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History of India
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मुगलकालीन प्रशासनिक व्यवस्था, मनसबदारी प्रणाली और उसकी विशेषताओं के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. मनसबदारी व्यवस्था को औपचारिक रूप से अकबर द्वारा वर्ष 1595-96 में शुरू किया गया था, जिसमें प्रत्येक मनसबदार को 'जात' और 'सवार' पद प्रदान किए जाते थे जहाँ 'जात' उसके व्यक्तिगत दर्जे और वेतन को इंगित करता था तथा 'सवार' उसके द्वारा रखे जाने वाले घुड़सवार सैनिकों की संख्या को निर्धारित करता था।
- 2. जहांगीर के शासनकाल में मनसबदारी प्रणाली के अंतर्गत 'दो-अस्पा और सिह-अस्पा' (Do-aspa and Sih-aspa) की नवीन व्यवस्था जोड़ी गई, जिसके तहत चयनित मनसबदारों को बिना अपने 'जात' पद को बढ़ाए अतिरिक्त घुड़सवार सैनिक रखने की अनुमति दी जाती थी।
- 3. शाहजहां के शासनकाल के दौरान मनसबदारी प्रणाली में 'माहवार' (Month-scale) प्रणाली की शुरुआत की गई, जिसके अंतर्गत यदि जागीर से प्राप्त होने वाला राजस्व पूरे बारह महीने के खर्च के बराबर होता था, तो उसे 'बारहमाहा' कहा जाता था, और आय घटने पर आनुपातिक रूप से वेतन घटा दिया जाता था।
- 4. औरंगजेब के शासनकाल में मनसबदारों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि होने के कारण 'जागीर संकट' (Crisis of Jagirs) उत्पन्न हो गया, क्योंकि उपलब्ध खाली जागीरें (पाइवली भूमि) मनसबदारों की तुलना में बहुत कम थीं, जिसके कारण सम्राट ने 'मशरूत' (सशर्त) पदों की व्यवस्था समाप्त कर दी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
मुगल साम्राज्य में मनसबदारी प्रणाली एक अनूठी सैन्य एवं प्रशासनिक व्यवस्था थी। कथन 1, 2 और 3 पूर्णतः सत्य हैं क्योंकि अकबर ने इस व्यवस्था को संगठित किया, जहांगीर ने 'दो-अस्पा और सिह-अस्पा' प्रणाली जोड़ी और शाहजहां ने 'माहवार' प्रणाली लागू की। किंतु कथन 4 असत्य है क्योंकि औरंगजेब के शासनकाल में जागीर संकट से निपटने के लिए ही 'मशरूत' (सशर्त पद) जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ावा दिया गया था, न कि समाप्त किया गया था। इस प्रणाली के विस्तृत अध्ययन के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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1857 के महान विद्रोह के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक कारणों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राजनीतिक कारणों के अंतर्गत डलहौजी की 'व्यपगत का सिद्धांत' (Doctrine of Lapse) नीति के तहत सतारा, नागपुर और झाँसी का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय किया गया था, तथा मुगल सम्राट के साथ होने वाले शाही बर्ताव और पदवी को समाप्त करने के लॉर्ड डलहौजी और लॉर्ड कैनिंग के निर्णयों ने भारतीय जनमानस में गहरी असुरक्षा और आक्रोश पैदा कर दिया था।
2. सामाजिक और धार्मिक कारणों में वर्ष 1850 में पारित 'धार्मिक अयोग्यता अधिनियम' (Religious Disabilities Act) था, जिसके माध्यम से यह प्रावधान किया गया कि ईसाई धर्म अपनाने वाले व्यक्ति को अपने पैतृक संपत्ति के उत्तराधिकार से वंचित नहीं किया जाएगा, जिसे रूढ़िवादी भारतीयों ने ईसाईकरण का षड्यंत्र माना।
3. आर्थिक कारणों में अंग्रेजों की भू-राजस्व नीतियां—जैसे रैयतवाड़ी और महालवाड़ी व्यवस्था—थीं, जिनके कारण पारंपरिक ग्रामीण अर्थव्यवस्था का विघटन हुआ, कृषक वर्ग अत्यधिक कर्ज के बोझ तले दब गया और विलासिता की वस्तुओं के आयात तथा भारतीय हस्तशिल्प व कपड़ा उद्योग के विनाश ने कारीगरों को बेरोजगार कर दिया।
4. विद्रोह के तत्काल पूर्व सैनिकों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले सामाजिक-धार्मिक कारणों में वर्ष 1856 का 'सामान्य सेना सेवा अधिनियम' (General Service Enlistment Act) भी शामिल था, जिसके तहत बंगाल सेना के नए रंगरूटों के लिए आवश्यकता पड़ने पर समुद्र पार (विदेशों में) जाकर सेवा देना अनिवार्य कर दिया गया था, जिसे उस समय समाज में समुद्र पार जाना धर्म भ्रष्ट होना माना जाता था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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महात्मा गांधी के भारत आगमन और उनके शुरुआती तीन प्रमुख सत्याग्रहों (चंपारण, खेड़ा और असहयोग आंदोलन) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वर्ष 1917 के चंपारण सत्याग्रह के दौरान राजकुमार शुक्ल के निमंत्रण पर गांधीजी ने बिहार के चंपारण का दौरा किया था, जहाँ यूरोपीय नील बागान मालिकों द्वारा अपनाई जाने वाली 'तीनकठिया पद्धति' के विरोध में किसानों को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष किया गया, और इसी आंदोलन की सफलता से प्रभावित होकर रविन्द्रनाथ टैगोर ने गांधीजी को 'महात्मा' की उपाधि दी थी।
2. वर्ष 1918 के खेड़ा सत्याग्रह के दौरान, फसल बर्बाद हो जाने और लगान माफी के नियमों का पालन न होने पर गांधीजी ने किसानों का नेतृत्व किया और वल्लभभाई पटेल व इंदुलाल याज्ञिक के सहयोग से सरकार को यह आश्वासन देने के लिए विवश किया कि सक्षम किसान ही लगान देंगे तथा गरीब किसानों का लगान माफ किया जाएगा।
3. वर्ष 1920 में प्रारंभ किए गए असहयोग आंदोलन के दौरान कलकत्ता के विशेष अधिवेशन (सितंबर 1920) में गांधीजी द्वारा प्रस्तुत असहयोग प्रस्ताव का सीआर दास (चित्तरंजन दास) ने पुरजोर समर्थन किया था, जबकि नागपुर अधिवेशन (दिसंबर 1920) में इस प्रस्ताव की औपचारिक पुष्टि की गई।
4. चौरी-चौरा की घटना (5 फरवरी 1922) के उपरांत असहयोग आंदोलन को अचानक वापस लिए जाने के कारण भारतीय राजनीति में अत्यधिक निराशा फैली, जिसके परिणामस्वरुप चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस से अलग होकर 'स्वराज पार्टी' का गठन किया, जबकि गांधीजी को ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार कर छह वर्ष के साधारण कारावास की सजा सुनाई गई थी।
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