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History of India
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मध्यकालीन भारत के इतिहास में भक्ति और सूफी आंदोलनों के प्रसार तथा उनके दार्शनिक स्वरूप के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित 'अद्वैत वेदांत' के विपरीत, दक्षिण भारत में वैष्णव संतों (आलवारों) और शैव संतों (नयनारों) ने भक्ति आंदोलन की नींव रखी, जिसमें रामानुजाचार्य ने 'विशिष्टाद्वैत' दर्शन का प्रतिपादन करते हुए ईश्वर और जीव के बीच तादात्म्य के साथ-साथ भेद को भी स्वीकार किया।
  2. 2. सूफी सिलसिले मुख्य रूप से दो प्रमुख धाराओं—'बा-शरा' (इस्लामी शरीयत के बंधनों से बंधे हुए) और 'बे-शरा' (शरीयत के कठोर नियमों से स्वतंत्र या मस्त कलंदर)—में विभाजित थे, जिनमें भारत में चिश्ती और सुहरावर्दी सिलसिले 'बा-शरा' परंपरा के अंतर्गत आते थे।
  3. 3. उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन को लोकप्रिय बनाने वाले रामानंद ने जातिगत भेदभाव को दरकिनार करते हुए अपने शिष्यों में रैदास (चमार), कबीर (जुलाहा), सेना (नाई) और पीपा (राजपूत शासक) जैसे समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों को शामिल किया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

Detailed Explanation

दिए गए तीनों कथन पूर्णतः सत्य हैं। दक्षिण भारत में आलवार और नयनार संतों ने भक्ति आंदोलन की शुरुआत की, जिसे बाद में रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैत दर्शन के माध्यम से दार्शनिक आधार प्रदान किया। सूफीवाद में भी 'बा-शरा' (शरीयत का पालन करने वाले जैसे चिश्ती और सुहरावर्दी) तथा 'बे-शरा' (मदारी, कलंदर आदि) शैलियों का स्पष्ट विभाजन मिलता है। इसके अतिरिक्त, रामानंद ने उत्तर भारत में भक्ति को जन-जन तक पहुँचाते हुए समाज के विभिन्न वर्गों से अपने शिष्य बनाए, जिससे इस आंदोलन का दायरा अत्यंत व्यापक हो गया। विकिपीडिया संदर्भ
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