त्वरित लिंक्स
History of India
12 views
वर्ष 1857 के महान विद्रोह की असफलता और इसके नेतृत्व की कमियों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. विद्रोही नेतृत्व के पास औपनिवेशिक शासन के पतन के उपरांत देश में एक वैकल्पिक आधुनिक राजनीतिक ढांचा या भविष्य की शासन प्रणाली का कोई सुसंगत विजन नहीं था, और वे केवल पुरानी सामंती व्यवस्था को बहाल करना चाहते थे।
- 2. भारत के अधिकांश बड़े और संभ्रांत देसी रियासतों के शासक (जैसे सिंधिया, होलकर और हैदराबाद के निजाम), बड़े जमींदार तथा आधुनिक रूप से शिक्षित मध्यम वर्ग ने ब्रिटिश सत्ता के प्रति वफादारी दिखाते हुए विद्रोह का सक्रिय विरोध किया या उससे पूरी तरह दूरी बनाए रखी।
- 3. विद्रोही टुकड़ियों के बीच केंद्रीयकृत कमान, सुदृढ़ सैन्य समन्वय और पारस्परिकता का पूर्ण अभाव था; नाना साहब, तात्या टोपे और रानी लक्ष्मीबाई जैसे उत्कृष्ट स्थानीय नायक अपने-अपने क्षेत्रों में वीरता से तो लड़े, किंतु वे किसी साझा एकीकृत अखिल भारतीय रणनीति के तहत तालमेल बिठाने में असमर्थ रहे।
- 4. विद्रोहियों के पास अंग्रेजों की तरह आधुनिक तार (टेलीग्राफ), रेल नेटवर्क और सुदृढ़ नौसैनिक सहायता जैसी उन्नत सैन्य व संचार प्रणालियाँ थीं, जिसके कारण वे ब्रिटिश सेना की गतिविधियों को मात देने में सफल रहे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
वर्ष 1857 का विद्रोह भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था, जो ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध एक बड़ा जन-आंदोलन बना, लेकिन अंततः यह असफल हो गया। इस असफलता के पीछे कई कारण और नेतृत्व की गंभीर कमियाँ थीं। विद्रोही नेताओं के पास अंग्रेजी साम्राज्य के पतन के बाद देश के लिए किसी आधुनिक राजनीतिक दृष्टिकोण या सुसंगत योजना का अभाव था। इसके अतिरिक्त, अधिकांश बड़े देसी नरेशों और जमींदारों ने अंग्रेजों का साथ दिया, जिससे विद्रोह को अखिल भारतीय स्वरूप मिलने में बाधा आई। इसके बारे में अधिक जानने के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं। कथन 4 गलत है क्योंकि विद्रोहियों के पास आधुनिक तार, रेल नेटवर्क या उन्नत संचार प्रणालियों का अभाव था; ये सभी सुविधाएँ अंग्रेजों के पास थीं, जिससे उन्हें सैन्य रणनीतिक बढ़त प्राप्त हुई।
Related Questions
→
वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान लखनऊ और अवध क्षेत्र में बेगम हजरत महल और मौलवी अहमदुल्लाह शाह की भूमिका तथा उनके संघर्ष के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अवध में विद्रोह के फूट पड़ने के उपरांत बेगम हजरत महल ने अपने अल्पवयस्क पुत्र बिरजिस कादिर को लखनऊ का नवाब घोषित किया और स्वयं राज्य की वास्तविक बागडोर संभालते हुए अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र प्रतिरोध का नेतृत्व किया।
2. फैजाबाद में विद्रोह का नेतृत्व करने वाले मौलवी अहमदुल्लाह शाह, जिन्हें 'डंका शाह' के नाम से भी जाना जाता था, ने अंग्रेजों के विरुद्ध जिहाद का आह्वान किया था और वे अपनी उत्कृष्ट सैन्य रणनीति तथा नेतृत्व क्षमता के लिए विख्यात थे।
3. ब्रिटिश सेनापति सर कॉलिन कैंपबेल ने अंततः मार्च 1858 में गोरखा रेजिमेंट और अन्य सैन्य टुकड़ियों की सहायता से लखनऊ पर पुनः पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया, जिसके बाद बेगम हजरत महल ने नेपाल की ओर प्रस्थान किया और वहीं शरण ली।
