त्वरित लिंक्स
History of India
8 views
वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान लखनऊ और अवध क्षेत्र में बेगम हजरत महल और मौलवी अहमदुल्लाह शाह की भूमिका तथा ब्रिटिश दमन के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. बेगम हजरत महल ने अपने अल्पवयस्क पुत्र बिरजिस कादिर को अवध का नवाब घोषित कर लखनऊ की रेजिडेंसी पर हुए हमलों का प्रभावी नेतृत्व किया और विद्रोह के विफल होने पर अंग्रेजों के समक्ष आत्मसमर्पण करने के बजाय नेपाल की तराई में आश्रय लिया।
- 2. मौलवी अहमदुल्लाह शाह, जिन्हें उनके ओजस्वी भाषणों और विद्रोही गतिविधियों के कारण 'डंका शाह' भी कहा जाता था, ने चिनहट के युद्ध में ब्रिटिश सेना को पराजित किया था और ब्रिटिश सरकार ने उनके ऊपर पचास हजार रुपये का इनाम घोषित किया था।
- 3. मौलवी अहमदुल्लाह शाह को अंततः अवध के ही पुवायाँ के एक स्थानीय राजा के सहयोग और विश्वासघात के कारण अंग्रेजों द्वारा घेर लिया गया, जहाँ वे वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान लखनऊ और अवध क्षेत्र में बेगम हजरत महल और मौलवी अहमदुल्लाह शाह ने ब्रिटिश सत्ता को अत्यंत कड़ी चुनौती दी थी। बेगम हजरत महल ने अपने नाबालिग पुत्र बिरजिस कादिर को गद्दी पर बैठाकर अवध के विद्रोह की बागडोर संभाली। मौलवी अहमदुल्लाह शाह (जिन्हें विकिपीडिया संदर्भ के अनुसार 'डंका शाह' भी कहा जाता था) ने चिनहट के युद्ध में हेनरी लॉरेंस के नेतृत्व वाली ब्रिटिश सेना को करारी शिकस्त दी थी। उनकी बढ़ती लोकप्रियता और सैन्य कौशल से भयभीत होकर अंग्रेजों ने उन पर पचास हजार रुपये का भारी इनाम रखा था। अंततः पुवायाँ के राजा जगन्नाथ सिंह की गद्दारी के कारण उन्हें अंग्रेजों ने घेर लिया, जहाँ वे लड़ते हुए शहीद हो गए। अतः तीनों कथन पूर्णतः सही हैं।
Related Questions
→
फतेहपुर सीकरी का निर्माण किसने करवाया?
→
मौर्य साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था, केंद्रीय मंत्रिपरिषद और अशोक के धम्म तथा अभिलेखों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मौर्य प्रशासन में केंद्रीय मंत्रिपरिषद के शीर्ष अधिकारियों को 'तीर्थ' कहा जाता था, जिनकी संख्या कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार अठारह थी; इनमें 'समाहर्ता' संपूर्ण साम्राज्य का राजस्व संग्रह करने वाला मुख्य अधिकारी था, जबकि 'सन्निधातृ' राजकीय कोषागार और भंडारगृह का अध्यक्ष होता था।
2. अशोक के अधिकांश शिलालेख ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण हैं और वे बाएं से दाएं लिखे गए हैं, किंतु उत्तर-पश्चिम भारत (जैसे शाहबाजगढ़ी और मानसेहरा) से प्राप्त अभिलेख खरोष्ठी लिपि में हैं, जो दाएं से बाएं लिखी जाती थी, और अफगानिस्तान से प्राप्त अभिलेख ग्रीक तथा अरमाइक लिपियों में हैं।
3. अशोक द्वारा प्रतिपादित 'धम्म' कोई नया धर्म या बौद्ध धर्म का राजनीतिक संस्करण नहीं था, बल्कि यह एक नैतिक आचार संहिता थी जिसका उद्देश्य सामाजिक सौहार्द, बुजुर्गों का सम्मान, दासों व सेवकों के साथ मानवीय व्यवहार और सभी संप्रदायों के प्रति सहिष्णुता स्थापित करना था, जिसका स्पष्ट उल्लेख उसके द्वितीय और सप्तम स्तंभ लेख में मिलता है।
