BaalVikas
Menu
History of India
Asked 2 months ago · Viewed 13 times

वर्ष 1857 के महान विद्रोह के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक कारणों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. लॉर्ड डलहौजी द्वारा लागू की गई 'व्यपगत सिद्धांत' (Doctrine of Lapse) नीति के तहत सतारा, नागपुर और झाँसी जैसी रियासतों का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर दिया गया था, जिससे भारतीय शासक वर्ग और उनके आश्रितों में गहरा राजनीतिक असंतोष व्याप्त हो गया था।
  2. 2. ब्रिटिश सरकार द्वारा वर्ष 1850 में पारित 'धार्मिक अयोग्यता अधिनियम' (Religious Disabilities Act) के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया कि हिंदू धर्म से ईसाई धर्म में परिवर्तित होने वाले व्यक्ति को अपने पैतृक संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा, जिसे रूढ़िवादी भारतीयों ने उनके धर्म और संस्कृति पर सीधा प्रहार माना।
  3. 3. भू-राजस्व की कठोर प्रणालियों (जैसे स्थायी बंदोबस्त, रयतवारी और महालवारी) के कारण पारंपरिक जमींदारों और कृषक वर्ग की आर्थिक स्थिति बदतर हो गई, तथा ब्रिटिश विनिर्मित सस्ते कपड़ों और वस्तुओं के आयात ने पारंपरिक भारतीय हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योगों को पूरी तरह तबाह कर दिया।
  4. 4. ब्रिटिश सेना में कार्यरत भारतीय सिपाहियों के साथ नस्लीय भेदभाव किया जाता था, उन्हें यूरोपीय सैनिकों की तुलना में अत्यंत कम वेतन दिया जाता था, तथा 'सामान्य सेवा प्रवर्तन अधिनियम' (General Service Enlistment Act, 1856) के तहत नए रंगरूटों के लिए समुद्र पार (Overseas) जाकर सेवा देना अनिवार्य कर दिया गया, जिसे सैनिकों ने अपनी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध समझा।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

वर्ष 1857 के महान विद्रोह के पीछे कोई एक तात्कालिक कारण नहीं था, बल्कि इसके मूल में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की लंबी अवधि की शोषणकारी नीतियां थीं। राजनीतिक कारणों में लॉर्ड डलहौजी की 'व्यपगत नीति' (Doctrine of Lapse) और अवध का कुशासन के आधार पर विलय शामिल था। सामाजिक और धार्मिक कारणों में सती प्रथा का अंत, विधवा पुनर्विवाह अधिनियम और 'धार्मिक अयोग्यता अधिनियम, 1850' (Religious Disabilities Act) प्रमुख थे, जिसने ईसाई धर्म अपनाने पर पैतृक संपत्ति का अधिकार सुरक्षित किया। आर्थिक मोर्चे पर, भू-राजस्व नीतियों ने किसानों को कर्ज के जाल में फंसा दिया और ब्रिटिश मशीन-निर्मित वस्तुओं ने भारतीय दस्तकारों को बेरोजगार कर दिया। इसके अतिरिक्त, सेना में नस्लीय भेदभाव और 'सामान्य सेवा प्रवर्तन अधिनियम' (General Service Enlistment Act) जैसे कारकों ने सैनिकों के मन में भारी असंतोष भर दिया था। इस महान संघर्ष के ऐतिहासिक घटनाक्रम को विस्तार से समझने के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
Share:
अगला प्रश्न → वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान लखनऊ और अवध क्षेत्र में हुए संघर्षों के… ← पिछला प्रश्न महात्मा गांधी के भारत आगमन के उपरांत उनके शुरुआती…

