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History of India
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उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों और उनके वैचारिक तथा संस्थागत विकास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित 'ब्रह्म समाज' ने मूर्तिपूजा और बहुदेववाद का विरोध तो किया, किंतु इसने उपनिषदों और वेदों के अधिकार को पूरी तरह नकारते हुए विशुद्ध रूप से तर्कवादी और पश्चिमी आधुनिकतावादी दर्शन को अपनाया था।
  2. 2. स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित 'आर्य समाज' ने 'वेदों की ओर लौटो' का नारा देते हुए मध्यकालीन पौराणिक मान्यताओं, कर्मकांडों और मूर्तिपूजा का खंडन किया, तथा शुद्धि आंदोलन के माध्यम से उन व्यक्तियों की घर-वापसी पर जोर दिया जिन्होंने बलपूर्वक या किन्हीं अन्य कारणों से धर्म परिवर्तन कर लिया था।
  3. 3. महाराष्ट्र में स्थापित 'प्रधाना समाज' (स्थापना 1867) के नेताओं ने जातिगत कठोरता, बाल विवाह और अछूत प्रथा का विरोध करते हुए महिला शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह को बढ़ावा दिया, तथा इसकी प्रेरणा मुख्य रूप से केशव चंद्र सेन के महाराष्ट्र दौरे से मिली थी।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है क्योंकि राजा राममोहन राय ने ब्रह्म समाज के माध्यम से एकेश्वरवाद का प्रचार किया और उन्होंने उपनिषदों तथा वेदों के वेदांत दर्शन को अपने सुधारों का आधार बनाया; उन्होंने वेदों के प्राधिकार को पूरी तरह नहीं नकारा था बल्कि प्राचीन ग्रंथों की तर्कसंगत व्याख्या पर बल दिया। कथन 2 सत्य है क्योंकि स्वामी दयानंद सरस्वती ने 'वेदों की ओर लौटो' का आह्वान किया, पौराणिक मान्यताओं और मूर्तिपूजा का विरोध किया तथा 'शुद्धि आंदोलन' चलाया। कथन 3 भी सत्य है कि प्रार्थना समाज की स्थापना महादेव गोविंद रानाडे और आत्माराम पांडुरंग जैसे नेताओं द्वारा केशव चंद्र सेन के प्रेरणादायक दौरों के पश्चात महाराष्ट्र में की गई थी। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देखें।
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वर्ष 1905 के बंगाल विभाजन और उसके तत्पश्चात आरंभ हुए स्वदेशी आंदोलन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. लॉर्ड कर्ज़न द्वारा बंगाल के विभाजन का औपचारिक निर्णय 20 जुलाई 1905 को घोषित किया गया था, जिसका मुख्य उद्देश्य तत्कालीन राष्ट्रवादी राजनीति के केंद्र बंगाल की राजनीतिक सक्रियता को कमजोर करना और सांप्रदायिक आधार पर प्रांत का विभाजन करना था। 2. 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल में आयोजित ऐतिहासिक बैठक में 'स्वदेशी आंदोलन' का औपचारिक प्रस्ताव पारित किया गया तथा इसी अधिवेशन में प्रसिद्ध गीत 'मार्च ऑफ द नेशन' या 'बंदे मातरम' को आंदोलन का मुख्य गान बनाया गया। 3. बंगाल विभाजन के प्रभावी होने के दिन (16 अक्टूबर 1905) को पूरे बंगाल में 'शोक दिवस' के रूप में मनाया गया, जहाँ लोगों ने उपवास रखा, एक-दूसरे की कलाई पर राखी बांधी और 'अमार सोनार बांग्ला' गीत गाते हुए सड़कों पर मार्च निकाला। 4. स्वदेशी आंदोलन के दौरान बंगाल के राष्ट्रीय शिक्षा के क्षेत्र में हुए प्रयासों के तहत नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशन (राष्ट्रीय शिक्षा परिषद) की स्थापना वर्ष 1906 में की गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य पश्चिमी शिक्षा का पूर्ण बहिष्कार कर केवल पारंपरिक वैदिक शिक्षा प्रणाली को पुनर्जीवित करना था। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? प्राचीन भारतीय इतिहास में बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय और जैन धर्म के श्वेतांबर संप्रदाय के दार्शनिक तथा व्यावहारिक विकास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. महायान बौद्ध धर्म के अंतर्गत बोधिसत्वों की संकल्पना को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई, जिसके अनुसार बोधिसत्व अपनी व्यक्तिगत मुक्ति (निर्वाण) से पूर्व संपूर्ण sentient beings (प्राणियों) के उद्धार और कल्याण के मार्ग पर कार्य करते हैं। 