4. मौलवी अहमदुल्लाह शाह को पकड़ने के लिए अंग्रेजों ने पचास हजार रुपये का भारी इनाम घोषित किया था, और अंत में पुवायां के एक स्थानीय राजा के साथ हुई मुठभेड़ में उन्हें जीवित गिरफ्तार कर लिया गया था, जिन पर लखनऊ में राजद्रोह का मुकदमा चलाकर फांसी दी गई थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
अकबर की मृत्यु के बाद सम्राट:
→
मुगल काल में "परगना":
→
वर्ष 1857 के महान विद्रोह के उपरांत ब्रिटिश नीतियों में हुए संरचनात्मक परिवर्तनों तथा 'भारत सरकार अधिनियम 1858' और 'क्वीन विक्टोरिया की घोषणा' के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत सरकार अधिनियम 1858 के माध्यम से ब्रिटिश ईस्ट India कंपनी का शासन विधिवत समाप्त कर दिया गया और भारत का प्रत्यक्ष नियंत्रण सीधे ब्रिटिश क्राउन को हस्तांतरित कर दिया गया, जिसके तहत 'भारत के गवर्नर-जनरल' को 'वाइसराय' की अतिरिक्त उपाधि प्रदान की गई और लॉर्ड कैनिंग भारत के प्रथम वाइसराय बने।
2. महारानी विक्टोरिया की घोषणा में भविष्य में भारतीय रियासतों के विलय की नीति का परित्याग करने का आश्वासन दिया गया तथा भारतीय राजाओं के 'दत्तक पुत्र' लेने के अधिकारों (Adoption rights) को मान्यता प्रदान की गई।
3. घोषणा पत्र में यह स्पष्ट रूप से प्रावधान किया गया कि भारत के राज्य सचिव (Secretary of State for India) और उसकी 15 सदस्यीय 'भारत परिषद' (India Council) का संपूर्ण वित्तीय व्यय और वेतन सीधे तौर पर ब्रिटेन के राजकोष (British Exchequer) से वहन किया जाएगा, ताकि भारतीय राजस्व पर से वित्तीय बोझ कम किया जा सके।
4. इस अधिनियम और तदुपरांत हुए सैन्य पुनर्गठन के तहत सेना में यूरोपीय सैनिकों का अनुपात बढ़ा दिया गया, तोपखाने पूरी तरह यूरोपीय नियंत्रण में रखे गए, और 'फूट डालो और राज करो' की नीति को सुदृढ़ करने के लिए विभिन्न जातियों तथा क्षेत्रों के सैनिकों को मिलाकर रेजिमेंटों का गठन किया गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
मध्यकालीन भारत के सूफी आंदोलनों के संदर्भ में, निम्नलिखित सूफीसिलसिलों (संप्रदायों) और उनके प्रमुख संस्थापकों या प्रचारकों पर विचार कीजिए:
1. सुहरावर्दी सिलसिला - इस सिलसिले की स्थापना भारत में शेख शहाबुद्दीन सुहरावर्दी द्वारा की गई थी और इसके प्रमुख संत शेख बहाउद्दीन जकारिया थे, जिन्होंने मुल्तान को अपना मुख्य केंद्र बनाया तथा शाही दरबार के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखते हुए राजकीय अनुदान (मदद-ए-माश) को सहर्ष स्वीकार किया।
2. नक्शबंदी सिलसिला - इस सिलसिले के भारत में संस्थापक ख्वाजा बाकी بالله थे, किंतु इसका वास्तविक और अत्यधिक प्रभाव शेख अहमद सरहिंदी (मुजद्दिद-अलिफ-सानी) के काल में बढ़ा, जिन्होंने अकबर की उदारवादी धार्मिक नीतियों (दीन-ए-इलाही और सुलह-ए-कुल) का कड़ा विरोध करते हुए रूढ़िवादी सुन्नी इस्लाम के पुनरुत्थान पर बल दिया।
3. कादिरी सिलसिला - भारत में इस सिलसिले के संस्थापक शाह नियामतुल्लाह थे, किंतु इसके सबसे प्रसिद्ध संत मियाॅं मीर थे, जिनसे मुगल राजकुमार दारा शिकोह और सम्राट शाहजहाँ गहरे रूप से प्रभावित थे।
4. चिशती सिलसिला - ख्वाजा मोइनुद्दीन चिशती द्वारा भारत में स्थापित इस सिलसिले के संतों ने शाही महलों से दूर रहना, सादा जीवन जीना तथा संगीत गोष्ठियों (समां) का कड़ा विरोध करते हुए पूर्ण रूप से एकांत और केवल ध्यान-साधना पर ही अपना ध्यान केंद्रित रखा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.