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History of India
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प्राचीन भारतीय दर्शन और जैन-बौद्ध धर्म के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. बौद्ध धर्म के प्रारंभिक ग्रंथों (जैसे अंगुत्तर निकाय) में जहाँ सोलह महाजनपदों का उल्लेख मिलता है, वहीं जैन धर्म के पवित्र ग्रंथ 'भगवती सूत्र' में भी इन महाजनपदों की लगभग समान सूची प्राप्त होती है।
  2. 2. जैन धर्म के 'स्याद्वाद' (सप्तभंगी नय) सिद्धांत के अनुसार, किसी भी वस्तु या सत्य के अस्तित्व को एकांगी रूप से पूर्णतः सत्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि प्रत्येक वस्तु के अनेक धर्म होते हैं और यह सापेक्षता का सिद्धांत ज्ञान की सीमा को रेखांकित करता है।
  3. 3. बौद्ध संघ में प्रवेश के लिए न्यूनतम आयु सीमा 15 वर्ष निर्धारित की गई थी, तथा संघ के नियमों के अनुसार चोर, हत्यारे, ऋणग्रस्त व्यक्ति और राजा के सेवक (सैनिक) भी किसी भी समय बौद्ध भिक्षु बन सकते थे।
  4. 4. जैन धर्म के श्वेतांबर संप्रदाय के अनुयायी पूर्ण नग्नता (अचेलक) का कठोरता से पालन करते हैं, जबकि दिगंबर संप्रदाय के भिक्षु श्वेत वस्त्र धारण करने की अनुमति देते हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 और 2 सही हैं। बौद्ध ग्रंथ 'अंगुत्तर निकाय' और जैन ग्रंथ भगवती सूत्र दोनों ही प्राचीन भारत के 'सोलह महाजनपदों' (षोडश महाजनपद) की महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं। जैन दर्शन का 'स्याद्वाद' या 'सप्तभंगी नय' ज्ञान की सापेक्षता का सिद्धांत है, जो यह बताता है कि प्रत्येक वस्तु के अनेक पहलू होते हैं। कथन 3 गलत है क्योंकि बौद्ध संघ में प्रवेश के लिए न्यूनतम आयु सीमा 15 नहीं बल्कि 15 वर्ष से कम यानी बच्चों के लिए वर्जित थी और संघ में चोर, हत्यारे, ऋणग्रस्त तथा राजा के सैनिकों को बिना अनुमति या ऋण चुकाए प्रवेश की मनाही थी। कथन 4 विपरीत है; श्वेतांबर संप्रदाय के साधु श्वेत वस्त्र पहनते हैं जबकि दिगंबर संप्रदाय के साधु पूर्ण नग्नता (अचेलक) का पालन करते हैं।
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