4. मौर्य काल में न्याय व्यवस्था अत्यंत कठोर थी और कौटिल्य के अर्थशास्त्र में दीवानी न्यायालय को 'धर्मस्थीय' तथा फौजदारी न्यायालय को 'कंटकशोधन' कहा गया है, जहाँ पुलिस विभाग को 'रक्षिन' और जासूसों को 'गूढ़पुरुष' कहा जाता था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
मौर्योत्तर काल एवं गुप्त साम्राज्य के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मौर्योत्तर काल में सातवाहन शासकों ने ब्राह्मणों और बौद्ध भिक्षुओं को कर-मुक्त भूमि अनुदान (अग्रहार व्यवस्था) देने की परंपरा को बड़े पैमाने पर आरंभ किया, तथा सातवाहन राजाओं के सिक्के मुख्यतः सीसे, प्रोटीन, तांबे और कांसे के बने होते थे।
2. गुप्त काल में भूमि के स्वामित्व और उसके प्रशासन का विवरण देने वाले अभिलेखों में 'निवर्तना' और 'द्रोणवाप' जैसे माप के पैमानों का उल्लेख मिलता है, जो भूमि की पैमाइश और उसकी उत्पादकता से संबंधित थे।
3. गुप्त राजवंश के दौरान हूणों के आक्रमणों का सामना करने वाले और उन्हें पराजित करने वाले प्रमुख शासक कुमारगुप्त प्रथम और स्कंदगुप्त थे, जिनके सिक्कों और अभिलेखों (जैसे भीतरी स्तंभ लेख) में हूण आक्रमणों का स्पष्ट विवरण मिलता है।
4. गुप्त साम्राज्य की प्रशासनिक इकाइयों का सही अवरोही क्रम 'भुक्ति' (प्रतीक/प्रांत), 'विषय' (जिला), 'वीथी' (उप-जिला) और 'ग्राम' (सबसे छोटी इकाई) था, जिसके प्रशासनिक प्रमुखों को क्रमशः उपरिक, विषयपति और ग्रामिक कहा जाता था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
प्राचीन भारतीय इतिहास के संदर्भ में वर्धन राजवंश एवं दक्षिण भारत के राजवंशों (चोल, पल्लव, चालुक्य) की प्रशासनिक, सैन्य और सांस्कृतिक प्रणालियों के निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पल्लव राजा नरसिंहवर्मन प्रथम (महामल्ल) ने वातापी के चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय को पराजित करके 'वातापीकोंड' की उपाधि धारण की थी और महाबलीपुरम में प्रसिद्ध रथ मंदिरों (मोनोलिथिक सप्तपगोडा) का निर्माण करवाया था।
2. बादामी के चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय और हर्षवर्धन के बीच नर्मदा नदी के तट पर हुए ऐतिहासिक युद्ध का सजीव एवं विस्तृत विवरण जैन कवि रविकीर्ति द्वारा रचित 'ऐहोल प्रशस्ति' में प्राप्त होता है, जिसमें हर्षवर्धन की पराजय का उल्लेख है।
3. चोल राजवंश की स्थानीय स्वशासन प्रणाली, जो विशेष रूप से 'उत्तरमेरूर शिलालेखों' (पारांतक चोल के काल के) से ज्ञात होती है, में ग्राम सभाओं (सभा या महासभा) के सदस्यों के चयन के लिए 'कुरावै' नामक गुप्त मतदान (लॉटरी सिस्टम) पद्धति का प्रयोग किया जाता था।
4. हर्ष के शासनकाल में नालंदा विश्वविद्यालय की यात्रा करने वाले चीनी यात्री ह्वेनसांग ने यह उल्लेख किया है कि हर्ष के प्रशासन में राज्य की आय का एक बड़ा हिस्सा चार भागों में विभाजित था, जिसमें धार्मिक कार्यों और मंत्रियों के वेतन के लिए क्रमशः एक-चौथाई अंश निर्धारित था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
विजयनगर साम्राज्य का राजकीय चिन्ह (Royal Seal) क्या था?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.