2. जैन धर्म के श्वेतांबर संप्रदाय के अनुयायी स्थूलभद्र के नेतृत्व में उत्तर भारत में रहे और उन्होंने जैन ग्रंथों के संकलन हेतु पाटलिपुत्र में आयोजित प्रथम जैन संगीति में सक्रिय रूप से भाग लिया, जबकि दिगंबर संप्रदाय के विपरीत इन्होंने मोक्ष प्राप्ति के लिए पूर्ण रूप से वस्त्र त्यागने (नग्न रहने) को अनिवार्य नहीं माना। 3. महायान संप्रदाय की तर्ज पर जैन धर्म में भी मूर्तिकला और भक्ति मार्ग का अत्यधिक विकास हुआ, जिसके परिणामस्वरूप श्वेतांबर और दिगंबर दोनों ही संप्रदायों ने महात्मा बुद्ध की भांति महावीर स्वामी की विशाल मूर्तियों का निर्माण करवाकर उनकी पूजा प्रारंभ की, जिसे बौद्ध धर्म के प्रभाव का प्रत्यक्ष परिणाम माना जाता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? दिल्ली सल्तनत के प्रशासनिक विकास, राजस्व प्रणालियों और सैन्य सुधारों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. अलाउद्दीन खिलजी द्वारा प्रशासनिक सुधारों के अंतर्गत स्थापित 'दीवान-ए-मुस्तकखराज' नामक नए विभाग का प्रमुख कार्य भू-राजस्व के बकाया, भ्रष्टाचार और घपलों की जाँच करना था, जबकि मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा कृषि के विकास के लिए स्थापित 'दीवान-ए-कोही' विभाग का मुख्य उद्देश्य सीधे किसानों को आर्थिक सहायता देकर बंजर भूमि को उपजाऊ बनाना था। 2. इल्तुतमिश द्वारा प्रारंभ की गई 'इक्ता व्यवस्था' को फिरोजशाह तुगलक ने वंशानुगत बना दिया और सैनिकों को नकद वेतन देने के स्थान पर 'वज्ह' (इक्ता की आय) देने की प्रथा को समाप्त कर दिया, जिससे सल्तनत में जागीरदारी प्रथा के प्रारंभिक बीज पड़े। 3. सल्तनत काल में भू-राजस्व निर्धारण की विभिन्न पद्धतियों में 'बटाई' (या गल्लाबाख्ची), 'कंकूट' (अनुमान पर आधारित) और 'नासक' (मुक्ताई) प्रणालियाँ प्रचलित थीं, जिनमें से 'नासक' पद्धति के अंतर्गत किसानों से पिछली पैदावार के आधार पर अनुमान लगाकर कर तय किया जाता था। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? मौर्य साम्राज्य की केंद्रीय और प्रांतीय प्रशासनिक व्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. मौर्य प्रशासन में सर्वोच्च नागरिक और सैन्य अधिकारी के रूप में 'तीर्थ' या 'महामात्र' होते थे, जिनकी संख्या कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार अठारह थी, और ये विभिन्न विभागों के प्रमुख होते थे। 2. अशोक के शिलालेखों में वर्णित 'रज्सुक' नामक अधिकारी का मुख्य कार्य न्याय करना और ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि की पैमाइश व मूल्यांकन करना था, जिन्हें ग्रामीण जनता पर व्यापक न्यायिक अधिकार प्राप्त थे। 3. मौर्य काल में 'सनिधाता' राजकीय कोषाध्यक्ष (Treasurer) होता था जो आय-व्यय का लेखा-जोखा रखता था, जबकि 'समाहर्त्ता' साम्राज्य के सभी स्रोतों से कर संग्रह (Tax Collection) के लिए उत्तरदायी सर्वोच्च अधिकारी था। 4. मेगस्थनीज की 'इंडिका' के अनुसार पाटलिपुत्र नगर का प्रशासन तीस सदस्यों की एक नगर परिषद द्वारा चलाया जाता था, जिसे छह उप-समितियों (प्रत्येक में पाँच सदस्य) में विभाजित किया गया था, और इनमें से एक समिति विदेशी नागरिकों की देखरेख करती थी। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? वैदिक सभ्यता और वैदिक साहित्य के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. ऋग्वैदिक काल में लोहे का व्यापक ज्ञान था और इसका प्रयोग अस्त्र-शस्त्रों तथा कृषि उपकरणों के निर्माण में बड़े पैमाने पर किया जाता था। 2. शतपथ ब्राह्मण में विदेह माधव की कथा का उल्लेख मिलता है, जिससे यह पता चलता है कि वैदिक आर्यों का भौगोलिक विस्तार सरस्वती घाटी से गंडक (सदाानीरा) नदी की घाटी तक हो गया था। 3. उत्तर वैदिक काल में 'गोत्र' व्यवस्था की स्थापना हुई, जिसका शाब्दिक अर्थ वह स्थान था जहाँ संपूर्ण कुल का गोधन (मवेशी) एकसाथ पाला जाता था, और इस काल में सगोत्र विवाह वर्जित कर दिए गए थे। 4. ऋग्वैदिक समाज में वर्ण व्यवस्था जन्म पर आधारित न होकर कर्म और व्यवसाय पर आधारित थी, जबकि उत्तर वैदिक काल में यह कठोरता से जन्म पर आधारित हो गई। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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