Related Questions

→ वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान बिहार के विभिन्न क्षेत्रों (पटना, दानापुर, आरा, मुजफ्फरपुर और छपरा) में हुए विद्रोह और उनके नेतृत्वकर्त्ताओं के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. पटना सिटी में 3 जुलाई 1857 को हुए विद्रोह का नेतृत्व एक पुस्तक विक्रेता पीर अली खान ने किया था, जिसे कमिश्नर विलियम टेलर के आदेश पर गिरफ्तार कर सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी गई थी। 2. दानापुर छावनी की 7वीं, 8वीं और 40वीं रेजिमेंट के सिपाहियों ने 25 जुलाई 1857 को विद्रोह कर दिया और सोन नदी पार कर आरा के बाबू कुंवर सिंह के साथ जा मिले। 3. मुजफ्फरपुर और छपरा क्षेत्रों में विद्रोहियों का नेतृत्व करने वाले स्थानीय जमींदार और राजा थे, जिनमें मुजफ्फरपुर में कमिश्नर टेलर के दमन के बावजूद सैनिकों ने अंग्रेजों को खदेड़ कर पूर्ण स्वतंत्र सरकार की स्थापना की थी। 4. आरा (जगदीशपुर) के बाबू कुंवर सिंह ने दानापुर से आए सैनिकों के साथ मिलकर ब्रिटिश सेना के विरुद्ध सफल छापामार युद्ध लड़ा और अंग्रेजों के विरुद्ध बिहार में इस महान विद्रोह के मुख्य प्रतीक बने। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? → वर्ष 1857 के महान विद्रोह के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक कारणों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. लॉर्ड डलहौजी द्वारा लागू की गई 'व्यपगत सिद्धांत' (Doctrine of Lapse) नीति के तहत सतारा, नागपुर और झाँसी जैसी रियासतों का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर दिया गया था, जिससे भारतीय शासक वर्ग और उनके आश्रितों में गहरा राजनीतिक असंतोष व्याप्त हो गया। 2. वर्ष 1850 में पारित 'धार्मिक अयोग्यता अधिनियम' (Religious Disabilities Act) द्वारा यह प्रावधान किया गया कि हिंदू धर्म से ईसाई धर्म में परिवर्तित होने वाले व्यक्ति को उसके पैतृक संपत्ति के अधिकार से वंचित नहीं किया जाएगा, जिसे रूढ़िवादी भारतीयों ने उनके धर्म और संस्कृति पर सीधा प्रहार माना। 3. ब्रिटिश आर्थिक नीतियों (विशेषकर मुक्त व्यापार और औद्योगिक क्रांति के प्रभाव) के परिणामस्वरूप भारत के पारंपरिक हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योगों का भारी पतन हुआ, जिससे कारीगर और शिल्पकार बेरोजगार हो गए और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर अत्यधिक दबाव बढ़ गया। 4. 1856 में लॉर्ड कैनिंग के शासनकाल में पारित 'सामान्य सेवा enlistment अधिनियम' (General Service Enlistment Act) के तहत भारतीय सैनिकों के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया कि आवश्यकता पड़ने पर उन्हें समुद्र पार बर्मा या अन्य विदेशी क्षेत्रों में भी सेवा देनी होगी, जिसे उस समय के धार्मिक विश्वासों के अनुसार जातिभ्रष्ट होने का कारण माना गया। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? → सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34), प्रथम गोलमेज सम्मेलन और गांधी-इरविन समझौते के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. कांग्रेस द्वारा प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930) के बहिष्कार के पश्चात ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाने के लिए मार्च 1931 में गांधी-इरविन समझौता हुआ, जिसके तहत सरकार ने सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा करना स्वीकार किया, किंतु हिंसा के आरोपियों और भगत सिंह तथा उनके साथियों के मृत्युदंड को इस समझौते से बाहर रखा गया। 2. कराची अधिवेशन (1931) में, जिसकी अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल ने की थी, गांधी-इरविन समझौते का समर्थन किया गया और इसी अधिवेशन में पहली बार कांग्रेस ने 'मौलिक अधिकार और राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम' पर अपने प्रस्ताव को पारित किया। 3. लन्दन में आयोजित द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) में महात्मा गांधी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एकमात्र आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया, किंतु सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व और दलितों के लिए पृथक निर्वाचन के मुद्दे पर मतभेदों के कारण यह सम्मेलन असफल घोषित कर दिया गया। 4. द्वितीय गोलमेज सम्मेलन की असफलता के उपरांत भारत लौटने पर गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन के दूसरे चरण को तुरंत पुनः प्रारंभ किया, जिसे ब्रिटिश सरकार ने दबाने के लिए आपातकालीन अध्यादेशों का सहारा लिया और कांग्रेस संगठन को गैरकानूनी घोषित कर दिया। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? → वर्ष 1857 के महान विद्रोह के उपरांत ब्रिटिश संसद द्वारा पारित 'भारत सरकार अधिनियम, 1858' और 'क्वीन विक्टोरिया की घोषणा' (घोषणा पत्र) के वैधानिक और प्रशासनिक परिणामों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इस अधिनियम द्वारा भारत का शासन कंपनी के हाथों से सीधे ब्रिटिश ताज (Crown) के अधीन स्थानांतरित कर दिया गया, जिसके तहत 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' और 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स' को समाप्त कर उनके समस्त अधिकार 'भारत के राज्य सचिव' (Secretary of State for India) और उसकी सहायता के लिए गठित 15 सदस्यीय 'इंडिया काउंसिल' को सौंप दिए गए। 2. क्वीन विक्टोरिया की ऐतिहासिक घोषणा (जिसे इलाहाबाद दरबार में 1 नवंबर 1858 को लॉर्ड कैनिंग द्वारा पढ़ा गया) में यह आश्वासन दिया गया कि ब्रिटिश सरकार भारतीय रियासतें हड़पने की नीति ('व्यपगत सिद्धांत') का त्याग करती है, देशी राजाओं के दत्तक पुत्र लेने के अधिकार को मान्यता देती है और भविष्य में भारतीय भू-क्षेत्र का कोई विस्तार नहीं किया जाएगा। 3. इस घोषणा में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय प्रजा के धार्मिक मामलों में अहस्तक्षेप करने, प्राचीन परंपराओं का सम्मान करने तथा नस्ल, वर्ण या धर्म के भेदभाव के बिना योग्यता के आधार पर सार्वजनिक सेवाओं में भारतीयों को नियुक्त करने का खुला वादा किया। 4. विद्रोह के सफल दमन और प्रशासनिक नियंत्रण को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से ब्रिटिश सरकार ने भारतीय सेना में यूरोपीय सैनिकों का अनुपात काफी घटा दिया और बंगाल सेना में राजपूतों, ब्राह्मणों तथा अवध के सैनिकों की संख्या बढ़ाकर ब्रिटिश रेजिमेंटों को पूरी तरह समाप्त कर दिया। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? → मुगल काल में "खुलासत-उत-तवारीख" के लेखक कौन हैं? → महाभारत का फारसी अनुवाद "रज़्मनामा" किसके निर्देशन में किया गया था?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.