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History of India
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दक्षिण भारत के राजवंशों और हर्षवर्द्धन के काल के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. पल्लव शासक महेंद्रवर्मन प्रथम ने अपने शासनकाल में 'मत्तविलासं प्रहसन' नामक प्रसिद्ध संस्कृत नाटक की रचना की थी, और आरंभ में जैन धर्म के अनुयायी होने के बाद संत अप्पर (तिरुनावुक्करासर) के प्रभाव में आकर उन्होंने शैव धर्म अपना लिया था।
  2. 2. चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय की ऐहोल प्रशस्ति के अनुसार, उसने नर्मदा नदी के तट पर हर्षवर्द्धन को पराजित किया था, जिससे हर्ष का दक्षिण भारत की ओर विस्तार का सपना अधूरा रह गया। इस प्रशस्ति की रचना जैन कवि रवि कीर्ति ने की थी।
  3. 3. चोल प्रशासन के संदर्भ में, 'वरियम' (Variyam) उन वार्षिक समितियों को कहा जाता था जो सिंचाई, उद्यान, स्वर्ण और न्याय जैसे विभिन्न प्रशासनिक विभागों का संचालन करती थीं, और इन समितियों के सदस्यों के चयन के लिए 'कुडवोलाई' (Kudavolai) नामक पर्ची-डालकर चुनाव की अनूठी पद्धति का पालन किया जाता था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

Detailed Explanation

दिए गए तीनों कथन पूर्णतः सत्य हैं। पल्लव शासक महेंद्रवर्मन प्रथम एक महान नाटककार और स्थापत्यप्रेमी थे जिन्होंने 'मत्तविलासं प्रहसन' की रचना की; वे पहले जैन थे और बाद में शैव संत अप्पर के प्रभाव से शैव बन गए। पुलकेशिन द्वितीय द्वारा नर्मदा तट पर हर्षवर्धन को हराए जाने का उल्लेख रवि कीर्ति रचित विकिपीडिया संदर्भ में मिलता है। चोल साम्राज्य के उत्तरमेरूर शिलालेखों से 'कुडवोलाई' नामक ग्राम पंचायत चुनाव प्रणाली और 'वरियम' समितियों का विस्तृत विवरण प्राप्त होता है।
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