदिक सभ्यता और वैदिक साहित्य के विभिन्न पक्षों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. ऋग्वैदिक काल में 'दुहितृ' (Duhitri) शब्द का प्रयोग उस पुत्री के लिए किया जाता था जो गाय का दूध दूहती थी, और इस समाज में राजा को 'गोपा जनाशः' (जनता का रक्षक) कहा जाता था। 2. उत्तर वैदिक काल में सभा और समिति नामक राजनीतिक संस्थाओं का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया था, और राजा की निरंकुशता पर अंकुश लगाने में इन दोनों सभाओं की भूमिका ऋग्वैदिक काल की तुलना में और अधिक शक्तिशाली हो गई थी। 3. शतपथ ब्राह्मण में कृषि की चारों क्रियाओं — जुताई, बुवाई, कटाई और मड़ाई — का विस्तृत वर्णन मिलता है, तथा इसमें विदेह माधव की कथा का भी उल्लेख है जिसमें गंडक (सदानिरा) नदी तक आर्यों के पूर्व की ओर विस्तार का वर्णन है। 4. वैदिक साहित्य के अंतर्गत 'अरण्यक' उन दार्शनिक ग्रंथों को कहा जाता है जिन्हें जंगलों में पढ़ा जाता था और जो मुख्यतः यज्ञों के बाह्य कर्मकांडों के स्थान पर उनके रहस्यवादी व दार्शनिक पक्षों की व्याख्या करते हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? → मुगल काल में "खुलासत-उत-तवारीख" के लेखक कौन हैं? → महाभारत का फारसी अनुवाद "रज़्मनामा" किसके निर्देशन में किया गया था?
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